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Chapter 1

🎓 Class 11📖 Bhautiki-II📖 9 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~14 मिनट
अध्याय 1 / 7Chapter 2

Chapter 1अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

8.1 भूमिका

व्याख्या

8.1 भूमिका

इस अनुभाग में ठोसों के यांत्रिक गुणों की भूमिका पर चर्चा की गई है। अध्याय 7 में हमने पिण्डों के घूर्णन के बारे में अध्ययन किया था, जहाँ पिण्ड की गति द्रव्यमान वितरण पर निर्भर करती है। दृढ़ पिण्डों का अर्थ होता है ऐसे ठोस जिनका आकार और आकृति निश्चित होती है। परंतु वास्तव में कोई भी ठोस पूर्ण रूप से दृढ़ नहीं होता क्योंकि उन पर बाहरी बल लगाने पर वे तनित, संपीडित या विरूपित हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, इस्पात की छड़ को पर्याप्त बल से मोड़ा जा सकता है। ठोसों की एक निश्चित आकृति और आकार होता है, जिसे बदलने के लिए बल की आवश्यकता होती है। यदि किसी कुण्डलित स्प्रिंग को खींचा जाए तो उसकी लंबाई बढ़ जाती है, लेकिन जब बल हटाया जाता है तो वह अपनी प्रारंभिक आकृति में लौट आता है। इस गुण को प्रत्यास्थता कहते हैं। यदि किसी पिण्ड पर बल लगाने के बाद वह अपनी प्रारंभिक आकृति में वापस नहीं आता तो वह प्लास्टिक होता है, और इस गुण को प्लास्टिकता कहते हैं। अभियांत्रिकी डिजाइन में ठोसों के प्रत्यास्थ व्यवहार का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसे पुल, भवन, वाहन आदि की संरचना में प्रत्यास्थता का अध्ययन आवश्यक होता है। इस अध्याय में हम ठोसों के प्रत्यास्थ गुणों और यांत्रिक व्यवहार का अध्ययन करेंगे, जो विभिन्न यांत्रिक समस्याओं के समाधान में सहायक होगा।

  • दृढ़ पिण्ड पूर्ण रूप से कठोर नहीं होते, वे विरूपित हो सकते हैं।
  • प्रत्यास्थता वह गुण है जिससे पिण्ड बल हटाने पर अपनी आकृति पुनः प्राप्त करता है।
  • प्लास्टिकता वह गुण है जिसमें पिण्ड स्थायी रूप से विरूपित हो जाता है।
  • अभियांत्रिकी में प्रत्यास्थता का ज्ञान संरचनाओं के डिजाइन के लिए आवश्यक है।
  • ठोसों के यांत्रिक गुणों का अध्ययन विभिन्न यांत्रिक समस्याओं को समझने में मदद करता है।
  • 📌 प्रत्यास्थता: किसी ठोस का वह गुण जिससे वह विरूपित होने के बाद अपनी प्रारंभिक आकृति पुनः प्राप्त करता है।
  • 📌 प्लास्टिकता: वह गुण जिसके कारण ठोस स्थायी रूप से विरूपित हो जाता है।
  • 📌 दृढ़ पिण्ड: ऐसा ठोस जिसका निश्चित आकार और आकृति होती है।

8.2 प्रतिबल तथा विकृति

व्याख्या

8.2 प्रतिबल तथा विकृति

इस अनुभाग में प्रतिबल (Stress) और विकृति (Strain) की परिभाषा, प्रकार और गणितीय व्याख्या की गई है। जब किसी पिण्ड पर बाहरी बल लगाया जाता है, तो उसमें आंतरिक बल उत्पन्न होते हैं, जिन्हें प्रतिबल कहते हैं। प्रतिबल एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाला बल होता है। यदि किसी पिण्ड के क्षेत्रफल A वाले किसी अनुप्रस्थ काट पर लंबवत दिशा में बल F लगाया जाए, तो प्रतिबल σ = F/A होता है। इसकी SI इकाई न्यूटन प्रति वर्ग मीटर (N/m²) या पास्कल (Pa) होती है। ठोसों में विमाएँ तीन प्रकार से बदल सकती हैं: 1. अनुदैर्ध्य विकृति (Longitudinal Strain): जब पिण्ड को लंबवत बल द्वारा तनित या संपीडित किया जाता है, तो उसकी लंबाई में परिवर्तन होता है। अनुदैर्ध्य विकृति ΔL/L होती है, जहाँ ΔL लंबाई में परिवर्तन है और L प्रारंभिक लंबाई। 2. अपरूपण विकृति (Shear Strain): जब पिण्ड के समांतर सतहों पर बल लगाया जाता है, तो एक सतह दूसरे के सापेक्ष विस्थापित होती है। इसे अपरूपण विकृति कहते हैं, जिसका मान Δx/L या tan θ होता है, जहाँ Δx सापेक्ष विस्थापन और L ऊर्ध्वाधर दूरी है। θ बहुत छोटा कोण होता है, इसलिए tan θ ≈ θ होता है। 3. आयतन विकृति (Volumetric Strain): जब पिण्ड को जलीय दाब के कारण समान रूप से संपीड़ित किया जाता है, तो उसका आयतन घटता है। आयतन विकृति ΔV/V होती है, जहाँ ΔV आयतन में परिवर्तन और V प्रारंभिक आयतन है। चित्र 8.1 में विभिन्न प्रकार के प्रतिबल और विकृति को दर्शाया गया है। तनन प्रतिबल के प्रभाव में बेलन की लंबाई बढ़ जाती है, अपरूपण प्रतिबल के प्रभाव में बेलन के समांतर सतहों के बीच कोणीय विस्थापन होता है, और जलीय प्रतिबल के प्रभाव में ठोस का आयतन संकुचित होता है।

  • प्रतिबल एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाला आंतरिक बल है, SI इकाई Pa।
  • अनुदैर्ध्य विकृति = ΔL/L, लंबाई में परिवर्तन का अनुपात।
  • अपरूपण विकृति = Δx/L = tan θ, सतहों के सापेक्ष विस्थापन का अनुपात।
  • आयतन विकृति = ΔV/V, आयतन में परिवर्तन का अनुपात।
  • प्रतिबल और विकृति के प्रकार: तनन/संपीड़क, अपरूपण, और जलीय प्रतिबल।
  • 📌 प्रतिबल (Stress): पिण्ड के एकांक क्षेत्रफल पर लगने वाला आंतरिक बल।
  • 📌 विकृति (Strain): पिण्ड की विमाओं में भिन्नात्मक परिवर्तन का अनुपात।
  • 📌 तनन प्रतिबल (Tensile Stress): लंबवत बल द्वारा उत्पन्न प्रतिबल।

8.3 हुक का नियम

व्याख्या

8.3 हुक का नियम

इस अनुभाग में हुक के नियम (Hooke's Law) और प्रत्यास्थता की अवधारणा का विस्तार से वर्णन किया गया है। हुक का नियम कहता है कि कम विरूपण के लिए किसी ठोस में प्रतिबल (Stress) और विकृति (Strain) एक दूसरे के समानुपाती होते हैं। अर्थात्, प्रतिबल α विकृति। इ

अभ्यास प्रश्नChapter 1

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.एक मोटे तार, जिसके दूसरे सिरे पर कोई भार नहीं है , को एक दृढ़ आधार से लटकाया गया है
A.तार तनाव में होगा
B.तार किसी भी तनाव से मुक्त है
C.तनाव केवल तार के निश्चित छोर पर है
D.इनमें से कोई नहीं

उत्तर:

तार तनाव में होगा

व्याख्या:

[{"id": "d99f23cb-2018-41cc-93e2-57a42bc740a9", "type": "html", "value": " तार अपने स्वयं के भार के कारण कुछ तनाव का अनुभव करेगा "}]

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Q2.8.1 4.7 m लंबे व 3.0 × 10⁻⁶ m² अनुप्रस्थ काट के स्टील के तार तथा 3.5 m लंबे व 4.0 × 10⁻⁶ m² अनुप्रस्थ काट के ताँबे के तार पर दिए गए समान परिमाण के भारों को लटकाने पर उनकी लंबाइयों में समान वृद्धि होती है। स्टील तथा ताँबे के यंग प्रत्यास्थता गुणांकों में क्या अनुपात है?

उत्तर:

दी गई जानकारी: स्टील के तार की लंबाई, L₁ = 4.7 m स्टील के तार का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल, A₁ = 3.0 × 10⁻⁶ m² ताँबे के तार की लंबाई, L₂ = 3.5 m ताँबे के तार का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल, A₂ = 4.0 × 10⁻⁶ m² दोनों तारों पर समान भार लगने पर लंबाई में समान वृद्धि ΔL होती है। हम जानते हैं कि प्रत्यास्थता के नियम के अनुसार: ΔL = (F L) / (A Y) जहाँ F = बल, L = लंबाई, A = अनुप्रस्थ क्षेत्रफल, Y = यंग प्रत्यास्थता गुणांक चूंकि ΔL दोनों के लिए समान है और F भी समान है, तो: (F L₁) / (A₁ Y₁) = (F L₂) / (A₂ Y₂) => (L₁) / (A₁ Y₁) = (L₂) / (A₂ Y₂) => Y₁ / Y₂ = (L₁ A₂) / (L₂ A₁) मान डालते हैं: Y₁ / Y₂ = (4.7 × 4.0 × 10⁻⁶) / (3.5 × 3.0 × 10⁻⁶) = (18.8 × 10⁻⁶) / (10.5 × 10⁻⁶) = 1.79 अतः स्टील तथा ताँबे के यंग प्रत्यास्थता गुणांकों का अनुपात लगभग 1.79 है।

व्याख्या:

दोनों तारों पर समान भार लगने पर लंबाई में समान वृद्धि होती है। प्रत्यास्थता के नियम से ΔL = (F L) / (A Y) होता है। समान ΔL और F के लिए, Y का अनुपात लंबाई और अनुप्रस्थ क्षेत्रफल के अनुपात के समानुपाती होता है। गणना करके अनुपात 1.79 प्राप्त हुआ।

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Q3.8.2 नीचे चित्र 8.9 में किसी दिए गए पदार्थ के लिए प्रतिबल-विकृति वक्र दर्शाया गया है। इस पदार्थ के लिए (a) यंग प्रत्यास्थता गुणांक, तथा (b) सन्निकट पराभव सामथ्य क्या है?

उत्तर:

(a) यंग प्रत्यास्थता गुणांक (Y) प्रतिबल-विकृति वक्र के प्रारंभिक रैखिक भाग का ढाल होता है। इसे निम्नलिखित प्रकार से निकाला जा सकता है: Y = प्रतिबल / विकृति = σ / ε चित्र 8.9 से प्रारंभिक रैखिक भाग की ढाल निकालकर यंग प्रत्यास्थता गुणांक ज्ञात किया जाता है। (b) सन्निकट पराभव सामथ्य (Bulk modulus, K) किसी पदार्थ की आयतन में परिवर्तन के प्रति उसका दाब परिवर्तन है। इसे निम्नलिखित सूत्र से परिभाषित किया जाता है: K = - (ΔP) / (ΔV/V) यहाँ, ΔP = दबाव में परिवर्तन, ΔV/V = आयतन परिवर्तन का अनुपात। प्रतिबल-विकृति वक्र से सन्निकट पराभव सामथ्य सीधे नहीं निकाला जा सकता, इसके लिए आयतन में परिवर्तन और दबाव के बीच संबंध देखना आवश्यक है।

व्याख्या:

प्रतिबल-विकृति वक्र के प्रारंभिक रैखिक भाग से यंग प्रत्यास्थता गुणांक निकाला जाता है क्योंकि वह प्रत्यास्थ क्षेत्र दर्शाता है। सन्निकट पराभव सामथ्य आयतन में परिवर्तन के प्रति दबाव की संवेदनशीलता है, जो आयतन परिवर्तन और दबाव के अनुपात से मापा जाता है।

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Q4.8.3 दो पदार्थों A और B के लिए प्रतिबल-विकृति ग्राफ चित्र 8.10 में दर्शाए गए हैं। इन ग्राफों को एक ही पैमाना मानकर खींचा गया है। (a) किसी पदार्थ का यंग प्रत्यास्थता गुणांक अधिक है? (b) दोनों पदार्थों में कौन अधिक मजबूत है?

उत्तर:

(a) यंग प्रत्यास्थता गुणांक ग्राफ के प्रारंभिक रैखिक भाग की ढाल के समान होता है। चित्र 8.10 में जो ग्राफ अधिक ढाल वाला है, उसका यंग प्रत्यास्थता गुणांक अधिक होगा। अतः जो ग्राफ अधिक तीव्रता से ऊपर बढ़ता है, उसका यंग गुणांक अधिक है। (b) पदार्थ की मजबूती उसके अधिकतम अनुज्ञेय प्रतिबल (maximum allowable stress) से मापी जाती है, जो ग्राफ के अधिकतम प्रतिबल के मान से ज्ञात होती है। जो पदार्थ अधिकतम प्रतिबल अधिक सहन करता है, वह अधिक मजबूत है।

व्याख्या:

यंग प्रत्यास्थता गुणांक ग्राफ की प्रारंभिक ढाल से ज्ञात होता है। अधिक ढाल वाला पदार्थ अधिक प्रत्यास्थ होता है। अधिकतम प्रतिबल ग्राफ के चरम बिंदु से ज्ञात होता है, जो पदार्थ की मजबूती दर्शाता है।

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Q5.8.4 निम्नलिखित दो कथनों को ध्यान से पढ़िये और कारण सहित बताइये कि वे सत्य हैं या असत्य : (a) इस्पात की अपेक्षा रबड़ का यंग गुणांक अधिक है; (b) किसी कुण्डली का तनन उसके अपरूपण गुणांक से निर्धारित होता है।

उत्तर:

(a) असत्य। इस्पात का यंग गुणांक रबड़ की तुलना में बहुत अधिक होता है क्योंकि इस्पात कठोर और प्रत्यास्थ होता है जबकि रबड़ बहुत लचीला और कम प्रत्यास्थ होता है। (b) सत्य। किसी कुण्डली का तनन (stress) उसके अपरूपण गुणांक (shear modulus) से निर्धारित होता है क्योंकि कुण्डली पर लगने वाला तनन मुख्यतः अपरूपण विकृति से संबंधित होता है।

व्याख्या:

(a) यंग गुणांक कठोरता और प्रत्यास्थता का माप है। रबड़ का यंग गुणांक इस्पात से कम होता है। (b) कुण्डली पर लगने वाला तनन उसके अपरूपण गुणांक से संबंधित होता है, इसलिए यह कथन सत्य है।

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Q6.8.5 0.25 cm व्यास के दो तार, जिनमें एक इस्पात का तथा दूसरा पीतल का है, चित्र 8.11 के अनुसार भारित हैं। बिना भार लटकाये इस्पात तथा पीतल के तारों की लंबाइयाँ क्रमश: 1.5 m तथा 1.0 m हैं। यदि इस्पात तथा पीतल के यंग गुणांक क्रमश: $2.0 \times 10^{11} \mathrm{~Pa}$ तथा $0.91 \times 10^{11} \mathrm{~Pa}$ हों तो इस्पात तथा पीतल के तारों में विस्तार की गणना कीजिए।

उत्तर:

दी गई जानकारी: व्यास d = 0.25 cm = 0.0025 m इस्पात की लंबाई L₁ = 1.5 m पीतल की लंबाई L₂ = 1.0 m इस्पात का यंग गुणांक Y₁ = 2.0 × 10¹¹ Pa पीतल का यंग गुणांक Y₂ = 0.91 × 10¹¹ Pa हम मानते हैं कि दोनों तारों पर समान भार F लग रहा है। तार का विस्तार (ΔL) सूत्र से: ΔL = (F L) / (A Y) अनुप्रस्थ क्षेत्रफल A = π d² / 4 = π (0.0025)² / 4 = 4.91 × 10⁻⁶ m² इस्पात के तार का विस्तार: ΔL₁ = (F × 1.5) / (4.91 × 10⁻⁶ × 2.0 × 10¹¹) = (1.5 F) / (9.82 × 10⁵) = 1.527 × 10⁻⁶ F पीतल के तार का विस्तार: ΔL₂ = (F × 1.0) / (4.91 × 10⁻⁶ × 0.91 × 10¹¹) = (1.0 F) / (4.47 × 10⁵) = 2.237 × 10⁻⁶ F अतः, इस्पात का तार कम विस्तार करेगा जबकि पीतल का तार अधिक विस्तार करेगा। विस्तार के सापेक्ष मान F के अनुसार हैं।

व्याख्या:

प्रत्येक तार का विस्तार ΔL = (F L) / (A Y) से निकाला गया। अनुप्रस्थ क्षेत्रफल दोनों के लिए समान है क्योंकि व्यास समान है। लंबाई और यंग गुणांक के आधार पर विस्तार की तुलना की गई।

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Q7.8.6 एलुमिनियम के किसी घन के किनारे 10 cm लंबे हैं। इसकी एक फलक किसी ऊर्ध्वाधर दीवार से कसकर जड़ी हुई है। इस घन के सम्मुख फलक से 100 kg का एक द्रव्यमान जोड़ दिया गया है। एलुमिनियम का अपरूपण गुणांक 25 GPa है। इस फलक का ऊर्ध्वाधर विस्थापन कितना होगा?

उत्तर:

दी गई जानकारी: किनारे की लंबाई L = 10 cm = 0.1 m द्रव्यमान m = 100 kg गुरुत्वाकर्षण त्वरण g = 9.8 m/s² बल F = m g = 100 × 9.8 = 980 N अपरूपण गुणांक K = 25 GPa = 25 × 10⁹ Pa फलक का क्षेत्रफल A = L × L = 0.1 × 0.1 = 0.01 m² ऊर्ध्वाधर विस्थापन ΔL = (F L) / (A K) ΔL = (980 × 0.1) / (0.01 × 25 × 10⁹) = 98 / (2.5 × 10⁸) = 3.92 × 10⁻⁷ m अतः फलक का ऊर्ध्वाधर विस्थापन लगभग 3.92 × 10⁻⁷ मीटर होगा।

व्याख्या:

ऊर्ध्वाधर विस्थापन अपरूपण गुणांक के सूत्र से निकाला गया है। बल, लंबाई, क्षेत्रफल और अपरूपण गुणांक के मानों को सूत्र में रखकर विस्थापन प्राप्त किया गया।

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Q8.8.7 मृदु इस्पात के चार समरूप खोखले बेलनाकार स्तम्भ 50,000 kg द्रव्यमान के किसी बड़े ढाँचे को आधार दिये हुए हैं। प्रत्येक स्तम्भ की भीतरी तथा बाहरी त्रिज्याएँ क्रमशः 30 तथा 60 cm हैं। भार वितरण को एकसमान मानते हुए प्रत्येक स्तम्भ की संपीड़न विकृति की गणना कीजिये।

उत्तर:

दी गई जानकारी: कुल द्रव्यमान M = 50,000 kg प्रत्येक स्तम्भ की भीतरी त्रिज्या r_i = 30 cm = 0.3 m प्रत्येक स्तम्भ की बाहरी त्रिज्या r_o = 60 cm = 0.6 m स्तम्भों की संख्या n = 4 गुरुत्वाकर्षण त्वरण g = 9.8 m/s² प्रत्येक स्तम्भ पर लगने वाला भार: F = (M g) / n = (50,000 × 9.8) / 4 = 1,22,500 N स्तम्भ का अनुप्रस्थ क्षेत्रफल (खोखले बेलन का क्षेत्रफल): A = π (r_o² - r_i²) = π (0.6² - 0.3²) = π (0.36 - 0.09) = π × 0.27 = 0.848 m² मृदु इस्पात का यंग प्रत्यास्थता गुणांक Y ≈ 2 × 10¹¹ Pa (सामान्य मान) संपीड़न विकृति ΔL = (F L) / (A Y) यहाँ L ज्ञात नहीं है, अतः यदि L दिया होता तो विस्तार निकाला जा सकता था। यदि L ज्ञात हो तो सूत्र के अनुसार ΔL निकाला जा सकता है।

व्याख्या:

प्रत्येक स्तम्भ पर लगने वाला भार कुल भार का एक-चौथाई है। अनुप्रस्थ क्षेत्रफल खोखले बेलन के क्षेत्रफल के अनुसार निकाला गया। संपीड़न विकृति के लिए लंबाई की आवश्यकता होती है, जो प्रश्न में नहीं दी गई है। यदि लंबाई ज्ञात हो तो ΔL सूत्र से निकाला जा सकता है।

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