Chapter 8
Chapter 8 — अध्ययन नोट्स
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विद्यापति
व्याख्याविद्यापति
विद्यापति का जन्म बिहार के मधुबनी जिले के बिस्पी गाँव में हुआ था। उनका जन्मकाल सन् 1380 से 1460 के बीच माना जाता है, हालांकि इनके जन्म और मृत्यु के सटीक वर्ष के बारे में कोई प्रामाणिक सूचना उपलब्ध नहीं है। विद्यापति मिथिला के नरेश राजा शिवसिंह के अभिन्न मित्र, राजकवि एवं सलाहकार थे। बचपन से ही विद्यापति अत्यंत बुद्धिमान, तर्कशील और विद्वान थे। वे साहित्य, संस्कृति, संगीत, ज्योतिष, इतिहास, दर्शन, न्याय, भूगोल आदि अनेक विषयों में पारंगत थे। उन्होंने संस्कृत, अवहट्ट (अपभ्रंश) और मैथिली भाषाओं में रचनाएँ कीं। इसके अतिरिक्त वे कई अन्य भाषाओं और उपभाषाओं के भी ज्ञाता थे। विद्यापति को आदिकाल और भक्तिकाल के संधिकवि के रूप में माना जाता है। उनकी रचनाओं में दरबारी संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट दिखता है, साथ ही उनकी पदावली में भक्ति और शृंगार की गूंज भी सुनाई देती है। उनकी पदावली ही उनकी प्रसिद्धि का मुख्य आधार है। वे हिंदी साहित्य के मध्यकाल के पहले ऐसे कवि हैं जिनकी पदावली में जनभाषा और लोकसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है। मिथिला क्षेत्र के लोक-व्यवहार और सांस्कृतिक अनुष्ठानों में विद्यापति के पद इतने गहरे समाहित हो गए हैं कि उनकी पंक्तियाँ वहाँ के मुहावरों का रूप ले चुकी हैं। उनके पदों में लालित्य, मानवीय प्रेम, व्यावहारिक जीवन के रंग, राधा-कृष्ण के प्रेम के माध्यम से लौकिक प्रेम के विभिन्न रूपों का चित्रण, देवी-देवताओं की भक्ति, प्रकृति की मनोहर छवि आदि उनकी अपूर्व प्रतिभा और कल्पनाशीलता के प्रमाण हैं। विद्यापति की प्रमुख कृतियाँ कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा, भू-परिक्रमा, लिखनावली और पदावली हैं। उनकी पदावली में प्रेम और सौंदर्य की गहरी अनुभूति दुर्लभ है।
- विद्यापति का जन्म मधुबनी (बिहार) के बिस्पी गाँव में हुआ।
- वे राजा शिवसिंह के अभिन्न मित्र, राजकवि और सलाहकार थे।
- विद्यापति संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली भाषाओं के ज्ञाता थे।
- उनकी पदावली में भक्ति और शृंगार की गूंज सुनाई देती है।
- मिथिला क्षेत्र की लोकसंस्कृति में उनके पद गहरे समाहित हैं।
- उनकी प्रमुख कृतियाँ कीर्तिलता, कीर्तिपताका, पुरुष परीक्षा आदि हैं।
- 📌 विद्यापति: 14वीं-15वीं शताब्दी के मैथिली और संस्कृत के कवि।
- 📌 पदावली: गीतों और पदों का संग्रह।
- 📌 अवहट्ट: अपभ्रंश भाषा का एक रूप।
पदों का परिचय
व्याख्यापदों का परिचय
इस पाठ्यपुस्तक में विद्यापति के तीन पद संकलित हैं, जिनमें विरहिणी नायिका की मनोदशा, प्रेम की गहराई और विरह का दुख अत्यंत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है। पहले पद में विरहिणी नायिका के हृदय के उद्गार प्रकट होते हैं। वह अत्यंत दुखी और कातर है क्योंकि उसका प्रियतम गोकुल छोड़कर मधुपुर (मथुरा) जा बसे हैं। नायिका का हृदय उसके प्रियतम द्वारा हर लिया गया है और वह अकेली भवन में रह रही है। कवि ने कार्तिक मास में प्रियतम के आने की संभावना भी प्रकट की है। दूसरे पद में नायिका अपनी सखी से कहती है कि वह जन्म-जन्मांतर से अपने प्रियतम का रूप देखती रही, परंतु उसकी आँखें अभी तक संतुष्ट नहीं हुईं। उसके कानों में प्रियतम के मधुर बोल गूँजते रहते हैं, लेकिन वह फिर भी तृप्त नहीं है। तीसरे पद में विरहिणी नायिका की शारीरिक और मानसिक दशा का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। वह कुसुमित कानन (फूलों से भरा वन) में कमलमुखि (कमल के समान मुख वाली) है, लेकिन उसके दोनों नेत्र बंद हैं। कोयल की कूक और मधुकर की धुन सुनकर भी वह झाँप कर कान बंद कर लेती है। उसकी कातर दृष्टि से वह प्रियतम को चारों ओर ढूँढ़ती रहती है, परंतु वह नहीं मिलता। उसकी आँखों से अश्रुधारा बह रही है और वह क्षण-क्षण क्षीण होती जा रही है। यह तीन पद विरहिणी नायिका की पीड़ा, प्रेम की गहराई और विरह के कष्टों को अत्यंत मार्मिक और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करते हैं।
- पाठ्यपुस्तक में विद्यापति के तीन पद संकलित हैं।
- पहले पद में विरहिणी के हृदय के उद्गार हैं।
- दूसरे पद में नायिका की प्रियतमा के प्रति अनंत प्रेम की अभिव्यक्ति है।
- तीसरे पद में विरहिणी की मानसिक और शारीरिक दशा का चित्रण है।
- तीनों पदों में विरह की पीड़ा और प्रेम की गहराई स्पष्ट है।
- 📌 विरहिणी नायिका: प्रेमी से दूर रहने वाली नायिका।
- 📌 कार्तिक मास: हिन्दू पंचांग का एक महीना, जिसमें प्रेम और विरह की अनुभूतियाँ गहरी होती हैं।
- 📌 कुसुमित कानन: फूलों से भरा हुआ वन।
पद (1)
व्याख्यापद (1)
पहले पद में विद्यापति ने विरहिणी नायिका के हृदय की पीड़ा को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत किया है। नायिका कहती है कि उसका प्रियतम पत्र लेकर उससे दूर जा रहा है। उसका हृदय इस असहनीय दुख को सह नहीं पा रहा है। सावन का महीना है, जो प्रेमियों के लिए विशे
अभ्यास प्रश्न — Chapter 8
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. प्रियतमा के दुख के क्या कारण हैं?
उत्तर:
प्रियतमा के दुख के कारण हैं कि वह अपनी प्रियतम से दूर है। कवि ने इस दूरी और विरह की पीड़ा को व्यक्त किया है, जिससे प्रियतमा का मन व्यथित है।
व्याख्या:
कवि ने प्रियतमा के मन की पीड़ा को विरह की स्थिति से जोड़ा है, जहाँ प्रियतम की अनुपस्थिति से दुख उत्पन्न होता है।
Q2.2. कवि ‘नयन न तिरपित भेल’ के माध्यम से विरहिणी नायिका की किस मनोदशा को व्यक्त करना चाहता है?
उत्तर:
‘नयन न तिरपित भेल’ से कवि विरहिणी नायिका की व्यथा और असंतोष की मनोदशा व्यक्त करता है। इसका अर्थ है कि नायिका के नेत्र तृप्त नहीं हुए, यानी वह अपने प्रियतम की अनुपस्थिति में संतुष्ट नहीं है।
व्याख्या:
यह पंक्ति नायिका की व्याकुलता और विरह की पीड़ा को दर्शाती है, जो उसकी मनोदशा को स्पष्ट करती है।
Q3.3. नायिका के प्राण तूप्त न हो पाने का कारण अपने शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
नायिका के प्राण तूप्त न हो पाने का कारण यह है कि वह अपने प्रियतम से दूर है और उसकी अनुपस्थिति में उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती। उसकी व्यथा और विरह की पीड़ा उसे संतुष्ट नहीं होने देती।
व्याख्या:
यह स्थिति नायिका की गहरी विरह भावना को दर्शाती है, जिससे उसकी आत्मा को तृप्ति नहीं मिलती।
Q4.4. ‘सेह पिरित अनुराग बखानिअ तिल-तिल नूतन होए’ से लेखक का क्या आशय है?
उत्तर:
इस पंक्ति का आशय है कि प्रेम और अनुराग की व्याख्या बार-बार करने से वह नया या ताजा नहीं होता। प्रेम की अनुभूति और भावना को बार-बार बयान करने से उसकी ताजगी या नवीनता नहीं आती।
व्याख्या:
लेखक यह बताना चाहता है कि प्रेम की अनुभूति स्वाभाविक और गहन होती है, जिसे बार-बार शब्दों में व्यक्त करने से उसकी गहराई कम नहीं होती।
Q5.5. कोयल और भौरों के कलरव का नायिका पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
कोयल और भौरों के कलरव से नायिका की व्यथा और विरह की पीड़ा और बढ़ जाती है। उनकी मधुर आवाज़ें नायिका को उसके प्रियतम की याद दिलाती हैं, जिससे उसका मन और अधिक व्याकुल हो जाता है।
व्याख्या:
प्रकृति की ये आवाज़ें नायिका के मन की भावनाओं को प्रबल करती हैं और उसकी विरह की पीड़ा को गहरा करती हैं।
Q6.6. कातर दृष्टि से चारों तरफ प्रियतम को ढूँढ़ने की मनोदशा को कवि ने किन शब्दों में व्यक्त किया है?
उत्तर:
कवि ने कातर दृष्टि से चारों तरफ प्रियतम को ढूँढ़ने की मनोदशा को इस प्रकार व्यक्त किया है कि नायिका निरंतर अपने प्रियतम की खोज में चारों ओर देखती रहती है, उसकी दृष्टि व्याकुल और कातर होती है।
व्याख्या:
यह मनोदशा नायिका की बेचैनी और विरह की पीड़ा को दर्शाती है, जहाँ वह हर जगह अपने प्रियतम को खोजती है।
Q7.7. निम्नलिखित शब्दों के तत्सम रूप लिखिए— ‘तिरपित, छन, बिदगध, निहारल, पिरित, साओन, अपजस, छिन, तोहारा, कातिक’
उत्तर:
तिरपित - तृप्त छन - क्षण बिदगध - विदग्ध निहारल - निहारित पिरित - प्रीत साओन - सावन अपजस - अपयश छिन - क्षण तोहारा - तुम्हारा कातिक - कार्तिक
व्याख्या:
यह शब्द संस्कृत से लिए गए हैं, इसलिए इनके तत्सम रूप संस्कृत के समान होते हैं।
Q8.8. निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए— (क) एकसरि भवन पिआ बिनु रे मोहि रहलो न जाए। सखि अनकर दुख दारुन रे जग के पतिआए।। (ख) जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपित भेल।। सेहो मधुर बोल स्वनहि सुनल सुति पथ परस न गेल।। (ग) कुसुमित कानन हेरि कमलमुखि, मृदि रहए दु नयान। कोकिल-कलरव, मधुकर-धुनि सुनि, कर देइ झाँपइ कान।।
उत्तर:
(क) बिना अपने प्रियतम के, मैं अपने घर में रह नहीं पाती। मेरी सहेली, दूसरों के दुख को देखकर दुनिया की बातों पर विश्वास करती है। (ख) जन्म भर मैंने अपने रूप को देखा, पर मेरी आँखें संतुष्ट नहीं हुईं। वही मधुर बोल मैंने सुने, पर उनकी आवाज़ सुनकर भी मैं चैन से नहीं सो पाई। (ग) फूलों से भरे बाग को देखकर, कमल के समान मुख वाली सुंदरी की आँखें नम हो जाती हैं। कोयल की कलरव और मधुकर की धुन सुनकर, वह अपने कान झाँप लेती है।
व्याख्या:
यह तीनों श्लोक नायिका की व्यथा, विरह की पीड़ा और उसकी मनोदशा को स्पष्ट करते हैं।
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