Ch 6निःशुल्क

Chapter 6

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - Macro Economics (Hindi)📖 10 नोट्स⏱️ ~15 मिनट
Chapter 5अध्याय 6 / 15Chapter 8

Chapter 6अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

6.1 कीन्स का उपभोग फलन

व्याख्या

6.1 कीन्स का उपभोग फलन

इस अनुभाग में कीन्स के उपभोग फलन की अवधारणा को विस्तार से समझाया गया है। जॉन मेनार्ड कीन्स ने उपभोग के व्यवहार को समझने के लिए उपभोग फलन (Consumption Function) का प्रतिपादन किया। कीन्स के अनुसार, किसी भी अर्थव्यवस्था में कुल उपभोग (C) और कुल आय (Y) के बीच एक स्थिर और कार्यात्मक संबंध होता है। कीन्स ने यह बताया कि जैसे-जैसे आय बढ़ती है, उपभोग भी बढ़ता है, लेकिन उपभोग की वृद्धि आय की वृद्धि से कम होती है। इसका अर्थ है कि आय का कुछ भाग बचत के रूप में रह जाता है। कीन्स ने उपभोग फलन को निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया: C = a + bY, जहाँ a स्वायत्त उपभोग (Autonomous Consumption) है, जो उस स्थिति में भी होता है जब आय शून्य हो, और b सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Consume - MPC) है, जो दर्शाता है कि आय में एक इकाई की वृद्धि से उपभोग में कितनी वृद्धि होती है। कीन्स के उपभोग फलन का अर्थव्यवस्था के निर्धारण में विशेष महत्व है क्योंकि यह दर्शाता है कि उपभोग और बचत का व्यवहार किस प्रकार आय के साथ बदलता है।

  • कीन्स ने उपभोग फलन को आय और उपभोग के बीच कार्यात्मक संबंध के रूप में प्रस्तुत किया।
  • उपभोग फलन का सामान्य रूप C = a + bY है।
  • a स्वायत्त उपभोग है, जो आय न होने पर भी किया जाता है।
  • b सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) है, जो आय में वृद्धि के साथ उपभोग में परिवर्तन दर्शाता है।
  • आय बढ़ने पर उपभोग बढ़ता है, परंतु उपभोग की वृद्धि आय की वृद्धि से कम होती है।
  • कीन्स का उपभोग फलन अल्पकालिक अवधारणा है।
  • 📌 उपभोग फलन: आय और उपभोग के बीच कार्यात्मक संबंध।
  • 📌 स्वायत्त उपभोग (a): वह उपभोग जो आय न होने पर भी किया जाता है।
  • 📌 सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (b या MPC): आय में एक इकाई की वृद्धि से उपभोग में होने वाली वृद्धि।

6.2 सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) और औसत उपभोग प्रवृत्ति (APC)

अवधारणा

6.2 सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC) और औसत उपभोग प्रवृत्ति (APC)

इस अनुभाग में सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (Marginal Propensity to Consume - MPC) और औसत उपभोग प्रवृत्ति (Average Propensity to Consume - APC) की अवधारणाओं को विस्तार से समझाया गया है। MPC से तात्पर्य है कि आय में एक इकाई की वृद्धि होने पर उपभोग में कितनी वृद्धि होती है। इसे निम्नलिखित सूत्र से व्यक्त किया जाता है: MPC = उपभोग में परिवर्तन (ΔC) ÷ आय में परिवर्तन (ΔY)। APC का अर्थ है कुल उपभोग (C) का कुल आय (Y) से अनुपात। इसे सूत्र से व्यक्त किया जाता है: APC = C ÷ Y। MPC और APC दोनों ही उपभोग के व्यवहार को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। MPC का मान 0 और 1 के बीच होता है, अर्थात आय में वृद्धि का कुछ भाग उपभोग में और शेष बचत में जाता है। APC का मान भी 0 और 1 के बीच होता है, परंतु अल्प आय स्तर पर APC अधिक होता है और जैसे-जैसे आय बढ़ती है, APC घटता है।

  • MPC दर्शाता है कि आय में एक इकाई की वृद्धि से उपभोग में कितनी वृद्धि होती है।
  • APC कुल उपभोग का कुल आय से अनुपात है।
  • MPC = ΔC ÷ ΔY और APC = C ÷ Y।
  • MPC का मान 0 और 1 के बीच होता है।
  • आय बढ़ने पर APC घटता है।
  • MPC और APC उपभोग के व्यवहार को समझने के लिए आवश्यक हैं।
  • 📌 सीमांत उपभोग प्रवृत्ति (MPC): आय में एक इकाई की वृद्धि से उपभोग में होने वाली वृद्धि।
  • 📌 औसत उपभोग प्रवृत्ति (APC): कुल उपभोग का कुल आय से अनुपात।

6.3 बचत फलन

व्याख्या

6.3 बचत फलन

इस अनुभाग में बचत फलन (Saving Function) की अवधारणा को विस्तार से समझाया गया है। बचत फलन वह संबंध है जो कुल आय (Y) और कुल बचत (S) के बीच होता है। कीन्स के अनुसार, बचत फलन को निम्नलिखित रूप में लिखा जा सकता है: S = -a + (1-b)Y, जहाँ a स्वायत्त उपभोग है