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Chapter 7

🎓 Class 12📖 Antra📖 9 नोट्स🧠 8 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~14 मिनट
Chapter 6अध्याय 7 / 17Chapter 8

Chapter 7अध्ययन नोट्स

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मलिक मुहम्मद जायसी

व्याख्या

मलिक मुहम्मद जायसी

मलिक मुहम्मद जायसी (सन् 1492–1542) उत्तर प्रदेश के अमेठी के निकट जायस नामक स्थान के निवासी थे, इसलिए उन्हें 'जायसी' कहा गया। वे अपने काल के सिद्ध और पहुँचे हुए सूफ़ी फकीर माने जाते थे। उन्होंने अपने गुरुओं के रूप में सैयद अशरफ़ और शेख बुरहान का उल्लेख किया है। जायसी सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के श्रेष्ठ कवि हैं। उनकी प्रमुख काव्य-कृति 'पद्मावत' भारतीय लोककथा पर आधारित एक प्रबंधकाव्य है, जिसमें सिंहल देश की राजकुमारी पद्मावती और चित्तौड़ के राजा रत्नसेन के प्रेम की कथा है। जायसी ने इस काव्य में लौकिक कथा के साथ-साथ अलौकिक और रहस्यमय तत्वों का समावेश किया है, जिससे प्रेम का स्वरूप मानवमात्र के लिए प्रेरणादायी बनता है। 'पद्मावत' फारसी की मसनवी शैली में रचित है, परंतु इसमें दोहा-चौपाई की शैली का प्रयोग हुआ है। उनकी भाषा ठेठ अवधी है और काव्यशैली प्रौढ़ तथा गंभीर है। जायसी की कविता में लोकजीवन का व्यापक अनुभव झलकता है, जो उनके उपमा, रूपक, लोकोक्तियाँ, मुहावरे और काव्यभाषा में स्पष्ट दिखाई देता है। उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ पद्मावत, अखरावट और आखिरी कलाम हैं, जिनमें पद्मावत उनकी प्रसिद्धि का मुख्य आधार है। इस पाठ्यपुस्तक में पद्मावत के 'बारहमासा' अंश के माध्यम से नायिका नागमती के विरह का मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया गया है।

  • मलिक मुहम्मद जायसी का जन्म 1492 में उत्तर प्रदेश के अमेठी के निकट जायस में हुआ।
  • वे सूफ़ी प्रेममार्गी शाखा के प्रसिद्ध कवि थे।
  • उनकी प्रमुख काव्य-कृति 'पद्मावत' है, जो भारतीय लोककथा पर आधारित है।
  • पद्मावत में लौकिक और अलौकिक तत्वों का समावेश है।
  • काव्य की भाषा ठेठ अवधी और शैली प्रौढ़ व गंभीर है।
  • जायसी की कविता में लोकजीवन का व्यापक अनुभव और लोक संस्कृति की छाप है।
  • 📌 सूफ़ी प्रेममार्गी: सूफ़ी परंपरा की वह शाखा जो प्रेम को आध्यात्मिक साधना का माध्यम मानती है।
  • 📌 प्रबंधकाव्य: एक लंबा काव्य जो कथा के रूप में लिखा गया हो।
  • 📌 मसनवी शैली: फारसी काव्य शैली जिसमें दोहराए गए अंत वाले दोहे होते हैं।

बारहमासा (1) – अगहन मास में विरहिणी की दशा

व्याख्या

बारहमासा (1) – अगहन मास में विरहिणी की दशा

बारहमासा के प्रथम छंद में अगहन मास (मार्गशीर्ष) की ठंडी रातों और छोटे दिनों के बीच विरहिणी नागमती की व्यथा का मार्मिक चित्रण है। अगहन मास में दिन छोटे और रातें लंबी होती हैं, जिससे विरहिणी के लिए समय काटना अत्यंत कठिन हो जाता है। नागमती अपने प्रेमी के विरह में जल रही है, जैसे दीपक की बाती जलती है। वह अपने हृदय की पीड़ा को भंवरे और काग के माध्यम से अपने प्रिय तक संदेश भेजती है। उसकी व्यथा इतनी तीव्र है कि वह बार-बार अपने प्रेमी के रंग को पाने की इच्छा व्यक्त करती है, परंतु असफल रहती है। विरह की अग्नि उसके हृदय को जलाती है और वह अपने दुख को समझने वाला कोई नहीं पाती। यह छंद उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकारों से भरा है, जैसे 'जरै विरह ज्यों दीपक बाती', 'सियरि अगिनि विरहिनि हिय जारा' आदि। इस प्रकार कवि ने अगहन मास की ठंडक और विरहिणी की पीड़ा का सजीव चित्र प्रस्तुत किया है।

  • अगहन मास में दिन छोटे और रातें लंबी होती हैं।
  • विरहिणी नागमती की पीड़ा अग्नि की तरह हृदय को जलाती है।
  • वह भंवरे और काग को संदेशवाहक बनाकर अपने प्रेमी तक संदेश भेजती है।
  • विरहिणी बार-बार अपने प्रेमी के रंग को पाने की इच्छा व्यक्त करती है।
  • काव्य में उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकारों का सुंदर प्रयोग हुआ है।
  • 📌 अगहन मास: हिन्दू पंचांग का एक महीना, जो नवंबर-दिसंबर के बीच आता है।
  • 📌 विरहिणी: वह नायिका जो अपने प्रिय से बिछड़ी हो।
  • 📌 उपमा अलंकार: किसी वस्तु की तुलना किसी दूसरी वस्तु से करना।

बारहमासा (2) – पूस मास में विरहिणी की दशा

व्याख्या

बारहमासा (2) – पूस मास में विरहिणी की दशा

बारहमासा के दूसरे छंद में पूस मास (दिसंबर-जनवरी) की ठंडी और कड़कड़ाती ठंड में विरहिणी नागमती की दशा का चित्रण है। इस मास में जाड़े की तीव्रता बढ़ जाती है, जिससे नायिका का शरीर थरथर काँपता है। विरहिणी का हृदय भी अपने प्रिय के बिना काँपता है। कवि ने च

अभ्यास प्रश्नChapter 7

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. अगहन मास की विशेषता बताते हुए विरहिणी (नागमती) की व्यथा-कथा का चित्रण अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर:

अगहन मास शीतकाल का एक महीना है जिसमें ठंड अधिक होती है और प्रकृति में विरहिणी की पीड़ा का चित्रण होता है। नागमती की व्यथा-कथा में अगहन मास की ठंड और विरह के कारण उत्पन्न वेदना का वर्णन है। वह अपने प्रिय से बिछड़ने के कारण अत्यंत दुखी है और प्रकृति की कठोरता उसके विरह को और भी गहरा करती है। इस मास में वृक्षों से पत्ते गिरते हैं और वन निर्जन हो जाते हैं, जो विरहिणी की अकेलेपन और पीड़ा को दर्शाता है। इस प्रकार अगहन मास की विशेषता और विरहिणी की व्यथा को अपने शब्दों में विस्तार से प्रस्तुत करें।

व्याख्या:

अगहन मास की विशेषता है कि यह शीतकाल का महीना है, जिसमें ठंड बढ़ जाती है। नागमती की व्यथा-कथा में यह दिखाया गया है कि कैसे ठंडी हवा, सूखे पत्ते और निर्जन वन उसकी विरह की पीड़ा को बढ़ाते हैं। वह अपने प्रिय से दूर है और प्रकृति की कठोरता उसके मन को और भी व्यथित करती है। इस प्रकार अगहन मास की प्रकृति और विरहिणी की पीड़ा का संबंध स्पष्ट होता है।

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Q2.2. ‘जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँडा’ पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।

उत्तर:

इस पंक्ति का अर्थ है कि नायिका जीवित रहते हुए भी मरे हुए की तरह दुखी है, उसने अपने प्रिय को नहीं छोड़ा है। नायिका की विरह-दशा अत्यंत पीड़ादायक है, वह अपने प्रिय के बिना जीवन को अधूरा और व्यर्थ मानती है। उसकी आत्मा में गहरा विरह और वेदना व्याप्त है, जो उसे जीते जी मृत समान बना देती है। इस पंक्ति के माध्यम से नायिका की मानसिक स्थिति और उसके विरह की तीव्रता का चित्रण होता है।

व्याख्या:

‘जीयत खाइ मुएँ नहिं छाँडा’ पंक्ति में नायिका की व्यथा प्रकट होती है कि वह अपने प्रिय से बिछड़कर जीवित रहते हुए भी मृत समान हो गई है। यह विरह की गहन पीड़ा को दर्शाता है, जिसमें नायिका का मन और हृदय दोनों टूट चुके हैं। इस पंक्ति के संदर्भ में नायिका की विरह-दशा को अपने शब्दों में समझाना आवश्यक है।

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Q3.3. माघ महीने में विरहिणी को क्या अनुभूति होती है?

उत्तर:

माघ महीने में विरहिणी को अत्यंत ठंड और अकेलेपन की अनुभूति होती है। इस महीने में प्रकृति की ठंडक और सूखे पत्तों का गिरना उसकी विरह की पीड़ा को और बढ़ा देता है। वह अपने प्रिय के बिना जीवन को शून्य और दुखद मानती है। माघ की ठंडी हवाओं और निर्जन वन की स्थिति उसके मन की उदासी और विरह की तीव्रता को दर्शाती है।

व्याख्या:

माघ मास में ठंड अधिक होती है और वृक्षों से पत्ते गिर जाते हैं, जिससे वन निर्जन हो जाते हैं। यह स्थिति विरहिणी की पीड़ा को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाती है। उसे अपने प्रिय की अनुपस्थिति में ठंड और अकेलेपन का अनुभव होता है, जो उसकी विरह-दशा को गहरा करता है।

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Q4.4. वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें किस माह में गिरते हैं? इससे विरहिणी का क्या संबंध है?

उत्तर:

वृक्षों से पत्तियाँ तथा वनों से ढाँखें माघ महीने में गिरते हैं। इससे विरहिणी का संबंध यह है कि जैसे प्रकृति में पत्ते गिरकर सूख जाते हैं और वन निर्जन हो जाते हैं, वैसे ही विरहिणी अपने प्रिय से बिछड़कर अकेली और दुखी हो जाती है। पत्तों का गिरना और वन का सूना होना उसकी विरह की पीड़ा का प्रतीक है।

व्याख्या:

माघ मास में पेड़ों से पत्ते गिरते हैं और वन सूने हो जाते हैं। यह प्राकृतिक घटना विरहिणी की मनोदशा से मेल खाती है, क्योंकि वह अपने प्रिय से दूर होकर अकेली और उदास हो जाती है। इस प्रकार पत्तों के गिरने और विरहिणी की पीड़ा के बीच एक गहरा संबंध स्थापित होता है।

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Q5.5. निम्नलिखित पंक्तियों की व्याख्या कीजिए— (क) पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग। सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग। (ख) रकत ढरा माँसू गरा, हाड़ भए सब संख। धनि सारस होइ ररि मुई, आइ समेटहु पंख।। (ग) तुम्ह बिनु कंता धनि हरुई, तन तिनुवर भा डोल। तेहि पर बिरह जराई कै, चहै उड़ावा झोल।। (घ) यह तन जारी छार कै, कहौं कि पवन उड़ाउ। मकु तेहि मारग होइ परीं, कंत धरैं जहँ पाउ।

उत्तर:

(क) इस पंक्ति में भँवरा और काग को संदेशवाहक बताया गया है जो प्रिय को संदेश देते हैं। 'सो धनि बिरहें जरि मुई' का अर्थ है कि पत्नी (धनि) विरह में जलकर मर गई है, और उसका धुआँ (पीड़ा) हम महसूस करते हैं। (ख) यहाँ कहा गया है कि रक्त गिरा है, माँस गल गया है, हड्डियाँ सब संकुचित हो गई हैं। पत्नी सारस की तरह रट-रट कर रो रही है, और अपने पंख समेट रही है। यह विरह की गहन पीड़ा को दर्शाता है। (ग) बिना पति के पत्नी हरियाली (खुशी) खो चुकी है, तन तिनके की तरह डोल रहा है। उस पर विरह की आग लगी है, जो झकझोरना चाहती है। (घ) यह शरीर जारी (जलकर) छूट गया है, कह रही है कि पवन इसे उड़ाए। शायद यह मार्ग हो जहाँ पति है, जिसे वह पकड़ सके। यह विरहिणी की आत्मा की व्यथा को दर्शाता है।

व्याख्या:

प्रत्येक पंक्ति में विरहिणी की पीड़ा और उसके मन की व्यथा का चित्रण है। संदेशवाहक के माध्यम से प्रिय को संदेश भेजना, शरीर की पीड़ा, विरह की आग और आत्मा की व्यथा को सुंदर रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन पंक्तियों की व्याख्या से काव्य की गहराई और भावनात्मक प्रभाव समझा जा सकता है।

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Q6.6. प्रथम दो छंदों में से अलंकार छाँटकर लिखिए और उनसे उत्पन्न काव्य-सौंदर्य पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर:

प्रथम दो छंदों में अलंकार निम्नलिखित हैं: - उपमा अलंकार: 'ऐ भँवरा ऐ काग' में भँवरा और काग को संदेशवाहक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। - रूपक अलंकार: 'धनि बिरहें जरि मुई' में पत्नी को जलते हुए बताया गया है, जो विरह की तीव्रता दर्शाता है। - अनुप्रास अलंकार: 'सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग' में ध्वनि की पुनरावृत्ति है। इन अलंकारों से काव्य में भावों की गहराई और सौंदर्य उत्पन्न होता है। अलंकारों के कारण पाठक को विरहिणी की पीड़ा अधिक प्रभावशाली ढंग से समझ में आती है और काव्य की छवि जीवंत हो उठती है।

व्याख्या:

अलंकार काव्य की शोभा बढ़ाते हैं। उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकारों के प्रयोग से भावों की अभिव्यक्ति सजीव और प्रभावशाली होती है। प्रथम दो छंदों में इन अलंकारों का प्रयोग काव्य-सौंदर्य को बढ़ाता है और विरहिणी की व्यथा को पाठक के हृदय तक पहुँचाता है।

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Q7.## योग्यता-विस्तार 1. किसी अन्य कवि द्वारा रचित विरह वर्णन की दो कविताएँ चुनकर लिखिए और अपने अध्यापक को दिखाइए।

उत्तर:

यह प्रश्न विद्यार्थियों को अन्य कवियों द्वारा रचित विरह वर्णन की कविताएँ खोजने और प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करता है। विद्यार्थी दो ऐसी कविताएँ चुनें जिनमें विरह की भावनाएँ स्पष्ट रूप से व्यक्त हुई हों। उन्हें अपने शब्दों में लिखकर शिक्षक को प्रस्तुत करें।

व्याख्या:

यह प्रश्न विद्यार्थियों की शोध क्षमता और विरह विषय पर उनकी समझ को बढ़ाने के लिए है। इससे वे विभिन्न कवियों के दृष्टिकोण और काव्यशैली से परिचित होते हैं।

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Q8.## योग्यता-विस्तार 2. ‘नागमती वियोग खंड’ पूरा पढ़िए और जायसी के बारे में जानकारी प्राप्त कीजिए।

उत्तर:

विद्यार्थी ‘नागमती वियोग खंड’ को पूरा पढ़ें और उसमें प्रयुक्त भाषा, भाव, और काव्यशैली को समझें। इसके साथ ही, मेलिक मुहम्मद जायसी के जीवन, काव्य-कृतियों और साहित्यिक योगदान के बारे में जानकारी एकत्रित करें। इस अध्ययन से उनकी साहित्यिक समझ और ज्ञान में वृद्धि होगी।

व्याख्या:

यह प्रश्न विद्यार्थियों को गहन अध्ययन और शोध के लिए प्रेरित करता है। ‘नागमती वियोग खंड’ के अध्ययन से वे काव्य की गहराई समझेंगे और जायसी के साहित्यिक महत्व को जानेंगे।

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