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Chapter 5

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - Macro Economics (Hindi)📖 9 नोट्स⏱️ ~14 मिनट
Chapter 4अध्याय 5 / 15Chapter 6

Chapter 5अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

5.1 परिचय

व्याख्या

5.1 परिचय

इस अनुभाग में कीन्सियन सिद्धांत के उद्भव और महत्व को समझाया गया है। कीन्सियन सिद्धांत का विकास 1936 में जॉन मेनार्ड कीन्स द्वारा 'द जनरल थ्योरी ऑफ एम्प्लॉयमेंट, इंटरेस्ट एंड मनी' नामक पुस्तक में किया गया था। इस सिद्धांत ने पारंपरिक क्लासिकल अर्थशास्त्र की मान्यताओं को चुनौती दी, जिसमें पूर्ण रोजगार की स्थिति को सामान्य माना जाता था। कीन्स ने बताया कि बाजार की शक्तियाँ हमेशा पूर्ण रोजगार की स्थिति प्राप्त नहीं कर सकतीं, और सरकार की हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है। कीन्सियन सिद्धांत के अनुसार, रोजगार का स्तर प्रभावपूर्ण मांग (Effective Demand) पर निर्भर करता है, न कि केवल मजदूरी दर या पूंजी की उपलब्धता पर। इस सिद्धांत ने आर्थिक मंदी और बेरोजगारी की समस्याओं को समझने में नई दृष्टि प्रदान की।

  • कीन्सियन सिद्धांत 1936 में प्रकाशित हुआ था।
  • यह सिद्धांत प्रभावपूर्ण मांग पर आधारित है।
  • क्लासिकल सिद्धांत की पूर्ण रोजगार की धारणा को चुनौती दी गई।
  • सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता को स्वीकार किया गया।
  • आर्थिक मंदी और बेरोजगारी की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत किया।
  • 📌 कीन्सियन सिद्धांत: रोजगार का स्तर प्रभावपूर्ण मांग पर निर्भर करता है।
  • 📌 प्रभावपूर्ण मांग: वह मांग जो उत्पादन और रोजगार का निर्धारण करती है।

5.2 प्रभावपूर्ण मांग का अर्थ

परिभाषा

5.2 प्रभावपूर्ण मांग का अर्थ

प्रभावपूर्ण मांग वह कुल मांग है जो किसी अर्थव्यवस्था में उत्पादन और रोजगार के स्तर को निर्धारित करती है। कीन्स के अनुसार, प्रभावपूर्ण मांग दो घटकों से मिलकर बनती है: उपभोग व्यय (Consumption Expenditure) और निवेश व्यय (Investment Expenditure)। जब कुल मांग (Aggregate Demand) कुल आपूर्ति (Aggregate Supply) के बराबर होती है, तब प्रभावपूर्ण मांग की स्थिति उत्पन्न होती है। यदि प्रभावपूर्ण मांग कम होती है, तो उत्पादन और रोजगार में कमी आती है, जिससे बेरोजगारी बढ़ती है। प्रभावपूर्ण मांग की अवधारणा क्लासिकल सिद्धांत से भिन्न है, जिसमें माना जाता था कि बाजार स्वयं पूर्ण रोजगार की स्थिति प्राप्त कर लेता है।

  • प्रभावपूर्ण मांग कुल मांग और कुल आपूर्ति के संतुलन पर आधारित है।
  • यह उपभोग और निवेश व्यय से मिलकर बनती है।
  • प्रभावपूर्ण मांग का स्तर रोजगार और उत्पादन को निर्धारित करता है।
  • कम प्रभावपूर्ण मांग से बेरोजगारी बढ़ती है।
  • क्लासिकल सिद्धांत से भिन्न, इसमें सरकारी हस्तक्षेप की भूमिका है।
  • 📌 उपभोग व्यय: उपभोक्ताओं द्वारा वस्तुओं और सेवाओं पर किया गया खर्च।
  • 📌 निवेश व्यय: व्यवसायों द्वारा पूंजीगत वस्तुओं पर किया गया खर्च।

5.3 कुल मांग (AD) फलन

अवधारणा

5.3 कुल मांग (AD) फलन

कुल मांग (Aggregate Demand - AD) फलन वह संबंध है जो किसी अर्थव्यवस्था में विभिन्न संभावित उत्पादन स्तरों पर कुल व्यय को दर्शाता है। AD फलन में दो मुख्य घटक होते हैं: उपभोग व्यय (C) और निवेश व्यय (I)। AD = C + I। AD वक्र आमतौर पर उत्पादन (या आय) के सा