Chapter 5
Chapter 5 — अध्ययन नोट्स
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पहाड़ी चित्रकला शैली
व्याख्यापहाड़ी चित्रकला शैली
पहाड़ी चित्रकला शैली भारतीय लघु चित्रकला की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जिसका विकास 17वीं से 19वीं शताब्दी के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में हुआ। इस शैली के प्रमुख केंद्र बसोहली, गुलेर, काँगड़ा, कुल्लू, चंबा, मनकोट, नूरपुर, मंडी, बिलासपुर, जम्मू और पश्चिमी हिमालय के अन्य पहाड़ी शहर थे। बसोहली से आरंभ हुई यह शैली गुलेर और आरंभिक काँगड़ा दौर से होते हुए काँगड़ा की अत्यंत उत्कृष्ट और परिष्कृत शैली के रूप में विकसित हुई। पहाड़ी चित्रकला शैली मुगल, दक्कनी और राजस्थानी चित्रकला से अलग अपनी क्षेत्रीय विविधताओं के कारण विशिष्ट पहचान रखती है। हालांकि इन केंद्रों में प्रकृति, स्थापत्य, चेहरे, पहनावे और रंगों की प्राथमिकता में भिन्नता थी, फिर भी ये सभी एक समग्र पहाड़ी शैली के अंतर्गत आते हैं। राजनीतिक सीमाओं की अनिश्चितता के कारण क्षेत्रीय वर्गीकरण कठिन है। शोधकर्ताओं के अनुसार, मुगल एवं राजस्थानी चित्रकला का प्रभाव पहाड़ी चित्रकला पर पड़ा, विशेषकर मुगल चित्रशाला के प्रवासी कलाकारों के कारण। बी.एन. गोस्वामी ने पंडित सिंऊ परिवार को इस शैली के विकास में मुख्य माना है, जिन्होंने बसोहली शैली से काँगड़ा शैली तक का विकास किया। पहाड़ी चित्रकला में प्राकृतिक दृश्यों का सूक्ष्म और मनोहर चित्रण, भावनाओं की अभिव्यक्ति और सुसज्जित हाशिये जैसे तत्व प्रमुख हैं।
- पहाड़ी चित्रकला शैली का विकास 17वीं से 19वीं शताब्दी के मध्य हिमालयी क्षेत्रों में हुआ।
- मुख्य केंद्र: बसोहली, गुलेर, काँगड़ा, कुल्लू, चंबा, मनकोट, नूरपुर, मंडी, बिलासपुर, जम्मू।
- शैली में क्षेत्रीय विविधता के बावजूद एक समग्र पहाड़ी शैली की पहचान होती है।
- मुगल और राजस्थानी चित्रकला का प्रभाव पहाड़ी चित्रकला पर पड़ा।
- पंडित सिंऊ परिवार ने इस शैली के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- प्राकृतिक दृश्यों का सूक्ष्म चित्रण और भावनात्मक अभिव्यक्ति शैली की विशेषताएँ हैं।
- 📌 पहाड़ी चित्रकला: हिमालयी क्षेत्रों में विकसित भारतीय लघु चित्रकला की शैली।
- 📌 पंडित सिंऊ परिवार: पहाड़ी चित्रकला के विकास में प्रमुख कलाकार परिवार।
- 📌 बसोहली शैली: पहाड़ी चित्रकला की प्रारंभिक और प्रभावशाली शैली।
बसोहली शैली
व्याख्याबसोहली शैली
बसोहली शैली पहाड़ी चित्रकला की सबसे प्राचीन और प्रभावशाली शाखा है, जिसका विकास 17वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बसोहली राज्य में हुआ। राजा कृपाल पाल (1678-1695) के संरक्षण में इस शैली ने विशेष पहचान बनाई। बसोहली शैली की प्रमुख विशेषताएँ हैं—प्रभावी प्राथमिक रंगों का प्रयोग, ऊष्ण पीली पृष्ठभूमि, उच्च क्षितिज रेखा, प्रकृति का शैलीगत दृश्यांकन, और गहनों में मोतियों के लिए उभरे हुए श्वेत रंग का अनुकरण। इस शैली की एक अनूठी विशेषता जेवरात को चित्रित करने के लिए छोटे चमकीले हरे कीट-पंखों के अंश और पन्ना के प्रभाव का उपयोग है। भानुदत्त की रासमंजरी इस शैली का सबसे लोकप्रिय विषय था। देवीदास नामक कलाकार ने भागवत पुराण और रागमाला जैसे धार्मिक विषयों पर उत्कृष्ट चित्र बनाए। बसोहली शैली के कलाकार धीरे-धीरे चंबा, कुल्लू जैसे अन्य पहाड़ी राज्यों में गए और स्थानीय परिवर्तनों के साथ इस शैली को विकसित किया। कुल्लू के शांगरी रामायण चित्रों में रामायण के अयोध्या कांड और वनवास जैसे प्रसंगों को जीवंतता से चित्रित किया गया है। इन चित्रों में भाव-भंगिमाओं, वस्त्राभूषणों, पशुओं और भीड़ के सूक्ष्म चित्रण से दृश्य की गंभीरता और भावनात्मकता प्रकट होती है।
- बसोहली शैली का विकास 17वीं शताब्दी के अंत में हुआ।
- राजा कृपाल पाल के संरक्षण में इस शैली ने प्रगति की।
- प्राथमिक रंग, ऊष्ण पीली पृष्ठभूमि, उच्च क्षितिज रेखा प्रमुख विशेषताएँ हैं।
- जेवरात चित्रण में हरे कीट-पंखों और पन्ना का प्रभाव अनूठा है।
- भानुदत्त की रासमंजरी और भागवत पुराण इस शैली के लोकप्रिय विषय हैं।
- कुल्लू के शांगरी रामायण चित्रों में भावनात्मक और सूक्ष्म चित्रण देखने को मिलता है।
- 📌 बसोहली शैली: पहाड़ी चित्रकला की प्रारंभिक शैली, जो चमकीले रंगों और भावपूर्ण चित्रण के लिए जानी जाती है।
- 📌 रासमंजरी: भानुदत्त द्वारा रचित काव्य, जो बसोहली चित्रों का लोकप्रिय विषय था।
- 📌 शांगरी रामायण: कुल्लू घाटी में चित्रित रामायण की एक प्रसिद्ध श्रृंखला।
गुलेर शैली
व्याख्यागुलेर शैली
गुलेर शैली अठारहवीं शताब्दी के आरंभ में बसोहली शैली में आए बदलाव के परिणामस्वरूप विकसित हुई। काँगड़ा के राजा गोवर्धन चंद (1744–1773) के संरक्षण में गुलेर शैली ने एक नवीन रूप धारण किया। इस शैली के प्रमुख कलाकार पंडित सिंऊ और उनके पुत्र मानक (मनकू) तथा
अभ्यास प्रश्न — Chapter 5
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. प्रकृति का चित्रण पहाड़ी लघुचित्रों में हर जगह दिखाई देता है। आपके अनुसार इसके क्या कारण हो सकते थे?
उत्तर:
प्रकृति का चित्रण पहाड़ी लघुचित्रों में इसलिए हर जगह दिखाई देता था क्योंकि पहाड़ी क्षेत्र प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर था। कलाकारों ने अपने आस-पास की प्राकृतिक छटा, जैसे पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, फूल, पक्षी आदि को अपनी कला में शामिल किया ताकि चित्रों में जीवन्तता और यथार्थता आ सके। इसके अलावा, प्रकृति का चित्रण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण था क्योंकि यह जीवन और प्रकृति के बीच के गहरे संबंध को दर्शाता था। पहाड़ी जीवन शैली और धार्मिक कथाओं में प्रकृति का विशेष स्थान था, इसलिए इसे चित्रों में प्रमुखता दी गई।
व्याख्या:
पहाड़ी क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक महत्व के कारण कलाकारों ने प्रकृति को अपनी चित्रकला का अभिन्न अंग बनाया। इससे चित्रों में जीवंतता आई और दर्शकों को आध्यात्मिक अनुभव भी प्राप्त हुआ।
Q2.2. पहाड़ी लघु चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ कौन-कौन सी हैं और किन स्थानों पर उनका विस्तार हुआ? वे आपस में एक-दूसरे से कैसे भिन्न थे? मानचित्र पर सभी पहाड़ी (हिमालय) शैलियों को अंकित कीजिए।
उत्तर:
पहाड़ी लघु चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ हैं: बसोहली, कांगड़ा, गूलर-कांगड़ा, और मुण्डी। स्थान: - बसोहली शैली: जम्मू-कश्मीर के बसोहली क्षेत्र में विकसित हुई। - कांगड़ा शैली: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा घाटी में विकसित हुई। - गूलर-कांगड़ा शैली: कांगड़ा के निकट गूलर क्षेत्र में। - मुण्डी शैली: हिमाचल प्रदेश के मुण्डी क्षेत्र में। भिन्नताएँ: - बसोहली शैली में रंगों का प्रयोग गाढ़ा और सरल था, रेखाएँ मोटी थीं और विषय अधिक लोकजीवन से जुड़े थे। - कांगड़ा शैली में रंगों की नर्मी, सूक्ष्मता और प्राकृतिक चित्रण अधिक था, भावों की अभिव्यक्ति गहरी थी। - गूलर-कांगड़ा शैली में कांगड़ा की ही तरह सूक्ष्मता थी परन्तु इसमें प्रयोगात्मकता अधिक थी। - मुण्डी शैली में चित्रों में धार्मिक और पौराणिक विषयों का अधिक चित्रण होता था। मानचित्र पर हिमालय क्षेत्र में इन शैलियों के स्थान अंकित किए जा सकते हैं।
व्याख्या:
प्रत्येक शैली का विकास अलग-अलग भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश में हुआ, जिससे उनकी तकनीक, विषय और रंग प्रयोग में भिन्नता आई। मानचित्र पर इन स्थानों को चिन्हित करने से समझ में आता है कि ये शैलियाँ हिमालय के विभिन्न भागों में फैली हुई थीं।
Q3.3. अपनी पाठ्यपुस्तक से कोई कहानी या कविता चुनकर, पहाड़ी लघुचित्र शैली की किसो भी शैली में चित्रित कीजिए।
उत्तर:
इस प्रश्न का उत्तर एक क्रियात्मक कार्य है जिसमें छात्र अपनी पाठ्यपुस्तक से कोई कहानी या कविता चुनकर उसे पहाड़ी लघुचित्र शैली (जैसे बसोहली, कांगड़ा आदि) में चित्रित करेंगे। उदाहरण के लिए, जयदेव की 'गीत गोविंद' की किसी कविता को कांगड़ा शैली में चित्रित किया जा सकता है, जिसमें राधा-कृष्ण की प्रेम लीला को दर्शाया जाता है। चित्रण में रंगों, भावों और प्राकृतिक पृष्ठभूमि का ध्यान रखा जाना चाहिए।
व्याख्या:
यह प्रश्न छात्र की रचनात्मकता और कला कौशल को परखने के लिए है। पाठ्यपुस्तक में दी गई कहानियों या कविताओं को समझकर उन्हें चित्रों के माध्यम से अभिव्यक्त करना आवश्यक है।
Q4.4. निम्नलिखित की समीक्षा कीजिए— (क) नैनसुख (ख) बसोहली चित्र (ग) अष्ट नायिकाएँ (घ) काँगड़ा कलम
उत्तर:
(क) नैनसुख: नैनसुख एक प्रसिद्ध कलाकार थे जिन्होंने पहाड़ी चित्रकला को कांगड़ा शैली के स्वर्णिम युग तक पहुँचाया। वे अपने संरक्षक बलवंत सिंह के साथ चित्रों में भी दिखाई देते हैं। उनकी कला में संयम, शांति और सूक्ष्म भावों की अभिव्यक्ति प्रमुख है। (ख) बसोहली चित्र: बसोहली शैली की चित्रकला में रंगों का प्रयोग गाढ़ा और सरल होता है। यह शैली जम्मू-कश्मीर के बसोहली क्षेत्र की है और इसमें लोकजीवन तथा धार्मिक विषयों का चित्रण होता है। (ग) अष्ट नायिकाएँ: अष्ट नायिकाएँ भारतीय कला और साहित्य में नायिकाओं के आठ प्रकार हैं जो प्रेम और भावनाओं के विभिन्न रूपों को दर्शाती हैं। पहाड़ी चित्रकला में इन्हें सुंदरता और भावों के साथ चित्रित किया जाता है। (घ) काँगड़ा कलम: काँगड़ा शैली की चित्रकला में सूक्ष्म रेखा, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग और भावों की गहराई होती है। यह शैली हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा क्षेत्र की है और इसमें आध्यात्मिक तथा प्रेमलीला विषयों का चित्रण होता है।
व्याख्या:
प्रत्येक विषय की समीक्षा में उसकी विशेषताएँ, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व तथा चित्रकला में योगदान को समझना आवश्यक है। इससे पहाड़ी चित्रकला की विविधता और समृद्धि का ज्ञान होता है।
Q5.पहाड़ी चित्रकला शैली किस क्षेत्र में विकसित हुई और इसके प्रमुख चित्रकला केंद्र कौन-कौन से थे?
उत्तर:
पश्चिमी हिमालय के बसोहली, गुलेर, काँगड़ा, कुल्लू, चंबा आदि क्षेत्र
व्याख्या:
पहाड़ी चित्रकला शैली मुख्यतः भारतीय हिमालय क्षेत्र में विकसित हुई थी। इसके प्रमुख केंद्रों में बसोहली, गुलेर, काँगड़ा, कुल्लू, चंबा, मनकोट, नूरपुर, मंडी, बिलासपुर, जम्मू और अन्य पश्चिमी हिमालय के शहर शामिल थे। ये क्षेत्र इस शैली के विकास और प्रसार के मुख्य केंद्र थे।
Q6.पहाड़ी चित्रकला शैली की मुख्य विशेषता क्या है जो इसे मुगल, दक्कनी और राजस्थानी चित्रकला से अलग करती है?
उत्तर:
क्षेत्रीय विविधताओं के कारण इसकी विशिष्ट पहचान
व्याख्या:
पहाड़ी चित्रकला शैली में क्षेत्रीय विविधताएँ प्रमुख हैं, जो इसे मुगल, दक्कनी और राजस्थानी चित्रकला से अलग बनाती हैं। यह विविधता प्रकृति, स्थापत्य, चेहरे, पहनावे और रंगों की प्राथमिकता में देखी जाती है, जबकि अन्य शैलियाँ अधिक एकरूप होती हैं।
Q7.पंडित सिंऊ परिवार का पहाड़ी चित्रकला शैली के विकास में क्या योगदान था?
उत्तर:
पंडित सिंऊ परिवार को पहाड़ी चित्रकला शैली के विकास में मुख्य माना जाता है। उन्होंने बसोहली शैली से काँगड़ा शैली तक का विकास किया और पहाड़ी चित्रकला की शृंखला को आकार दिया। उदाहरण के लिए, पंडित सिंऊ और उनके पुत्रों ने गुलेर-काँगड़ा शैली को विकसित किया।
व्याख्या:
पंडित सिंऊ परिवार ने पहाड़ी चित्रकला के प्रारंभिक और मध्य चरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बसोहली की सरल शैली को परिष्कृत काँगड़ा शैली में बदला। उनके परिवार के कलाकारों ने विभिन्न पहाड़ी केंद्रों में चित्रकला को फैलाया और मुगल शैली के प्रभाव को भी शामिल किया।
Q8.नीचे दिए गए चित्र का विवरण पढ़कर बताइए कि यह किस शैली का उदाहरण है और इसकी प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? चित्र विवरण: "कृष्ण मक्खन चुराते हुए, भागवत पुराण, 1750, एन. सी. मेहता संग्रह, अहमदाबाद"। चित्र में कृष्ण की लीलाएँ भावपूर्ण रूप से चित्रित हैं, रंग कोमल और आकृतियाँ सुंदर हैं।
उत्तर:
यह चित्र काँगड़ा शैली का उदाहरण है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं—महीन रेखाएं, कोमल रंग, महिला आकृतियों के चेहरे पर माथे से नाक तक सीधी रेखा, भावपूर्ण अभिव्यक्ति और प्राकृतिक दृश्यों का सूक्ष्म संयोजन।
व्याख्या:
यह चित्र काँगड़ा शैली की विशिष्टता को दर्शाता है जिसमें कृष्ण की लीलाओं को गीतात्मक और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। रंगों की कोमलता और आकृतियों की सुंदरता इस शैली की पहचान हैं। चित्र में भागवत पुराण के प्रसंगों को सूक्ष्म भावों के साथ चित्रित किया गया है।
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Fine Art · Class 12