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Chapter 5

🎓 Class 12📖 Antra📖 7 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~11 मिनट
Chapter 4अध्याय 5 / 17Chapter 6

Chapter 5अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 7 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

रघुवीर सहाय

व्याख्या

रघुवीर सहाय

रघुवीर सहाय का जन्म सन् 1929 में लखनऊ, उत्तर प्रदेश में हुआ था। उन्होंने अपनी संपूर्ण शिक्षा लखनऊ में ही पूरी की और 1951 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया। पेशे से वे पत्रकार थे और उन्होंने अपने जीवन में पत्रकारिता के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। प्रारंभ में वे 'प्रतीक' पत्रिका के सहायक संपादक थे, बाद में आकाशवाणी के समाचार विभाग में कार्यरत रहे। इसके अतिरिक्त हैदराबाद से प्रकाशित पत्रिका 'कल्पना' के संपादन में भी उन्होंने योगदान दिया और कई वर्षों तक 'दिनमान' का संपादन किया। रघुवीर सहाय नयी कविता के प्रमुख कवि माने जाते हैं। उनकी कविताओं में आत्मपरक अनुभवों की अपेक्षा जनजीवन के अनुभवों की रचनात्मक अभिव्यक्ति अधिक देखने को मिलती है। वे सामाजिक संदर्भों के निरीक्षण, अनुभव और बोध को अपनी कविताओं में प्रभावी रूप से प्रस्तुत करते हैं। उनकी पत्रकार-दृष्टि ने उनकी काव्य-रचना को विशिष्टता प्रदान की है। वे मानते थे कि अखबार की खबरों के भीतर छिपी मानवीय पीड़ा को कविता के माध्यम से अभिव्यक्त करना कवि का दायित्व है। उनकी कविता की भाषा सरल, स्पष्ट और प्रभावशाली है, जिसमें अनावश्यक शब्दों का प्रयोग नहीं होता। भयाक्रांत अनुभव की आवेगरहित अभिव्यक्ति उनकी कविता की प्रमुख विशेषता है। उन्होंने मुक्त छंद और छंदबद्ध दोनों प्रकार की कविताएँ लिखीं। उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ हैं—'सीढ़ियों पर धूप में', 'आत्महत्या के विरुद्ध', 'हँसो हँसो जल्दी हँसो' और 'लोग भूल गए हैं'। 'लोग भूल गए हैं' काव्य संग्रह के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। उनकी रचनावली छह खंडों में प्रकाशित हुई है, जिसमें उनकी लगभग सभी रचनाएँ संकलित हैं।

  • रघुवीर सहाय का जन्म 1929 में लखनऊ में हुआ।
  • उन्होंने अंग्रेजी साहित्य में एम.ए. किया और पत्रकारिता में सक्रिय रहे।
  • उनकी कविताओं में जनजीवन के अनुभवों की अभिव्यक्ति प्रमुख है।
  • पत्रकार-दृष्टि से प्रभावित उनकी कविताएँ सामाजिक संदर्भों को उजागर करती हैं।
  • भयाक्रांत अनुभव की आवेगरहित अभिव्यक्ति उनकी कविता की विशेषता है।
  • उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में 'लोग भूल गए हैं' शामिल है।
  • 📌 नयी कविता: आधुनिक हिंदी कविता की वह शैली जो पारंपरिक छंदबद्धता से हटकर मुक्त छंद और नए विषयों को अपनाती है।
  • 📌 पत्रकार-दृष्टि: समाचार और सामाजिक घटनाओं को गहराई से देखने और समझने की क्षमता।
  • 📌 आत्मपरक अनुभव: व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों से जुड़ी अभिव्यक्ति।

वसंत आया

व्याख्या

वसंत आया

कविता 'वसंत आया' में रघुवीर सहाय ने आधुनिक मनुष्य और प्रकृति के बीच टूटते हुए संबंध को बड़ी सूक्ष्मता से प्रस्तुत किया है। कवि ने वसंत ऋतु के आगमन को प्राकृतिक संकेतों के माध्यम से महसूस किया है, जैसे चिड़िया की कूजन, पत्तों का गिरना, हवा का चलना, और ढाक के जंगलों का दहकना। परंतु आज के मनुष्य के लिए यह अनुभव केवल कैलेंडर की तारीखों तक सीमित रह गया है। वह प्राकृतिक परिवर्तनों को महसूस नहीं कर पाता, उसकी दृष्टि प्रकृति की सुंदरता और जीवन के चमत्कार से विमुख हो गई है। कवि ने कविता में देशज (तद्भव) शब्दों जैसे 'कुज़की', 'चुरमुराए', 'तरुवर', 'फिरकी' का प्रयोग किया है, जिससे कविता की भाषा में स्थानीयता और जीवन्तता आती है। ये शब्द प्रकृति के सूक्ष्म अनुभवों को जीवंत बनाते हैं। कविता में बिंबों और प्रतीकों का भी सुंदर प्रयोग हुआ है, जैसे 'ढाक के जंगल', 'नंदन वन', 'मधुमस्त पिक' आदि। कविता की भाषा सरल होते हुए भी गहरी व्यंग्यात्मक है। कवि ने आधुनिक जीवनशैली की निरपेक्षता और प्रकृति से दूर होती मानवीय संवेदनशीलता पर कटाक्ष किया है। वसंत ऋतु के आगमन की सूचना कवि को प्राकृतिक संकेतों के साथ-साथ कैलेंडर और छुट्टियों से भी मिलती है, जो इस विडंबना को और स्पष्ट करता है। इस प्रकार, 'वसंत आया' कविता प्रकृति और मनुष्य के बीच के टूटते रिश्ते की व्यथा और आधुनिकता की विडंबना को अभिव्यक्त करती है। 2. प्रकृति और मनुष्य के संबंध पर चर्चा करें।

  • कवि ने वसंत ऋतु के आगमन को प्राकृतिक संकेतों से महसूस किया है।
  • आधुनिक मनुष्य प्रकृति के सौंदर्य से दूर हो गया है।
  • कविता में देशज शब्दों का प्रयोग स्थानीयता और जीवन्तता लाता है।
  • प्रकृति के प्रतीक और बिंब कविता को गहराई प्रदान करते हैं।
  • वसंत का आगमन अब केवल कैलेंडर और छुट्टियों से जाना जाता है।
  • कविता में आधुनिक जीवनशैली की निरपेक्षता पर व्यंग्य है।
  • 📌 देशज शब्द: स्थानीय भाषा या बोली से उत्पन्न शब्द।
  • 📌 बिंब: कविता में प्रयुक्त चित्रात्मक अभिव्यक्ति।
  • 📌 प्रतीक: किसी वस्तु या विचार का प्रतिनिधित्व करने वाला चिन्ह।

वसंत आया: शब्दार्थ और टिप्पणी

व्याख्या

वसंत आया: शब्दार्थ और टिप्पणी

कविता 'वसंत आया' में कई देशज और कठिन शब्दों का प्रयोग हुआ है, जिनका अर्थ और टिप्पणी समझना आवश्यक है: - कुऊकना: चिड़िया की स्वाभाविक आवाज़, कुहुकना का तद्भव रूप। यह शब्द चिड़िया की मधुर और प्राकृतिक आवाज़ को दर्शाता है। - चुरमुराए: चरमराने की आवाज़।

अभ्यास प्रश्नChapter 5

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. वंसत आगमन की सूचना कवि को कैसे मिली?

उत्तर:

कवि को वंसत आगमन की सूचना प्रकृति के परिवर्तनों से मिली। जैसे हवा में खुशबू, पक्षियों की चहचहाहट, पेड़ों पर पत्तों का खिलना आदि से कवि को पता चलता है कि वंसत ऋतु आ गई है।

व्याख्या:

वसंत ऋतु के आगमन के संकेत प्रकृति में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। पक्षियों की आवाज़, फूलों का खिलना, और हवा का मधुर प्रवाह कवि को वसंत की सूचना देते हैं।

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Q2.2. ‘कोई छह बजे सुबह... फिरकी सी आई, चली गई’—पंक्ति में निहित भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

इस पंक्ति में सुबह की ताजगी और हल्की-फुल्की हवा के आने-जाने का भाव है। 'फिरकी सी आई, चली गई' से हवा के घूमने-फिरने और अस्थायी रूप से आने का संकेत मिलता है, जो वसंत ऋतु की कोमलता और नर्माहट को दर्शाता है।

व्याख्या:

यह पंक्ति वसंत के सौम्य और आनंददायक वातावरण को व्यक्त करती है, जहाँ हवा धीरे-धीरे आती है और चली जाती है, जिससे वातावरण में जीवन का संचार होता है।

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Q3.3. अलंकार बताइए- (क) बड़े-बड़े पियराए पत्ते (ख) कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो (ग) खिली हुई हवा आई, फिरकी-सी आई, चली गई (घ) कि दहर-दहर दहकेंगे कहीं ढाक के जंगल

उत्तर:

(क) अनुप्रास अलंकार (Alliteration) – 'बड़े-बड़े पियराए पत्ते' में 'प' की पुनरावृत्ति। (ख) उपमा अलंकार (Simile) – 'कोई छह बजे सुबह जैसे गरम पानी से नहाई हो' में 'जैसे' का प्रयोग। (ग) रूपक अलंकार (Metaphor) – 'फिरकी-सी आई, चली गई' में हवा को फिरकी से तुलना। (घ) अनुप्रास अलंकार (Alliteration) – 'दहर-दहर दहकेंगे' में 'द' की पुनरावृत्ति।

व्याख्या:

अलंकारों की पहचान उनके लक्षणों से होती है। अनुप्रास में समान ध्वनि की पुनरावृत्ति, उपमा में 'जैसे' या 'सा' से तुलना, रूपक में बिना 'जैसे' के तुलना होती है।

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Q4.4. किन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि आज मनुष्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है?

उत्तर:

ऐसी पंक्तियाँ हैं जो यह दर्शाती हैं कि मनुष्य आज प्रकृति की सुंदरता को महसूस नहीं कर पाता, जैसे 'आज मनुष्य प्रकृति के सौंदर्य की अनुभूति से वंचित है' वाली पंक्तियाँ। उदाहरण स्वरूप, कविता में कहीं उल्लेख है कि मनुष्य प्रकृति के साथ जुड़ाव खो चुका है या उसकी सुंदरता को नहीं समझ पाता।

व्याख्या:

कवि ने यह भाव व्यक्त किया है कि आधुनिक जीवनशैली में मनुष्य प्रकृति के सौंदर्य से कट गया है, जिससे वह उसकी अनुभूति नहीं कर पाता।

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Q5.5. ‘प्रकृति मनुष्य की सहचरी है’ इस विषय पर विचार व्यक्त करते हुए आज के संदर्भ में इस कथन की वास्तविकता पर प्रकाश डालिए।

उत्तर:

प्रकृति मनुष्य की सहचरी है, अर्थात् प्रकृति मनुष्य के जीवन में साथी की तरह है। आज के संदर्भ में यह कथन सच है क्योंकि मनुष्य का जीवन प्रकृति पर निर्भर है – भोजन, जल, वायु, और आवास के लिए। परंतु आधुनिकता के कारण मनुष्य ने प्रकृति से दूरी बना ली है, जिससे पर्यावरण संकट उत्पन्न हुआ है। हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर उसका संरक्षण करना चाहिए ताकि यह सहचरता बनी रहे।

व्याख्या:

प्रकृति और मनुष्य का संबंध सहचरता का है। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से ही जीवन संभव है। आज के समय में प्रदूषण, वनों की कटाई, जल प्रदूषण आदि से यह सहचरता खतरे में है। इसलिए हमें प्रकृति के प्रति जागरूक होकर उसका सम्मान करना चाहिए।

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Q6.6. ‘वसंत आया’ कविता में कवि की चिंता क्या है?

उत्तर:

कवि की चिंता यह है कि वसंत ऋतु के सौंदर्य और आनंद को मनुष्य पूरी तरह से महसूस नहीं कर पाता क्योंकि वह प्रकृति से कट चुका है। इसके अलावा, कवि प्रकृति के संरक्षण और उसके साथ मनुष्य के संबंध को पुनः स्थापित करने की आवश्यकता पर भी चिंतित है।

व्याख्या:

कवि ने वसंत के आगमन को प्रकृति के सौंदर्य के रूप में प्रस्तुत किया है, परन्तु मनुष्य की व्यस्तता और आधुनिकता के कारण वह इसका आनंद नहीं ले पाता, जिससे कवि को चिंता होती है।

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Q7.1. ‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ शब्द किसके प्रतीक हैं?

उत्तर:

‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ शब्द कठोरता, अडिगता और स्थिरता के प्रतीक हैं। ये जीवन में कठिनाइयों, बाधाओं या कठोर परिस्थितियों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिन्हें तोड़ने या पार करने की आवश्यकता होती है।

व्याख्या:

कविता में ‘पत्थर’ और ‘चट्टान’ का प्रयोग जीवन की चुनौतियों और जड़ता को दर्शाने के लिए किया गया है, जिन्हें तोड़कर या पार करके विकास संभव है।

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Q8.2. भाव-सौंदर्य स्पष्ट कीजिए- मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खोज को? गोड़ो गोड़ो गोड़ो

उत्तर:

यहाँ मिट्टी में रस होने का अर्थ है कि जब जीवनदायिनी शक्ति होगी तभी बीज अंकुरित होगा। यह भाव मन की गहराई और खोज को दर्शाता है कि जब मन में ऊर्जा और संवेदना होगी तभी वह फलदायी होगा। 'गोड़ो गोड़ो गोड़ो' से यह आग्रह है कि मन की खोज को मिट्टी की तरह पोसना चाहिए।

व्याख्या:

कवि ने मिट्टी और बीज के माध्यम से मन की संवेदनशीलता और खोज की महत्ता को व्यक्त किया है। भाव है कि बिना पोषण के कोई विकास संभव नहीं।

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