Chapter 17
Chapter 17 — अध्ययन नोट्स
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फणीश्वरनाथ ‘रेणु’
व्याख्याफणीश्वरनाथ ‘रेणु’
फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गाँव में सन् 1921 में हुआ था। वे स्वतंत्रता संग्राम के दौरान 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिए। इसके अतिरिक्त नेपाल के राणाशाही विरोधी आंदोलन में भी उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। राजनीति में वे प्रगतिशील विचारधारा के समर्थक थे। 1953 में उन्होंने साहित्य सृजन की शुरुआत की और कहानी, उपन्यास, निबंध आदि विभिन्न साहित्यिक विधाओं में लेखन किया। रेणु हिंदी के प्रमुख आंचलिक कथाकार हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में विशेष रूप से ग्रामीण अंचल के जीवन, भाषा, लोकसंस्कृति और वातावरण का सजीव चित्रण किया है। उनकी रचनाओं में आंचलिक शब्दावली और मुहावरों का प्रयोग उनकी भाषा को और अधिक प्रभावशाली बनाता है। उनकी मानवीय संवेदना इतनी गहरी है कि वे अभावग्रस्त जनता की पीड़ा को स्वयं अनुभव करते प्रतीत होते हैं। साथ ही, वे मानते हैं कि मनुष्य के भीतर अपनी जीवन दशा को बदलने की अपार शक्ति छिपी होती है। उनके प्रमुख कहानी-संग्रहों में 'दुमरी', 'अगिनखोर', 'आदिम रात्रि की महक' शामिल हैं। 'तीसरी कसम' (जिसे 'मारे गए गुलफाम' के नाम से भी जाना जाता है) पर फिल्म भी बनी है। उनके उल्लेखनीय उपन्यासों में 'मैला आँचल' और 'परती परिकथा' प्रमुख हैं। फणीश्वरनाथ रेणु ने हिंदी कथा साहित्य में एक नई परंपरा की स्थापना की, जिसमें ग्रामीण जीवन की सजीवता और सामाजिक यथार्थ की पकड़ स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उनकी भाषा संवेदनशील, भावप्रधान और संप्रेषणीय है, जो पाठक के अंतरमन को छू जाती है। उनकी रचनाओं में लोकजीवन के मार्मिक स्थलों की पहचान आंचलिक शब्दों के माध्यम से होती है। इस प्रकार, वे हिंदी साहित्य के एक विशिष्ट और प्रभावशाली कथाकार हैं।
- फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ का जन्म बिहार के पूर्णिया जिले में हुआ।
- वे 1942 के ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में सक्रिय थे।
- रेणु हिंदी के प्रमुख आंचलिक कथाकार हैं।
- उनकी रचनाओं में आंचलिक शब्दावली और मुहावरों का प्रयोग होता है।
- उनके प्रसिद्ध कहानी-संग्रह: दुमरी, अगिनखोर, आदिम रात्रि की महक।
- प्रमुख उपन्यास: मैला आँचल, परती परिकथा।
- 📌 आंचलिक कथाकार: वह लेखक जो किसी विशेष क्षेत्र के लोकजीवन, भाषा और संस्कृति को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत करता है।
- 📌 प्रगतिशील विचारधारा: सामाजिक और राजनीतिक सुधारों का समर्थन करने वाली सोच।
संवदिया कहानी में मानवीय संवेदना
व्याख्यासंवदिया कहानी में मानवीय संवेदना
संवदिया कहानी में फणीश्वरनाथ रेणु ने मानवीय संवेदना की गहन और विलक्षण पहचान प्रस्तुत की है। कहानी की नायिका बड़ी बहुरिया के माध्यम से वे असहाय और सहनशील नारी मन के कोमल तंतु, उसके दुख, करुणा, पीड़ा और यातना को सूक्ष्मता से उकेरते हैं। बड़ी बहुरिया गाँव की लक्ष्मी है, जो अपने परिवार के टूटने के बाद अकेली रह गई है और अत्यंत कठिन परिस्थितियों में जीवन यापन कर रही है। रेणु ने बड़ी बहुरिया की पीड़ा को उसकी आंतरिक व्यथा के साथ संवदिया के माध्यम से पाठकों के सामने रखा है। संवदिया यानी संदेशवाहक, जो गाँव-गाँव संवाद पहुँचाता है, उसकी भूमिका महत्वपूर्ण है। कहानी में संवदिया हरगोबिन के संवाद पहुँचाने के प्रयासों में गाँव के सामाजिक और आर्थिक संकट की झलक मिलती है। रेणु की भाषा में लोकभाषा की गहराई, संवाद की लय और प्रवाह, तथा मार्मिक भावनाओं का समावेश कहानी को जीवंत बनाता है। संवदिया की गति और संगीत पाठक के मन को छू जाता है। इस प्रकार, संवदिया कहानी में ग्रामीण जीवन की सच्चाई और मानवीय पीड़ा का मार्मिक चित्रण है।
- संवदिया कहानी में बड़ी बहुरिया के माध्यम से नारी की पीड़ा और सहनशीलता का चित्रण।
- संवदिया का अर्थ है संदेशवाहक जो संवाद गाँव-गाँव पहुँचाता है।
- कहानी में ग्रामीण जीवन की कठिनाइयाँ और सामाजिक टूट-फूट दिखाई गई है।
- रेणु की भाषा में लोकभाषा, संवाद की लय और भावनाओं का समावेश।
- संवदिया की भूमिका सामाजिक और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करती है।
- 📌 संवदिया: संदेशवाहक, जो संवाद या समाचार गाँव-गाँव पहुँचाता है।
- 📌 बड़ी बहुरिया: पुत्रवधू, जो परिवार की प्रमुख महिला होती है।
संवदिया की भूमिका और बड़ी हवेली का दृश्य
व्याख्यासंवदिया की भूमिका और बड़ी हवेली का दृश्य
कहानी में संवदिया हरगोबिन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। संवदिया गाँव-गाँव संवाद पहुँचाने वाला होता है, जो लोगों के बीच खबरों और भावनाओं का माध्यम बनता है। आज के डिजिटल युग में भी संवदिया की भूमिका का महत्व समझा जा सकता है, जहाँ सही और भावपूर्ण संवा
अभ्यास प्रश्न — Chapter 17
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. कुटज को ‘गाढ़े के साथी’ क्यों कहा गया है?
उत्तर:
कुटज को 'गाढ़े के साथी' इसलिए कहा गया है क्योंकि यह पौधा गाढ़े (घने) जंगलों में साथ-साथ उगता है और अपने जीवन को मजबूती से निभाता है। इसका अर्थ है कि कुटज अपने पर्यावरण के साथ घनिष्ठ संबंध रखता है और कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहने की क्षमता रखता है। यह उपमात्मक अभिव्यक्ति कुटज की जीवनी शक्ति और सह-अस्तित्व की भावना को दर्शाती है।
व्याख्या:
कुटज का जीवन कठिन और चुनौतीपूर्ण होता है, लेकिन वह गाढ़े जंगलों में अपने साथी पौधों के साथ मिलकर जीवित रहता है। इसलिए उसे 'गाढ़े के साथी' कहा गया है। यह नाम उसकी सहनशीलता और जीवित रहने की क्षमता को दर्शाता है।
Q2.2. ‘नाम’ क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
लेखक के अनुसार 'नाम' बड़ा इसलिए है क्योंकि यह समाज की स्वीकृति और पहचान का प्रतीक है। नाम व्यक्ति के रूप में उसकी सामाजिक स्थिति, इतिहास और समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी को दर्शाता है। रूप व्यक्ति-सत्य है, जबकि नाम समाज-सत्य है। नाम वह पद है जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। इसलिए नाम का महत्व रूप से अधिक है क्योंकि यह व्यक्ति को समाज में उसकी जगह देता है।
व्याख्या:
लेखक ने बताया है कि रूप तो केवल बाहरी सुंदरता है, लेकिन नाम वह सामाजिक पहचान है जो व्यक्ति को समाज में मान्यता देता है। नाम के बिना व्यक्ति की पहचान अधूरी होती है। इसलिए नाम बड़ा है।
Q3.3. ‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।
उत्तर:
‘कुट’, ‘कुटज’ और ‘कुटनी’ ये तीनों शब्द एक ही मूल से संबंधित हैं। 'कुट' का अर्थ होता है एक प्रकार का पौधा या झाड़ी। 'कुटज' एक विशेष प्रकार का पौधा है जो कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहता है। 'कुटनी' भी एक वनस्पति है जो कुटज से संबंधित है। इन तीनों शब्दों में आपसी संबंध यह है कि ये सभी वनस्पतियों के नाम हैं जो प्रकृति में एक-दूसरे के निकट या समान पर्यावरण में पाए जाते हैं।
व्याख्या:
इन शब्दों का व्युत्पत्ति संबंधी विश्लेषण करने पर पता चलता है कि ये वनस्पति जगत की विभिन्न प्रजातियाँ हैं जो एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। कुटज और कुटनी दोनों कुट से निकले शब्द हैं, जो उनके पारिवारिक संबंध को दर्शाते हैं।
Q4.4. कुटज किस प्रकार अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा करता है?
उत्तर:
कुटज अपनी अपराजेय जीवनी-शक्ति की घोषणा अपने दृढ़ता, सहनशीलता और जीवन के प्रति अटूट जिजीविषा से करता है। वह कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहता है, अपने अस्तित्व को बनाए रखता है और कभी हार नहीं मानता। उसकी यह शक्ति उसके जीवन दृष्टि और स्वभाव में झलकती है, जो उसे हर विपत्ति में भी स्थिर और अडिग बनाए रखती है।
व्याख्या:
कुटज का जीवन संघर्षों से भरा होता है, लेकिन वह कभी टूटता नहीं। उसकी अपराजेय जीवनी-शक्ति उसकी प्रकृति में है जो उसे हर परिस्थिति में जीवित रहने और फलने-फूलने की क्षमता देती है। यह शक्ति उसकी आत्मा की दृढ़ता और साहस को दर्शाती है।
Q5.5. ‘कुटज’ हम सभी को क्या उपदेश देता है? टिप्पणी कीजिए।
उत्तर:
कुटज हम सभी को जीवन में दृढ़ता, साहस और जिजीविषा का उपदेश देता है। वह सिखाता है कि कठिनाइयों और विपत्तियों के बावजूद हमें हार नहीं माननी चाहिए और अपने जीवन को पूरी ताकत से जीना चाहिए। कुटज की तरह हमें भी अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहिए और जीवन की चुनौतियों का सामना निडरता से करना चाहिए।
व्याख्या:
कुटज का जीवन संघर्षों से भरा है, लेकिन वह कभी टूटता नहीं। उसकी यह सीख हमें जीवन में निराशा से बचाती है और हमें हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
Q6.6. कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?
उत्तर:
कुटज के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में कठिनाइयों का सामना धैर्य, साहस और अडिग विश्वास से करना चाहिए। जीवन की चुनौतियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें हार नहीं माननी चाहिए और निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए। कुटज की तरह हमें भी अपने अस्तित्व को बनाए रखना चाहिए और जीवन को पूरी ऊर्जा के साथ जीना चाहिए।
व्याख्या:
कुटज का जीवन संघर्षों से भरा है, लेकिन वह कभी हार नहीं मानता। उसकी यह जीवनी शक्ति हमें जीवन में निराशा से बचाती है और हमें हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।
Q7.7. कुटज क्या केवल जी रहा है—लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमजोरियों पर टिप्पणी की है?
उत्तर:
लेखक ने यह प्रश्न उठाकर मानवीय कमजोरियों जैसे कि भय, स्वार्थ, अस्थिरता, और जीवन के प्रति उदासीनता पर टिप्पणी की है। वह यह बताना चाहता है कि केवल जीवित रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जीवन को पूरी ऊर्जा, साहस और जिजीविषा के साथ जीना आवश्यक है। कुटज का जीवन दृष्टिकोण हमें यह सिखाता है कि जीवन में स्थिरता और अपराजेयता होनी चाहिए, न कि केवल अस्तित्व का निर्वाह।
व्याख्या:
यह प्रश्न जीवन के प्रति मनुष्य की कमजोरियों को उजागर करता है, जैसे कि भय, स्वार्थ, और जीवन की गहराई को न समझना। कुटज की तुलना में यह कमजोरियाँ जीवन को अधूरा और कमजोर बनाती हैं।
Q8.8. लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्ति अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर:
लेखक मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिजीविषा (जीवन की तीव्र इच्छा) से भी प्रचंड कोई शक्ति है क्योंकि जिजीविषा व्यक्ति को हर परिस्थिति में जीवित रहने और संघर्ष करने की प्रेरणा देती है। स्वार्थ केवल अपने लाभ के लिए होता है, जबकि जिजीविषा जीवन के प्रति प्रेम और अस्तित्व की रक्षा की भावना है। उदाहरण के तौर पर कुटज का जीवन लिया जा सकता है, जो कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहता है और अपनी जिजीविषा से जीवन को सार्थक बनाता है।
व्याख्या:
स्वार्थ सीमित और स्व-केंद्रित होता है, जबकि जिजीविषा व्यापक और जीवनदायी होती है। जिजीविषा से व्यक्ति अपने जीवन को पूरी ताकत से जीता है और विपत्तियों का सामना करता है।
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