Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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3.1 परिचय
व्याख्या3.1 परिचय
इस अनुभाग में राष्ट्रीय आय लेखांकन में पर्यावरणीय संदर्भ की आवश्यकता और महत्व को स्पष्ट किया गया है। पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन में केवल आर्थिक गतिविधियों को मापा जाता है, जबकि पर्यावरणीय संसाधनों की खपत और क्षरण को नजरअंदाज किया जाता है। भारत जैसे विकासशील देशों में प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है, जिससे पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इस कारण, राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में पर्यावरणीय कारकों को शामिल करना आवश्यक है। इससे नीति निर्माताओं को सतत विकास की दिशा में निर्णय लेने में सहायता मिलती है। राष्ट्रीय आय लेखांकन में पर्यावरणीय संदर्भ जोड़ने से यह स्पष्ट होता है कि आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी जरूरी है। पारंपरिक GDP या GNP में पर्यावरणीय क्षति को नहीं दर्शाया जाता, जिससे वास्तविक आर्थिक कल्याण का अनुमान गलत हो सकता है। इसलिए, पर्यावरणीय लेखांकन के माध्यम से प्राकृतिक संसाधनों की स्थिति, उनका उपयोग, और उनके क्षरण का मूल्यांकन किया जाता है। इस अनुभाग में यह भी बताया गया है कि पर्यावरणीय लेखांकन के अभाव में नीति निर्माण में त्रुटियाँ हो सकती हैं, जैसे कि प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन से भविष्य में आर्थिक विकास की संभावनाएँ कम हो सकती हैं।
- पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन में पर्यावरणीय कारकों की अनदेखी होती है।
- पर्यावरणीय संदर्भ जोड़ने से सतत विकास की दिशा में नीति निर्माण संभव होता है।
- GDP और GNP में पर्यावरणीय क्षति को नहीं दर्शाया जाता।
- पर्यावरणीय लेखांकन से प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण का मूल्यांकन किया जाता है।
- भारत जैसे देशों में प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन होता है।
- पर्यावरणीय संदर्भ के अभाव में नीति निर्माण में त्रुटियाँ हो सकती हैं।
- 📌 राष्ट्रीय आय: एक देश की कुल आर्थिक गतिविधियों का मूल्य।
- 📌 पर्यावरणीय लेखांकन: आर्थिक आंकड़ों में पर्यावरणीय कारकों को शामिल करने की प्रक्रिया।
3.2 पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन की सीमाएँ
अवधारणा3.2 पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन की सीमाएँ
पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन में केवल आर्थिक गतिविधियों का मूल्यांकन किया जाता है, जिसमें उत्पादन, उपभोग, निवेश आदि शामिल हैं। इसमें प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण, प्रदूषण और पर्यावरणीय हानि को शामिल नहीं किया जाता। इस कारण, GDP और GNP जैसे संकेतक वास्तविक आर्थिक कल्याण का सही आकलन नहीं कर पाते। पारंपरिक लेखांकन में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को आर्थिक लाभ के रूप में दर्शाया जाता है, जबकि इससे पर्यावरणीय नुकसान होता है। उदाहरण के लिए, वनों की कटाई से लकड़ी का उत्पादन बढ़ता है, लेकिन वनों के क्षरण से पर्यावरणीय सेवाएँ कम हो जाती हैं। इसी तरह, औद्योगिक उत्पादन से GDP बढ़ता है, लेकिन प्रदूषण से स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है। इस अनुभाग में यह भी बताया गया है कि पारंपरिक लेखांकन में 'externalities' यानी बाह्य प्रभावों को शामिल नहीं किया जाता। इससे नीति निर्माण में त्रुटियाँ हो सकती हैं, क्योंकि आर्थिक वृद्धि के साथ पर्यावरणीय क्षति भी बढ़ती है।
- पारंपरिक लेखांकन में प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण को शामिल नहीं किया जाता।
- GDP और GNP में पर्यावरणीय हानि को नजरअंदाज किया जाता है।
- बाह्य प्रभावों (externalities) को पारंपरिक लेखांकन में नहीं दर्शाया जाता।
- आर्थिक वृद्धि के साथ पर्यावरणीय क्षति भी बढ़ती है।
- नीति निर्माण में त्रुटियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।
- सतत विकास के लिए पर्यावरणीय संदर्भ जरूरी है।
- 📌 GDP (सकल घरेलू उत्पाद): एक देश में एक वर्ष में उत्पादित सभी वस्तुओं और सेवाओं का कुल मूल्य।
- 📌 Externalities (बाह्य प्रभाव): वे प्रभाव जो किसी आर्थिक गतिविधि के कारण अन्य लोगों या पर्यावरण पर पड़ते हैं।
3.3 पर्यावरणीय लेखांकन की आवश्यकता
व्याख्या3.3 पर्यावरणीय लेखांकन की आवश्यकता
इस अनुभाग में बताया गया है कि पर्यावरणीय लेखांकन क्यों आवश्यक है। पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन में प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण और प्रदूषण को शामिल नहीं किया जाता, जिससे आर्थिक कल्याण का वास्तविक आकलन नहीं हो पाता। भारत जैसे देशों में प्राकृतिक संसाध
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