Chapter 2
Chapter 2 — अध्ययन नोट्स
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2.1 मुद्रा की मांग की अवधारणा
अवधारणा2.1 मुद्रा की मांग की अवधारणा
मुद्रा की मांग का अर्थ है वह मात्रा जिसमें लोग अपने पास मुद्रा रखना चाहते हैं। यह मांग लेन-देन, सावधानी और सट्टा उद्देश्यों के लिए होती है। मुद्रा की मांग का तात्पर्य है कि समाज के विभिन्न वर्ग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु कितनी मात्रा में मुद्रा अपने पास रखना चाहते हैं। मुद्रा की मांग को समझना इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह देश की आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करती है। मुद्रा की मांग मुख्यतः दो भागों में विभाजित की जाती है: (1) लेन-देन हेतु मांग (Transactions Demand), (2) परिसंपत्ति हेतु मांग (Asset Demand)। लेन-देन हेतु मांग का संबंध दैनिक खर्चों से है, जबकि परिसंपत्ति हेतु मांग का संबंध भविष्य में निवेश या सट्टा गतिविधियों से है। मुद्रा की मांग पर ब्याज दर, आय स्तर, मूल्य स्तर, बैंकिंग प्रणाली की प्रगति आदि कारक प्रभाव डालते हैं।
- मुद्रा की मांग वह मात्रा है जिसमें लोग मुद्रा रखना चाहते हैं।
- मुद्रा की मांग के मुख्य उद्देश्य लेन-देन, सावधानी और सट्टा हैं।
- मुद्रा की मांग पर आय, ब्याज दर, मूल्य स्तर आदि कारक प्रभाव डालते हैं।
- मुद्रा की मांग का अध्ययन अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
- मुद्रा की मांग के दो प्रमुख घटक: लेन-देन हेतु मांग और परिसंपत्ति हेतु मांग।
- मुद्रा की मांग और आपूर्ति के संतुलन से ब्याज दर निर्धारित होती है।
- 📌 मुद्रा की मांग: वह मात्रा जिसमें लोग मुद्रा रखना चाहते हैं।
- 📌 लेन-देन हेतु मांग: दैनिक खर्चों के लिए मुद्रा की आवश्यकता।
- 📌 परिसंपत्ति हेतु मांग: निवेश या सट्टा के लिए मुद्रा की आवश्यकता।
2.2 मुद्रा की मांग के निर्धारक
व्याख्या2.2 मुद्रा की मांग के निर्धारक
मुद्रा की मांग के निर्धारक वे कारक हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि लोग कितनी मात्रा में मुद्रा अपने पास रखना चाहेंगे। मुख्य निर्धारकों में आय स्तर, ब्याज दर, वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य स्तर, भुगतान की आवृत्ति, बैंकिंग प्रणाली की प्रगति, और आर्थिक अनिश्चितता शामिल हैं। आय स्तर जितना अधिक होगा, व्यक्ति उतनी ही अधिक मुद्रा अपने पास रखना चाहेगा। ब्याज दर बढ़ने पर लोग अपनी बचत को बैंक में रखना पसंद करते हैं, जिससे मुद्रा की मांग घटती है। मूल्य स्तर बढ़ने से लेन-देन के लिए अधिक मुद्रा की आवश्यकता होती है। बैंकिंग प्रणाली के विकास से चेक, डेबिट कार्ड आदि के माध्यम से भुगतान संभव होता है, जिससे नकद मुद्रा की मांग कम हो जाती है। आर्थिक अनिश्चितता की स्थिति में लोग अधिक मुद्रा रखना पसंद करते हैं।
- आय स्तर बढ़ने पर मुद्रा की मांग बढ़ती है।
- ब्याज दर बढ़ने पर मुद्रा की मांग घटती है।
- मूल्य स्तर बढ़ने से लेन-देन हेतु अधिक मुद्रा की आवश्यकता होती है।
- बैंकिंग प्रणाली के विकास से नकद मुद्रा की मांग घटती है।
- आर्थिक अनिश्चितता में लोग अधिक मुद्रा रखना पसंद करते हैं।
- भुगतान की आवृत्ति भी मुद्रा की मांग को प्रभावित करती है।
- 📌 आय स्तर: व्यक्ति या देश की कुल आमदनी।
- 📌 ब्याज दर: बैंक द्वारा जमा या ऋण पर दी जाने वाली दर।
- 📌 मूल्य स्तर: वस्तुओं एवं सेवाओं की औसत कीमत।
2.3 मुद्रा की मांग के सिद्धांत
व्याख्या2.3 मुद्रा की मांग के सिद्धांत
मुद्रा की मांग के प्रमुख सिद्धांत दो हैं: (1) क्लासिकल (पारंपरिक) दृष्टिकोण, (2) केन्सियन दृष्टिकोण। क्लासिकल दृष्टिकोण के अनुसार, मुद्रा की मांग केवल लेन-देन के लिए होती है और यह आय तथा मूल्य स्तर पर निर्भर करती है। इसके अंतर्गत 'मुद्रा का मात्रात्म
SLM - Money, Banking & Public Finance (Hindi) के सभी 16 अध्याय
Money, Banking & Public Finance · Vardhman Mahaveer Open University
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