Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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मुद्रा का मूल्य : अर्थ एवं मापन
अवधारणामुद्रा का मूल्य : अर्थ एवं मापन
मुद्रा का मूल्य वह शक्ति है जिसके द्वारा मुद्रा किसी वस्तु या सेवा का विनिमय कर सकती है। यह मुद्रा की क्रयशक्ति कहलाती है। मुद्रा का मूल्य वस्तुओं एवं सेवाओं के सापेक्ष निर्धारित होता है, अर्थात् जब वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं तो मुद्रा का मूल्य घटता है और जब कीमतें घटती हैं तो मुद्रा का मूल्य बढ़ता है। मुद्रा के मूल्य का मापन सामान्यतः मूल्य सूचकांक द्वारा किया जाता है। मूल्य सूचकांक एक सांख्यिकीय माप है, जो समय के साथ वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में परिवर्तन को दर्शाता है। मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन के दो मुख्य कारण होते हैं – मुद्रा स्फीति (Inflation) एवं मुद्रा संकुचन (Deflation)। मुद्रा स्फीति वह स्थिति है जब मुद्रा की आपूर्ति अधिक हो जाती है, जिससे वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं और मुद्रा का मूल्य घट जाता है। इसके विपरीत, मुद्रा संकुचन वह स्थिति है जब मुद्रा की आपूर्ति कम हो जाती है, जिससे कीमतें घटती हैं और मुद्रा का मूल्य बढ़ जाता है। मुद्रा के मूल्य का निर्धारण विभिन्न कारकों पर निर्भर करता है, जैसे – मुद्रा की आपूर्ति, वस्तुओं एवं सेवाओं की मांग, उत्पादन स्तर, सरकारी नीतियाँ आदि। मुद्रा के मूल्य में अस्थिरता से अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, जैसे – निवेश, बचत, उपभोग, वितरण आदि।
- मुद्रा का मूल्य उसकी क्रयशक्ति को दर्शाता है।
- मूल्य सूचकांक के माध्यम से मुद्रा के मूल्य का मापन किया जाता है।
- मुद्रा स्फीति में मुद्रा का मूल्य घटता है, जबकि मुद्रा संकुचन में बढ़ता है।
- मुद्रा के मूल्य में परिवर्तन से आर्थिक गतिविधियाँ प्रभावित होती हैं।
- मुद्रा के मूल्य का निर्धारण कई कारकों पर निर्भर करता है।
- 📌 मुद्रा का मूल्य: मुद्रा की क्रयशक्ति
- 📌 मूल्य सूचकांक: वस्तुओं की कीमतों में परिवर्तन का माप
- 📌 मुद्रा स्फीति: मुद्रा का मूल्य घटना
मुद्रा स्फीति : अर्थ, कारण एवं प्रकार
व्याख्यामुद्रा स्फीति : अर्थ, कारण एवं प्रकार
मुद्रा स्फीति (Inflation) वह आर्थिक स्थिति है जिसमें वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती जाती हैं और मुद्रा की क्रयशक्ति घटती जाती है। मुद्रा स्फीति के कई कारण हो सकते हैं, जैसे – मुद्रा की आपूर्ति में वृद्धि, सरकारी खर्च में वृद्धि, उत्पादन की लागत में वृद्धि, माँग में वृद्धि आदि। मुद्रा स्फीति के मुख्य प्रकार हैं – माँग खींची स्फीति (Demand Pull Inflation) और लागत धकेली स्फीति (Cost Push Inflation)। माँग खींची स्फीति तब होती है जब कुल माँग, कुल आपूर्ति से अधिक हो जाती है, जिससे कीमतें बढ़ जाती हैं। लागत धकेली स्फीति तब होती है जब उत्पादन की लागत (जैसे – मजदूरी, कच्चा माल) बढ़ जाती है, जिससे वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं। मुद्रा स्फीति के दुष्परिणामों में जीवन यापन की लागत में वृद्धि, बचत में कमी, निवेश में अस्थिरता, सामाजिक असमानता आदि शामिल हैं। सरकारें मुद्रा स्फीति को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक नीति (जैसे – बैंक दर बढ़ाना, नकद आरक्षित अनुपात बढ़ाना) और राजकोषीय नीति (जैसे – सरकारी खर्च में कटौती, कर वृद्धि) का प्रयोग करती हैं।
- मुद्रा स्फीति में कीमतें लगातार बढ़ती हैं।
- मुद्रा स्फीति के मुख्य कारण – मुद्रा आपूर्ति, सरकारी खर्च, लागत, माँग।
- माँग खींची और लागत धकेली स्फीति इसके प्रकार हैं।
- स्फीति से क्रयशक्ति घटती है, असमानता बढ़ती है।
- सरकार मौद्रिक व राजकोषीय नीति से स्फीति नियंत्रित करती है।
- 📌 मुद्रा स्फीति: कीमतों की लगातार वृद्धि
- 📌 माँग खींची स्फीति: माँग अधिक, आपूर्ति कम
- 📌 लागत धकेली स्फीति: लागत में वृद्धि से कीमतें बढ़ना
मुद्रा संकुचन : अर्थ, कारण एवं प्रभाव
व्याख्यामुद्रा संकुचन : अर्थ, कारण एवं प्रभाव
मुद्रा संकुचन (Deflation) वह आर्थिक स्थिति है जिसमें वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतें लगातार घटती जाती हैं और मुद्रा की क्रयशक्ति बढ़ती जाती है। मुद्रा संकुचन के मुख्य कारण हैं – मुद्रा की आपूर्ति में कमी, माँग में गिरावट, सरकारी खर्च में कटौती, उत्पादन
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Money, Banking & Public Finance · Vardhman Mahaveer Open University
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