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Chapter 9

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - History of India (1740-1947 AD) (Hindi)📖 9 नोट्स⏱️ ~14 मिनट
Chapter 8अध्याय 9 / 20Chapter 10

Chapter 9अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

भूमिका

व्याख्या

भूमिका

इस अध्याय की भूमिका में भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान भू-राजस्व व्यवस्था के परिवर्तन की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई है। 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जब अंग्रेजों ने भारत में अपने शासन की नींव रखी, तब उन्होंने राजस्व वसूली के लिए विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग व्यवस्थाएँ लागू कीं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य राजस्व की अधिकतम प्राप्ति था, जिससे ब्रिटिश सरकार को आर्थिक लाभ मिल सके। भारत में पहले से चली आ रही पारंपरिक भू-राजस्व व्यवस्थाएँ, जैसे ज़मींदारी, रैयत, और महल, को अंग्रेजों ने अपने अनुसार परिवर्तित किया। इस अध्याय में स्थायी, रैयतवाड़ी तथा महलवाड़ी भू-राजस्व व्यवस्थाओं की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उनके कार्यान्वयन, प्रभाव और परिणामों का विश्लेषण किया गया है।

  • ब्रिटिश शासन के दौरान भू-राजस्व व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए।
  • अंग्रेजों ने राजस्व वसूली के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग व्यवस्थाएँ अपनाईं।
  • स्थायी, रैयतवाड़ी और महलवाड़ी भू-राजस्व व्यवस्थाएँ प्रमुख थीं।
  • इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य राजस्व की अधिकतम प्राप्ति था।
  • भारत की पारंपरिक व्यवस्थाओं को अंग्रेजों ने अपने अनुसार परिवर्तित किया।
  • 📌 भू-राजस्व व्यवस्था: भूमि से प्राप्त होने वाला कर या राजस्व।
  • 📌 ब्रिटिश शासन: 18वीं शताब्दी के बाद भारत में अंग्रेजों का प्रशासन।

स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था

व्याख्या

स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था

स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था को 'स्थायी बंदोबस्त' भी कहा जाता है। यह व्यवस्था 1793 में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य राजस्व वसूली को स्थायी रूप से निश्चित करना था। इस व्यवस्था के तहत ज़मींदारों को भूमि का मालिक मान लिया गया और उनसे निश्चित वार्षिक राजस्व लिया गया। इस व्यवस्था में राजस्व की दर स्थायी रूप से निर्धारित कर दी गई, जिससे ज़मींदारों को भूमि पर अधिकार मिल गया और वे किसानों से किराया वसूलने लगे। स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था के कारण किसानों की स्थिति दयनीय हो गई क्योंकि ज़मींदारों ने उनसे अधिक किराया वसूला और उन्हें भूमि से बेदखल कर दिया।

  • स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था 1793 में लागू की गई।
  • ज़मींदारों को भूमि का मालिक मान लिया गया।
  • राजस्व की दर स्थायी रूप से निर्धारित की गई।
  • किसानों की स्थिति खराब हुई।
  • ब्रिटिश सरकार को स्थिर राजस्व प्राप्त हुआ।
  • 📌 स्थायी बंदोबस्त: भूमि पर स्थायी रूप से राजस्व निर्धारण।
  • 📌 ज़मींदार: भूमि का मालिक, जो किसानों से किराया वसूलता है।

स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था का प्रभाव

अवधारणा

स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था का प्रभाव

स्थायी भू-राजस्व व्यवस्था के लागू होने के बाद भारतीय समाज में कई परिवर्तन हुए। ज़मींदारों को भूमि का मालिकाना अधिकार मिल गया, जिससे वे अधिक शक्तिशाली हो गए। किसानों की स्थिति कमजोर हो गई क्योंकि वे ज़मींदारों के अधीन हो गए। इस व्यवस्था के कारण कृषि क