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Chapter 10

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - History of India (1740-1947 AD) (Hindi)📖 11 नोट्स⏱️ ~17 मिनट
Chapter 9अध्याय 10 / 20Chapter 11

Chapter 10अध्ययन नोट्स

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परिचय

व्याख्या

परिचय

इस खंड में मुख्य सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई है। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में भारत में सामाजिक और धार्मिक क्षेत्र में गहरे परिवर्तन हुए। अंग्रेज़ी शासन के आगमन के साथ ही भारतीय समाज में नई चेतना का संचार हुआ। पश्चिमी शिक्षा, विज्ञान, और तर्क के प्रभाव से भारतीय समाज ने अपने पुराने रीति-रिवाजों, अंधविश्वासों, और कुरीतियों पर पुनर्विचार करना आरंभ किया। इस काल में सती प्रथा, बाल विवाह, जातिवाद, अंधविश्वास, और महिलाओं की दयनीय स्थिति जैसी समस्याएँ व्यापक थीं। सामाजिक सुधारकों ने इन कुरीतियों के विरुद्ध आवाज़ उठाई और समाज में जागरूकता लाने का प्रयास किया। धार्मिक क्षेत्र में भी सुधार की आवश्यकता महसूस की गई, जिससे अनेक धार्मिक सुधार आंदोलन उभरे। इन आंदोलनों का उद्देश्य भारतीय समाज को आधुनिक, प्रगतिशील और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से संपन्न बनाना था।

  • अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की आवश्यकता महसूस हुई।
  • पश्चिमी शिक्षा और विज्ञान ने भारतीय समाज को प्रभावित किया।
  • सती प्रथा, बाल विवाह, जातिवाद जैसी कुरीतियाँ समाज में प्रचलित थीं।
  • सुधारकों ने समाज में जागरूकता लाने का प्रयास किया।
  • धार्मिक क्षेत्र में भी सुधार की आवश्यकता महसूस की गई।
  • 📌 सामाजिक सुधार: समाज की कुरीतियों को दूर करने के लिए किए गए प्रयास।
  • 📌 धार्मिक सुधार: धर्म के क्षेत्र में अंधविश्वासों और रूढ़ियों को दूर करने के लिए किए गए प्रयास।

सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की आवश्यकता

व्याख्या

सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की आवश्यकता

इस खंड में बताया गया है कि सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों की आवश्यकता क्यों पड़ी। अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में भारतीय समाज में अनेक कुरीतियाँ व्याप्त थीं, जैसे सती प्रथा, बाल विवाह, बहुविवाह, जातिवाद, छुआछूत, और महिलाओं की दयनीय स्थिति। धार्मिक क्षेत्र में भी अंधविश्वास, मूर्तिपूजा, और कर्मकांडों का बोलबाला था। अंग्रेज़ी शासन के साथ पश्चिमी शिक्षा और विचारधारा का प्रसार हुआ, जिससे भारतीय समाज में आत्मचिंतन की प्रवृत्ति बढ़ी। समाज के प्रबुद्ध वर्ग ने महसूस किया कि यदि इन कुरीतियों को दूर नहीं किया गया तो भारतीय समाज पिछड़ा रह जाएगा। साथ ही, राष्ट्रीय आंदोलन के लिए भी एक सशक्त और जागरूक समाज की आवश्यकता थी। अतः सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों का आरंभ हुआ, जिनका उद्देश्य समाज को आधुनिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील बनाना था।

  • भारतीय समाज में अनेक कुरीतियाँ प्रचलित थीं।
  • महिलाओं की स्थिति अत्यंत दयनीय थी।
  • धार्मिक क्षेत्र में अंधविश्वास और रूढ़ियाँ थीं।
  • पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव से समाज में जागरूकता आई।
  • राष्ट्रीय आंदोलन के लिए भी सुधार आवश्यक था।
  • 📌 सती प्रथा: पति की मृत्यु के बाद पत्नी को जीवित जला देने की प्रथा।
  • 📌 जातिवाद: समाज का जातियों में विभाजन और ऊँच-नीच का भेदभाव।

ब्रह्म समाज

व्याख्या

ब्रह्म समाज

ब्रह्म समाज की स्थापना 1828 में राजा राममोहन राय ने की थी। इसका मुख्य उद्देश्य हिंदू धर्म में व्याप्त अंधविश्वासों, मूर्तिपूजा, और सामाजिक कुरीतियों को दूर करना था। ब्रह्म समाज ने एकेश्वरवाद (एक ईश्वर में विश्वास) का प्रचार किया और तर्क, विज्ञान, तथा