Ch 8निःशुल्क

Chapter 8

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - Macro Economics (Hindi)📖 9 नोट्स⏱️ ~14 मिनट
Chapter 6अध्याय 7 / 15Chapter 9

Chapter 8अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

8.1 परिचय

व्याख्या

8.1 परिचय

इस अनुभाग में व्याज के सिद्धांतों का परिचय दिया गया है। व्याज दर वह दर है जिस पर पूंजी का उधार लिया जाता है या निवेश किया जाता है। यह अर्थव्यवस्था में पूंजी के प्रवाह, बचत, निवेश तथा समग्र मांग-आपूर्ति को प्रभावित करती है। व्याज दर के निर्धारण को समझना इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह आर्थिक गतिविधियों, रोजगार, उत्पादन और मूल्य स्तर को प्रभावित करती है। पारंपरिक, नव-पारंपरिक और कीन्सियन सिद्धांतों ने व्याज दर के निर्धारण के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया है। पारंपरिक सिद्धांतों में पूंजी की मांग और पूर्ति के संतुलन पर बल दिया गया है, जबकि नव-पारंपरिक विचारधारा ने मुद्रा की भूमिका को भी जोड़ा है। कीन्सियन दृष्टिकोण ने तरलता वरीयता (liquidity preference) के आधार पर व्याज दर के निर्धारण को समझाया है। इस अध्याय में इन तीनों प्रमुख दृष्टिकोणों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा।

  • व्याज दर पूंजी के मूल्य को दर्शाती है।
  • व्याज दर का निर्धारण आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करता है।
  • तीन प्रमुख सिद्धांत: पारंपरिक, नव-पारंपरिक, कीन्सियन।
  • हर सिद्धांत ने व्याज दर के निर्धारण की प्रक्रिया को अलग तरीके से समझाया है।
  • व्याज दर बचत और निवेश के बीच संतुलन स्थापित करती है।
  • 📌 व्याज दर: पूंजी पर मिलने या देने वाली दर।
  • 📌 पूंजी: उत्पादन के लिए आवश्यक संसाधन।
  • 📌 निवेश: भविष्य के लाभ के लिए पूंजी का प्रयोग।

8.2 पारंपरागत (क्लासिकल) व्याज सिद्धांत

अवधारणा

8.2 पारंपरागत (क्लासिकल) व्याज सिद्धांत

पारंपरिक या क्लासिकल व्याज सिद्धांत के अनुसार, व्याज दर का निर्धारण पूंजी की मांग और पूर्ति के संतुलन से होता है। इस सिद्धांत के अनुसार, पूंजी की मांग निवेश के लिए होती है और पूंजी की पूर्ति बचत के माध्यम से होती है। जब पूंजी की मांग और पूर्ति बराबर होती है, तब जो व्याज दर बनती है, वही संतुलन व्याज दर होती है। क्लासिकल अर्थशास्त्री जैसे एडम स्मिथ, डेविड रिकार्डो, जे.एस. मिल आदि ने इस सिद्धांत को प्रतिपादित किया। वे मानते थे कि पूंजी की मांग निवेश पर निर्भर करती है, जो कि व्याज दर के विपरीत अनुपाती होती है। पूंजी की पूर्ति बचत पर निर्भर करती है, जो कि व्याज दर के समानुपाती होती है। इस प्रकार, यदि व्याज दर बढ़ती है, तो बचत बढ़ती है और निवेश घटता है, जिससे पूंजी की मांग और पूर्ति में संतुलन स्थापित होता है।

  • व्याज दर पूंजी की मांग और पूर्ति के संतुलन से निर्धारित होती है।
  • बचत और निवेश, पूंजी की पूर्ति और मांग के रूप में कार्य करते हैं।
  • बचत व्याज दर के साथ बढ़ती है, निवेश व्याज दर के साथ घटता है।
  • संतुलन व्याज दर पर बचत और निवेश बराबर होते हैं।
  • मुद्रा की भूमिका को नगण्य माना गया है।
  • 📌 बचत: आय का वह भाग जो उपभोग में नहीं आता।
  • 📌 निवेश: उत्पादन साधनों में पूंजी का प्रयोग।
  • 📌 संतुलन व्याज दर: जहाँ S = I हो।

8.3 नव-पारंपरागत (नियो-क्लासिकल) व्याज सिद्धांत

अवधारणा

8.3 नव-पारंपरागत (नियो-क्लासिकल) व्याज सिद्धांत

नव-पारंपरागत या नियो-क्लासिकल व्याज सिद्धांत ने क्लासिकल सिद्धांत में कुछ सुधार किए। इस सिद्धांत के अनुसार, व्याज दर के निर्धारण में पूंजी की मांग और पूर्ति के साथ-साथ मुद्रा की मांग और पूर्ति की भी भूमिका है। नियो-क्लासिकल अर्थशास्त्रियों ने माना कि