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Chapter 18

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - History of Modern World (1453-1950 AD) (Hindi)📖 9 नोट्स⏱️ ~14 मिनट
Chapter 17अध्याय 18 / 20Chapter 19

Chapter 18अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

18.1 प्रस्तावना

व्याख्या

18.1 प्रस्तावना

इस अनुभाग में विश्वव्यापी आर्थिक मंदी की पृष्ठभूमि और उसके वैश्विक प्रभावों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। 1929 में आरंभ हुई यह मंदी विश्व के अधिकांश देशों को प्रभावित करने वाली सबसे गंभीर आर्थिक घटना थी। प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व की आर्थिक संरचना अस्थिर थी। अमेरिका, यूरोप, एशिया और अफ्रीका के देशों की अर्थव्यवस्थाएँ आपस में जुड़ी हुई थीं। मंदी के कारण उत्पादन, व्यापार, निवेश, और रोजगार में भारी गिरावट आई। इसने न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्रों में भी गहरा प्रभाव डाला। इस खंड में मंदी के कारणों, उसके फैलाव और तत्कालीन वैश्विक परिस्थितियों का परिचय दिया गया है।

  • विश्वव्यापी आर्थिक मंदी 1929 में आरंभ हुई।
  • मंदी का प्रभाव अमेरिका से शुरू होकर पूरे विश्व में फैला।
  • यह मंदी औद्योगिक, कृषि, व्यापारिक और वित्तीय क्षेत्रों को प्रभावित करने वाली थी।
  • मंदी ने बेरोजगारी, गरीबी और असंतोष को जन्म दिया।
  • इसने राजनीतिक अस्थिरता और चरमपंथी विचारधाराओं के उदय को बढ़ावा दिया।
  • 📌 आर्थिक मंदी: उत्पादन, व्यापार, निवेश और रोजगार में दीर्घकालीन गिरावट की स्थिति।
  • 📌 ब्लैक थर्सडे: 24 अक्टूबर 1929 का दिन, जब अमेरिकी शेयर बाजार में भारी गिरावट आई।

18.2 आर्थिक मंदी के कारण

व्याख्या

18.2 आर्थिक मंदी के कारण

इस खंड में आर्थिक मंदी के मुख्य कारणों का विश्लेषण किया गया है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व की अर्थव्यवस्था असंतुलित थी। अमेरिका में अति-उत्पादन, शेयर बाजार में सट्टा, बैंकिंग प्रणाली की कमजोरियाँ, कृषि संकट, और अंतरराष्ट्रीय ऋण संबंधी समस्याएँ प्रमुख कारण थे। युद्ध के दौरान यूरोपीय देशों ने अमेरिका से भारी ऋण लिया था, जिसे चुकाने में वे असमर्थ थे। अमेरिकी बैंकों ने अत्यधिक ऋण दिए, जिससे वित्तीय संकट गहराया। शेयर बाजार में सट्टेबाजी के कारण मूल्य अस्वाभाविक रूप से बढ़ गए, और जब निवेशकों का विश्वास डगमगाया, तो बाजार ध्वस्त हो गया। इसके अलावा, व्यापारिक संरक्षणवाद (प्रोटेक्शनिज्म) ने वैश्विक व्यापार को सीमित कर दिया।

  • अति-उत्पादन और कम उपभोग ने बाजार में असंतुलन पैदा किया।
  • शेयर बाजार में सट्टा और मूल्य का अस्वाभाविक बढ़ना।
  • बैंकिंग प्रणाली की कमजोरियों से वित्तीय संकट उत्पन्न हुआ।
  • अंतरराष्ट्रीय ऋणों की अदायगी में असमर्थता।
  • व्यापारिक संरक्षणवाद के कारण वैश्विक व्यापार में गिरावट।
  • 📌 अति-उत्पादन: आवश्यकता से अधिक वस्तुओं का उत्पादन।
  • 📌 सट्टा: त्वरित लाभ के लिए जोखिमपूर्ण निवेश।
  • 📌 प्रोटेक्शनिज्म: घरेलू उद्योगों की रक्षा के लिए आयात पर उच्च शुल्क लगाना।

18.3 मंदी का वैश्विक फैलाव

व्याख्या

18.3 मंदी का वैश्विक फैलाव

इस खंड में बताया गया है कि किस प्रकार 1929 में अमेरिका में शुरू हुई मंदी शीघ्र ही यूरोप, एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका तक फैल गई। अमेरिका के शेयर बाजार के गिरने से अमेरिकी बैंकों और उद्योगों में संकट आया। अमेरिका ने अपने विदेशी ऋण वापस मंगाने शुरू