Chapter 5
Chapter 5 — अध्ययन नोट्स
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सुधा अरोड़ा
व्याख्यासुधा अरोड़ा
इस अनुभाग में सुधा अरोड़ा के जीवन, शिक्षा, और साहित्यिक योगदान का विस्तृत परिचय दिया गया है। सुधा अरोड़ा का जन्म लाहौर (पाकिस्तान) में हुआ था और उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उन्होंने सन् 1969 से 1971 तक उसी विश्वविद्यालय के दो कॉलेजों में अध्यापन कार्य किया। वे एक प्रसिद्ध कथाकार हैं जिनकी कई कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जिनमें 'बगैर तराशे हुए', 'युद्ध-विराम', 'महानगर की भौतिकी', 'काला शुक्रवार', 'काँसे का गिलास' तथा 'औरत की कहानी' (संपादित) प्रमुख हैं। उनकी कहानियाँ भारतीय भाषाओं के साथ-साथ कई विदेशी भाषाओं में भी अनूदित हो चुकी हैं। सुधा अरोड़ा ने भारतीय महिला कलाकारों के आत्मकथ्यों के दो संकलन 'दहलीज़ को लाँघते हुए' और 'पंखों की उड़ान' तैयार किए हैं। वे पत्र-पत्रिकाओं में भी सक्रिय रही हैं, जैसे पाक्षिक 'सारिका' में 'आम आदमी जिंदा सवाल' और राष्ट्रीय दैनिक 'जनसत्ता' में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर उनका साप्ताहिक स्तंभ 'वामा' बहुचर्चित रहा। महिला संगठनों के सामाजिक कार्यों के प्रति उनकी सक्रियता और समर्थन भी उल्लेखनीय है। उनका लेखन स्त्री विमर्श पर केंद्रित है, जो आक्रामक नहीं बल्कि सहज और संयत है। वे सामाजिक और मानवीय मुद्दों को रोचक ढंग से प्रस्तुत करती हैं। इस पाठ्यपुस्तक में संकलित ज्योतिबा फुले की जीवनी में भी उन्होंने समाज सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में फुले दंपत्ति के योगदान को प्रमुखता से बताया है।
- सुधा अरोड़ा का जन्म लाहौर में हुआ और उच्च शिक्षा कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्राप्त की।
- वे एक प्रसिद्ध कथाकार हैं जिनकी कई कहानी संग्रह प्रकाशित हैं।
- भारतीय और विदेशी भाषाओं में उनकी कहानियाँ अनूदित हैं।
- महिला कलाकारों के आत्मकथ्यों के संकलन भी उन्होंने तैयार किए हैं।
- पत्र-पत्रिकाओं में महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय लेखन करती हैं।
- उनका लेखन स्त्री विमर्श को सहज और संयत रूप में प्रस्तुत करता है।
- 📌 कथाकार: कहानी लिखने वाला लेखक।
- 📌 स्त्री विमर्श: महिलाओं से जुड़े सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर विचार।
- 📌 संपादित: किसी ग्रंथ या संग्रह को तैयार करना।
ज्योतिबा फुले
व्याख्याज्योतिबा फुले
इस खंड में महात्मा ज्योतिबा फुले के जीवन, उनके समाज सुधार के कार्यों और उनके विचारों का विस्तृत वर्णन है। भारत के सामाजिक विकास में ज्योतिबा फुले का नाम अक्सर उच्चवर्णीय समाज के समीक्षकों द्वारा सूची में नहीं लिया जाता, क्योंकि वे ब्राह्मण वर्चस्व और सामाजिक मूल्यों को कायम रखने वाली शिक्षा और सुधार के समर्थक नहीं थे। उन्होंने पूंजीवादी और पुरोहितवादी मानसिकता पर तीव्र आलोचना की और दलितों, शोषितों तथा स्त्रियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया। उन्होंने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की और अपने क्रांतिकारी साहित्य के माध्यम से सामाजिक असमानताओं को उजागर किया। जब ब्राह्मणों ने कहा कि 'विद्या शूद्रों के घर चली गई', तो फुले ने इसका जवाब दिया कि 'सच का सबेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई, भू-देव (ब्राह्मण) शरमा गए।' फुले ने वर्ण, जाति और वर्ग-व्यवस्था में निहित शोषण को एक-दूसरे का पूरक बताया और कहा कि राजसत्ता और ब्राह्मण आधिपत्य के तहत धर्मवादी सत्ता इस व्यवस्था का उपयोग करती है। उन्होंने दलितों के साथ-साथ स्त्रियों को भी इस शोषण के खिलाफ आंदोलन करने की प्रेरणा दी। उनके विचार उनके समय से बहुत आगे थे। उन्होंने आदर्श परिवार की अवधारणा दी जिसमें विभिन्न धर्मों के सदस्य समानता और स्वतंत्रता के साथ रहते हैं। उन्होंने आधुनिक शिक्षा की आलोचना की कि यदि इसका लाभ केवल उच्च वर्ग को मिलता है तो गरीबों का क्या होगा। फुले ने स्त्री शिक्षा के लिए संघर्ष किया और स्त्री समानता को स्थापित करने के लिए विवाह-विधि में बदलाव किए। उन्होंने विवाह के मंत्रों से पुरुष प्रधानता और स्त्री की गुलामी सिद्ध करने वाले मंत्र हटाकर नए मंगलाष्टक बनाए, जिनमें वधू वर से स्वतंत्रता और अधिकार की शपथ लेती है। उनका दांपत्य जीवन भी आदर्श था, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री बाई को शिक्षित किया और समाज सुधार के लिए मिलकर काम किया। सावित्री बाई ने भी शिक्षा के क्षेत्र में कई बाधाओं का सामना किया, लेकिन वे डटी रहीं। 14 जनवरी 1848 को पुणे में पहली कन्याशाला की स्थापना की गई, जो लड़कियों की शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था। फुले दंपत्ति ने जाति, धर्म और लिंग आधारित भेदभाव के खिलाफ संघर्ष किया और शिक्षा के माध्यम से समाज सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मण वर्चस्व और सामाजिक असमानताओं के खिलाफ संघर्ष किया।
- उन्होंने 'सत्यशोधक समाज' की स्थापना की।
- दलितों और स्त्रियों के अधिकारों के लिए आंदोलन किया।
- आदर्श परिवार की अवधारणा में विभिन्न धर्मों के सदस्य समानता से रहते हैं।
- स्त्री शिक्षा और समानता के लिए विवाह-विधि में बदलाव किए।
- सावित्री बाई के साथ मिलकर समाज सुधार के लिए काम किया।
- 📌 सत्यशोधक समाज: सामाजिक असमानताओं के खिलाफ स्थापित संगठन।
- 📌 मंगलाष्टक: विवाह के अवसर पर पढ़े जाने वाले मंत्र।
- 📌 कन्याशाला: लड़कियों के लिए स्कूल।
प्रश्न-अभ्यास
व्याख्याप्रश्न-अभ्यास
इस खंड में पाठ के आधार पर विद्यार्थियों के लिए महत्वपूर्ण प्रश्न दिए गए हैं जो उनकी समझ को परखने और गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। प्रश्न ज्योतिबा फुले के समाज सुधार कार्यों, उनके विचारों, सावित्री बाई के जीवन में आए परिवर्तनों, स्त्री समानत
अभ्यास प्रश्न — Chapter 5
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.ईदगाह रचना को आप किस विधा के अंतर्गत रखना चाहेंगे ?
उत्तर:
कहानी
Q2.ईद का त्यौहार किसके बाद आता है ?
उत्तर:
तीस रोज़े के बाद
Q3.बूढी अमीना क्या काम करके घर का गुजारा चलाती थी?
उत्तर:
कपड़े सिल कर
Q4.“हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लडके हैं, बिल्कुल तीन कौड़ी”- इस पंक्ति में तीन कौड़ी से क्या अर्थ निकलता है ?
उत्तर:
नालायक
Q5.‘हामिद खिलौनों की निंदा करता है, लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले’- इससे हामिद की किस विशेषता का पता चलता है?
उत्तर:
बाल सुलभ जिज्ञासा
Q6.चिमटे बेचने वाले ने हामिद से यह क्यों कहा कि तुम्हारे काम का नहीं है ?
उत्तर:
प्राय: बड़े इसे खरीदते थे
Q7.हामिद चिमटे की कौन सी विशेषता नहीं बताता है?
उत्तर:
कचहरी में सब डर कर हाथ जोड़ जाएँ
Q8.“चिमटे का सिक्का खूब बैठ गया” इस वाक्य में प्रेमचंद ने किस भाषा शैली का प्रयोग किया है?
उत्तर:
मुहावरेदार
Antra के सभी 16 अध्याय
Hindi · Class 11
1 और अध्याय — सभी देखें →