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Chapter 8

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - History of Modern World (1453-1950 AD) (Hindi)📖 8 नोट्स⏱️ ~12 मिनट
Chapter 7अध्याय 8 / 20Chapter 9

Chapter 8अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

8.1 यूरोपीय साम्राज्यवाद का परिचय

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8.1 यूरोपीय साम्राज्यवाद का परिचय

इस अनुभाग में यूरोपीय साम्राज्यवाद के उदय और विस्तार का परिचय दिया गया है। 15वीं शताब्दी के अंत से लेकर 20वीं शताब्दी के मध्य तक यूरोपीय शक्तियों ने एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के विभिन्न क्षेत्रों में अपने साम्राज्य स्थापित किए। साम्राज्यवाद का अर्थ है किसी एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र या क्षेत्र पर राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित करना। चीन और जापान में यूरोपीय साम्राज्यवाद के प्रवेश के पीछे मुख्य कारण थे व्यापार, संसाधनों की खोज, और राजनीतिक शक्ति का विस्तार। यूरोपीय देशों—विशेषकर ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, नीदरलैंड और रूस—ने समुद्री मार्गों की खोज के बाद एशिया के देशों में व्यापारिक कंपनियों के माध्यम से अपने प्रभाव को बढ़ाया। चीन और जापान में यूरोपीय हस्तक्षेप ने वहां की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं को गहराई से प्रभावित किया। इस प्रक्रिया में यूरोपीय शक्तियों ने स्थानीय शासकों के साथ संघर्ष और समझौते दोनों किए।

  • यूरोपीय साम्राज्यवाद का आरंभ 15वीं शताब्दी के अंत में हुआ।
  • साम्राज्यवाद का उद्देश्य व्यापार और संसाधनों की खोज था।
  • ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, नीदरलैंड और रूस प्रमुख यूरोपीय शक्तियाँ थीं।
  • चीन और जापान में यूरोपीय हस्तक्षेप ने वहां की सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित किया।
  • साम्राज्यवाद के कारण वैश्विक व्यापार और संस्कृति में परिवर्तन आया।
  • स्थानीय शासकों के साथ संघर्ष और समझौते दोनों हुए।
  • 📌 साम्राज्यवाद: किसी राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र या क्षेत्र पर प्रभुत्व स्थापित करना।
  • 📌 औपनिवेशिक नीति: यूरोपीय शक्तियों द्वारा अपनाई गई नीति जिससे वे विदेशी क्षेत्रों पर नियंत्रण रखते थे।

8.2 चीन में यूरोपीय हस्तक्षेप

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8.2 चीन में यूरोपीय हस्तक्षेप

इस अनुभाग में चीन में यूरोपीय शक्तियों के हस्तक्षेप की प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया गया है। 16वीं शताब्दी में पुर्तगाली व्यापारियों ने सबसे पहले चीन के तटों पर पहुंचकर व्यापार शुरू किया। इसके बाद ब्रिटिश, फ्रांसीसी, डच और रूसी व्यापारियों ने भी चीन में व्यापारिक संबंध स्थापित किए। चीन की किंग वंश की सरकार ने विदेशी व्यापारियों पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन अफीम व्यापार के कारण ब्रिटिश व्यापारियों का प्रभाव बढ़ा। 1839-42 के अफीम युद्ध के बाद चीन को ब्रिटेन के साथ 'नानकिंग संधि' करनी पड़ी, जिससे चीन के कई बंदरगाह यूरोपीय व्यापार के लिए खोल दिए गए। इसके बाद फ्रांस, रूस और अन्य देशों ने भी चीन पर दबाव बनाकर व्यापारिक अधिकार प्राप्त किए। यूरोपीय हस्तक्षेप के कारण चीन की अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति में गहरा परिवर्तन आया।

  • पुर्तगाली व्यापारियों ने सबसे पहले चीन में प्रवेश किया।
  • ब्रिटिश व्यापारियों ने अफीम व्यापार के माध्यम से चीन में प्रभाव बढ़ाया।
  • 1839-42 के अफीम युद्ध के बाद 'नानकिंग संधि' हुई।
  • चीन के कई बंदरगाह यूरोपीय व्यापार के लिए खोल दिए गए।
  • फ्रांस, रूस और अन्य देशों ने भी चीन में व्यापारिक अधिकार प्राप्त किए।
  • यूरोपीय हस्तक्षेप से चीन की अर्थव्यवस्था और समाज में परिवर्तन आया।
  • 📌 अफीम युद्ध: ब्रिटेन और चीन के बीच 1839-42 में हुआ संघर्ष।
  • 📌 नानकिंग संधि: 1842 में चीन और ब्रिटेन के बीच हुई संधि, जिससे चीन के बंदरगाह यूरोपीय व्यापार के लिए खुले।

8.3 अफीम युद्ध और नानकिंग संधि

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8.3 अफीम युद्ध और नानकिंग संधि

इस अनुभाग में अफीम युद्ध और नानकिंग संधि का विस्तार से वर्णन किया गया है। ब्रिटिश व्यापारियों ने चीन में अफीम का निर्यात बढ़ा दिया, जिससे चीन की जनता और सरकार में असंतोष उत्पन्न हुआ। किंग वंश ने अफीम व्यापार पर प्रतिबंध लगाया, लेकिन ब्रिटिश व्यापारिय