Chapter 11
Chapter 11 — अध्ययन नोट्स
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केदारनाथ सिंह
व्याख्याकेदारनाथ सिंह
केदारनाथ सिंह का जन्म 1934 में बलिया जिले के चकिया गाँव में हुआ था। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की और फिर ‘आधुनिक हिंदी कविता में बिम्ब-विधान’ विषय पर पीएच.डी. की उपाधि हासिल की। अपने प्रारंभिक करियर में वे गोरखपुर विश्वविद्यालय में हिंदी के प्राध्यापक रहे और बाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र में हिंदी के प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हुए। केदारनाथ सिंह की कविताएँ मानवीय संवेदनाओं की गहराई को दर्शाती हैं। उनकी रचनाओं में बिम्ब-विधान का विशेष महत्व है। वे अपने काव्य में शोर-शराबे से बचते हुए शांत और संयत विद्रोह की अभिव्यक्ति करते हैं। उनकी प्रमुख काव्य-संकलन 'जमीन पक रही है' में 'जमीन', 'रोटी', 'बैल' जैसी कविताएँ शामिल हैं, जो उनकी संवेदनशीलता और विचारशीलता को दर्शाती हैं। उनकी कविताओं में जीवन और प्रकृति का गहरा संबंध है। वे मानते हैं कि जीवन के बिना प्रकृति और वस्तुएँ अर्थहीन हैं। इस दृष्टिकोण से उनकी भाषा सरल, पारदर्शी और सहज हो गई है। रोजमर्रा के अनुभव उनकी कविताओं में परिचित बिंबों के रूप में प्रकट होते हैं। उनकी कविताओं में संवादात्मकता और अपनापन स्वाभाविक रूप से झलकता है। केदारनाथ सिंह को उनकी कविता 'अकाल में सारस' के लिए 1989 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान, कुमारन आशान पुरस्कार, व्यास सम्मान, दयावती मोदी पुरस्कार जैसे कई अन्य सम्मान भी प्राप्त हुए। उनके सात काव्य संग्रह प्रकाशित हुए हैं, जिनमें 'अभी बिलकुल अभी', 'जमीन पक रही है', 'यहाँ से देखो', 'अकाल में सारस', 'उत्तर कबीर' और अन्य कविताएँ शामिल हैं। इसके अलावा उन्होंने आलोचनात्मक पुस्तकें भी लिखी हैं जैसे 'कल्पना और छायावाद' और 'आधुनिक हिंदी कविता में बिम्ब विधान का विकास'। उनके निबंध संग्रह 'मेरे समय के शब्द' और 'कब्रिस्तान में पंचायत' भी प्रसिद्ध हैं। हाल ही में उनकी चुनी हुई कविताओं का संग्रह 'प्रतिनिधि कविताएँ' प्रकाशित हुआ है। उन्होंने 'ताना-बाना' नामक विविध भारतीय भाषाओं के हिंदी अनुवादित काव्य संग्रह का संपादन भी किया है।
- केदारनाथ सिंह का जन्म बलिया जिले के चकिया गाँव में हुआ।
- उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
- उनकी कविताओं में मानवीय संवेदनाएँ और बिम्ब-विधान प्रमुख हैं।
- ‘अकाल में सारस’ के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
- उनके सात काव्य संग्रह और कई आलोचनात्मक पुस्तकें प्रकाशित हैं।
- उनकी भाषा सरल, पारदर्शी और संवादात्मक है।
- 📌 बिम्ब-विधान: कविता में प्रतीकों और छवियों का प्रयोग।
- 📌 साहित्य अकादमी पुरस्कार: भारत सरकार द्वारा दिया जाने वाला साहित्यिक सम्मान।
- 📌 आलोचनात्मक पुस्तक: साहित्य के विश्लेषण और समीक्षा पर आधारित पुस्तक।
बनारस
व्याख्याबनारस
बनारस कविता में केदारनाथ सिंह ने प्राचीनतम शहर बनारस के सांस्कृतिक वैभव और ठेठ बनारसीपन को उजागर किया है। बनारस शिव की नगरी और गंगा के साथ आस्था का केंद्र है। इस कविता में गंगा, घाट, मंदिर और घाटों के किनारे बैठे भिखारियों के कटोरे जिनमें वसंत उतरता है, का चित्रण किया गया है। बनारस में मिथकीय आस्था और मोक्ष की अवधारणा गंगा और काशी के सान्निध्य से जुड़ी है। कविता में गंगा में बंधी नाव, जलते दीप, कभी न बुझने वाली चितागिन, हवन से उठता धुआँ आदि का उल्लेख है। यह शहर अपनी ‘रौ’ में रहता है, जहाँ हर कार्य अपनी गति से होता है। बनारस में आस्था, श्रद्धा, विरक्ति, विश्वास, आश्चर्य और भक्ति का मिश्रण है। कवि ने बनारस की अति प्राचीनता, आध्यात्मिकता, भव्यता और आधुनिकता का समाहार प्रस्तुत किया है। यह कविता बनारस के रहस्यों को खोलती है और इसे एक मिथक बन चुके शहर के रूप में दर्शाती है। भाषा सरल है, पर अर्थ गहरा है। शिल्प में विवरणात्मकता और कवि की सूक्ष्म दृष्टि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। कविता में वसंत के आगमन को धूल के बवंडर के रूप में दर्शाया गया है जो शहर की जीभ को किरकिरा कर देता है। यह शहर धीरे-धीरे खुलता, भरता और खाली होता है। यहाँ रोज़-रोज़ अनंत शव अँधेरी गलियों से गंगा की ओर ले जाए जाते हैं। शहर की सामूहिक लय में धीरे-धीरे उड़ती धूल, चलते लोग, बजते घंटे और शाम का आना शामिल है। यह सब मिलकर शहर को दृढ़ता से बाँधते हैं, जिससे कुछ भी गिरता या हिलता नहीं। कवि ने बनारस के आधे जल, आधे मंत्र, आधे फूल, आधे शव, आधे नींद, आधे शंख होने की बात कही है। यह आधापन एक रहस्य है जो बिना स्तंभ के खड़ा है। राख, रोशनी, आग, पानी, धुआँ, खुशबू और उठे हुए हाथों के स्तंभ इस शहर को थामे हुए हैं। यह शहर शताब्दियों से गंगा के जल में अपनी एक टाँग पर खड़ा है और दूसरी टाँग से बिलकुल बेखबर है।
- बनारस शिव की नगरी और गंगा के साथ आस्था का केंद्र है।
- कवि ने बनारस की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विशेषताओं को उजागर किया है।
- वसंत के आगमन को धूल के बवंडर के रूप में दर्शाया गया है।
- शहर धीरे-धीरे खुलता, भरता और खाली होता है।
- बनारस आधे जल, आधे मंत्र, आधे फूल, आधे शव आदि रूपों में व्यक्त है।
- शहर की स्थिरता और सामूहिक लय कविता का प्रमुख विषय है।
- 📌 गंगा: हिन्दू धर्म में पवित्र नदी, बनारस का प्रमुख तत्व।
- 📌 वसंत: ऋतु जो जीवन और नवजीवन का प्रतीक है।
- 📌 दशाश्वमेध: बनारस का एक प्रसिद्ध घाट।
बनारस में धीरे-धीरे होने वाली घटनाएँ
व्याख्याबनारस में धीरे-धीरे होने वाली घटनाएँ
बनारस में सब कुछ धीरे-धीरे होता है। कविता में बताया गया है कि धूल धीरे-धीरे उड़ती है, लोग धीरे-धीरे चलते हैं, घंटे धीरे-धीरे बजते हैं और शाम भी धीरे-धीरे होती है। यह धीरे-धीरे होना शहर की सामूहिक लय को दर्शाता है जो दृढ़ता से पूरे शहर को बाँधती है।
अभ्यास प्रश्न — Chapter 11
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.दीप को पंक्ति में शामिल करने से क्या परिवर्तन आएगा ?
उत्तर:
दीप की महत्ता और सार्थकता बढ़ जाएगी।
Q2.अंकुर रवि को तकता है, क्योंकि
उत्तर:
वह निडर है
Q3.'स्वयंभू' का अर्थ है
उत्तर:
स्वयं ही उत्पन्न हुआ
Q4.दीप का पंक्ति में विलय प्रतीक है
उत्तर:
समष्टि के विकास का
Q5.कविता में दीप किसका प्रतीक है?
उत्तर:
मनुष्य का
Q6.दीप गर्व भरा मदमाता है, क्योंकि
उत्तर:
वह संसार को प्रकाशित करता है
Q7.लोहे के हाथ लगाने से मज़दूरों पर क्या प्रभाव पड़ा ?
उत्तर:
लोहे के हाथ लगाने से मज़दूर मर गए
Q8.खैराती, रामू और छिद्दू को आँखें खुलने पर क्या दिखने की उम्मीद थी ?
उत्तर:
अपना स्वर्ग समान राज्य
Antra के सभी 17 अध्याय
Hindi · Class 12
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