Ch 17निःशुल्क

Chapter 17

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - Money, Banking & Public Finance (Hindi)📖 10 नोट्स⏱️ ~15 मिनट
Chapter 16अध्याय 16 / 16

Chapter 17अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

संघात्मक वित्त का अर्थ

परिभाषा

संघात्मक वित्त का अर्थ

संघात्मक वित्त वह वित्तीय व्यवस्था है जिसमें सरकार के विभिन्न स्तरों—संघ, राज्य और स्थानीय निकाय—के बीच वित्तीय शक्तियों, संसाधनों और जिम्मेदारियों का विभाजन होता है। भारत जैसे संघीय देशों में वित्तीय संघवाद का उद्देश्य आर्थिक संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण, प्रशासनिक दक्षता और लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण सुनिश्चित करना है। संघात्मक वित्त में प्रत्येक स्तर की सरकार को संविधान द्वारा निर्धारित वित्तीय अधिकार दिए जाते हैं, जिससे वे अपने-अपने क्षेत्र में सार्वजनिक सेवाएँ प्रदान कर सकें। यह व्यवस्था केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को स्पष्ट करती है, जिसमें कराधान, व्यय, अनुदान, और ऋण की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

  • संघात्मक वित्त में सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच वित्तीय शक्तियों का विभाजन होता है।
  • भारत में संघात्मक वित्त संविधान द्वारा निर्धारित है।
  • यह आर्थिक संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण को सुनिश्चित करता है।
  • संघ, राज्य और स्थानीय निकायों को अलग-अलग वित्तीय अधिकार दिए जाते हैं।
  • संघात्मक वित्त प्रशासनिक दक्षता और लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण को बढ़ावा देता है।
  • यह केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों को स्पष्ट करता है।
  • 📌 संघात्मक वित्त: सरकार के विभिन्न स्तरों के बीच वित्तीय शक्तियों का विभाजन।
  • 📌 वित्तीय संघवाद: संघीय ढांचे में वित्तीय संबंधों की व्यवस्था।

संघात्मक वित्त की समस्याएँ

व्याख्या

संघात्मक वित्त की समस्याएँ

संघात्मक वित्त की व्यवस्था में कई समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, जिनमें वित्तीय असंतुलन, संसाधनों का असमान वितरण, कराधान की जटिलता, अनुदानों की निर्भरता, और प्रशासनिक टकराव शामिल हैं। केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय शक्तियों का विभाजन कई बार स्पष्ट नहीं होता, जिससे संसाधनों की कमी और व्यय की अधिकता जैसी समस्याएँ सामने आती हैं। राज्यों को अक्सर अपने व्यय के लिए केंद्र से अनुदान लेना पड़ता है, जिससे उनकी वित्तीय स्वतंत्रता सीमित हो जाती है। कराधान के क्षेत्र में भी कई बार दोहराव और विवाद उत्पन्न होते हैं, जैसे—कुछ कर केंद्र और राज्य दोनों द्वारा वसूले जा सकते हैं। इसके अलावा, आर्थिक विकास के स्तर में अंतर, क्षेत्रीय असमानता, और प्रशासनिक अक्षमता भी संघात्मक वित्त की प्रमुख समस्याएँ हैं।

  • वित्तीय असंतुलन संघ और राज्यों के बीच आम समस्या है।
  • संसाधनों का असमान वितरण क्षेत्रीय असमानता को बढ़ाता है।
  • राज्य सरकारें केंद्र पर अनुदानों के लिए निर्भर रहती हैं।
  • कराधान की जटिलता विवादों और दोहराव को जन्म देती है।
  • प्रशासनिक टकराव वित्तीय निर्णयों को प्रभावित करता है।
  • अक्षमता और भ्रष्टाचार संघात्मक वित्त की समस्याओं को बढ़ाते हैं।
  • 📌 वित्तीय असंतुलन: संघ और राज्यों के बीच संसाधनों और व्यय का अंतर।
  • 📌 अनुदान: केंद्र द्वारा राज्यों को दी जाने वाली वित्तीय सहायता।

संघात्मक वित्त के सैद्धांतिक पक्ष

अवधारणा

संघात्मक वित्त के सैद्धांतिक पक्ष

संघात्मक वित्त के सैद्धांतिक पक्ष में मुख्य रूप से वित्तीय शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत, वित्तीय संघवाद के उद्देश्य, और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की चर्चा होती है। इसमें 'सहकारी संघवाद' और 'स्वायत्त संघवाद' जैसे सिद्धांत शामिल हैं। सहकारी संघवाद