Chapter 16
Chapter 16 — अध्ययन नोट्स
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16.1 सार्वजनिक ऋण की अवधारणा
अवधारणा16.1 सार्वजनिक ऋण की अवधारणा
सार्वजनिक ऋण वह ऋण है जिसे सरकार अपने राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए विभिन्न स्रोतों से लेती है। यह ऋण सरकार द्वारा आंतरिक या बाह्य स्रोतों से लिया जा सकता है। सार्वजनिक ऋण का उद्देश्य आमतौर पर विकासात्मक परियोजनाओं, सामाजिक कल्याण योजनाओं, युद्ध या आपातकालीन स्थिति में वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है। सार्वजनिक ऋण को सरकार की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता है, जो करों के अलावा सरकार को आवश्यक धन उपलब्ध कराता है। सार्वजनिक ऋण, सरकार की वित्तीय नीति का एक अभिन्न अंग है, जो देश की आर्थिक स्थिरता, विकास तथा सामाजिक कल्याण में सहायक होता है। सार्वजनिक ऋण दो प्रकार का होता है—आंतरिक ऋण (जो देश के भीतर से लिया जाता है) और बाह्य ऋण (जो विदेशी स्रोतों से लिया जाता है)। दोनों के अपने-अपने लाभ और सीमाएँ होती हैं। सार्वजनिक ऋण के माध्यम से सरकार अल्पकालिक और दीर्घकालिक वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करती है।
- सार्वजनिक ऋण सरकार द्वारा विभिन्न स्रोतों से लिया गया ऋण है।
- यह आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार का हो सकता है।
- सार्वजनिक ऋण का मुख्य उद्देश्य वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करना है।
- यह सरकार की वित्तीय नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- सार्वजनिक ऋण से आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण में सहायता मिलती है।
- 📌 सार्वजनिक ऋण: सरकार द्वारा लिया गया ऋण।
- 📌 आंतरिक ऋण: देश के भीतर से लिया गया ऋण।
- 📌 बाह्य ऋण: विदेशी स्रोतों से लिया गया ऋण।
16.2 भारत में सार्वजनिक ऋण का विकास
व्याख्या16.2 भारत में सार्वजनिक ऋण का विकास
भारत में सार्वजनिक ऋण का इतिहास ब्रिटिश शासनकाल से प्रारंभ होता है, जब सरकार ने युद्ध, रेलवे निर्माण, सिंचाई परियोजनाओं आदि के लिए ऋण लेना प्रारंभ किया। स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने योजनाबद्ध आर्थिक विकास के लिए सार्वजनिक ऋण का उपयोग बढ़ाया। पंचवर्षीय योजनाओं के तहत विभिन्न विकासात्मक परियोजनाओं के लिए आंतरिक और बाह्य ऋण लिया गया। समय के साथ-साथ सार्वजनिक ऋण की मात्रा एवं स्वरूप में भी परिवर्तन हुआ है। प्रारंभ में आंतरिक ऋण का महत्व अधिक था, परंतु आर्थिक उदारीकरण के बाद बाह्य ऋण का भी महत्व बढ़ा है। भारत सरकार सार्वजनिक ऋण के प्रबंधन के लिए विभिन्न संस्थाओं जैसे भारतीय रिज़र्व बैंक, वित्त मंत्रालय आदि की सहायता लेती है। सार्वजनिक ऋण का विकास देश की आर्थिक नीतियों, वैश्विक परिस्थितियों, तथा सरकार की वित्तीय आवश्यकताओं पर निर्भर करता है।
- ब्रिटिश काल में सार्वजनिक ऋण का प्रारंभ हुआ।
- स्वतंत्रता के बाद योजनाबद्ध विकास के लिए ऋण का उपयोग बढ़ा।
- आंतरिक और बाह्य दोनों प्रकार के ऋण लिए जाते हैं।
- आर्थिक उदारीकरण के बाद बाह्य ऋण का महत्व बढ़ा।
- ऋण प्रबंधन के लिए RBI और वित्त मंत्रालय की भूमिका है।
- 📌 पंचवर्षीय योजना: पाँच वर्षों के लिए बनाई गई विकास योजना।
- 📌 आर्थिक उदारीकरण: आर्थिक नीतियों में खुलेपन की प्रक्रिया।
16.3 आंतरिक सार्वजनिक ऋण: स्वरूप एवं स्रोत
व्याख्या16.3 आंतरिक सार्वजनिक ऋण: स्वरूप एवं स्रोत
आंतरिक सार्वजनिक ऋण वह ऋण है, जिसे सरकार देश के भीतर के स्रोतों से प्राप्त करती है। इसके मुख्य स्रोत हैं—भारतीय रिज़र्व बैंक, वाणिज्यिक बैंक, बीमा कंपनियाँ, डाकघर, सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की संस्थाएँ तथा आम जनता। आंतरिक ऋण के अंतर्गत सरकार बांड, ट्
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Money, Banking & Public Finance · Vardhman Mahaveer Open University
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