Chapter 1
Chapter 1 — अध्ययन नोट्स
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पांडुलिपि चित्रकला की परंपरा
व्याख्यापांडुलिपि चित्रकला की परंपरा
पांडुलिपि चित्रकला की परंपरा भारतीय चित्रकला के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। पाँचवीं शताब्दी में रचित विष्णुधर्मोत्तर पुराण के तीसरे खंड में 'चित्रसूत्र' नामक अध्याय को भारतीय कला और विशेषकर चित्रकला की स्रोत पुस्तक के रूप में स्वीकार किया गया है। इस अध्याय में आकृति निर्माण की कला, जिसे 'प्रतिमा लक्षण' कहा गया है, का विस्तृत वर्णन है। यह प्रतिमा लक्षण चित्रकला के धर्मसूत्र हैं, जिनमें तकनीक, उपकरण, सामग्रियों, सतह (जैसे दीवार या भित्ति), धारणा, परिप्रेक्ष्य और मानव आकृतियों के त्रि-आयामों की संरचना का उल्लेख है। चित्रण के विभिन्न अंगों जैसे रूप-भेद (दृश्य और आकार), प्रमाण (परिमाप), अनुपात, संरचना, भाव (अभिव्यंजना), लावण्य योजना (सौंदर्य रचना), सदृशता और वार्णिक भंग (तूलिका और रंगों के उपयोग) की विस्तारपूर्वक व्याख्या की गई है। इन धर्मसूत्रों को कलाकार सदियों से पढ़ते, समझते और अनुसरण करते आए हैं, जिससे यह भारतीय चित्रकला की सभी शैलियों और चित्रशालाओं का आधार बन गया। मध्यकालीन चित्रकला को उनके छोटे आकार के कारण 'लघु चित्रकारी' कहा गया। ये चित्र हाथों में लेकर करीब से देखे जाते थे, जबकि महलों या राजदरबारों की दीवारों को भित्ति चित्रों से सजाया जाता था। पांडुलिपि चित्रकला में महाकाव्यों, साहित्यिक और संगीत ग्रंथों के छंदों का चित्रण होता था। चित्रपट के शीर्ष भाग में हस्तलिखित छंद सीमांकित आयताकार स्थानों में लिखा जाता था। पांडुलिपि चित्रण को विषय अनुसार विभिन्न भागों में व्यवस्थित किया जाता था, जिसमें प्रत्येक पर्ण (फोलियो) पर संबंधित लेख चित्र के ऊपर या पीछे अंकित होता था। इस प्रकार पांडुलिपि चित्रकला न केवल कला का माध्यम थी, बल्कि साहित्य, धर्म और संस्कृति के संरक्षण का भी महत्वपूर्ण साधन थी।
- विष्णुधर्मोत्तर पुराण का 'चित्रसूत्र' अध्याय चित्रकला का स्रोत है।
- प्रतिमा लक्षण चित्रकला के धर्मसूत्र हैं, जिनमें तकनीक और उपकरणों का वर्णन है।
- मध्यकालीन चित्रकला को लघु चित्रकारी कहा जाता था।
- पांडुलिपि चित्रकला में साहित्यिक ग्रंथों के छंदों का चित्रण होता था।
- प्रत्येक चित्र के ऊपर या पीछे संबंधित लेख अंकित होता था।
- 📌 पांडुलिपि चित्रकला: हस्तलिखित ग्रंथों पर चित्रित कला।
- 📌 प्रतिमा लक्षण: चित्रकला के धर्मसूत्र जो आकृति निर्माण की विधि बताते हैं।
- 📌 लघु चित्रकारी: छोटे आकार की चित्रकला जिसे हाथ में लेकर देखा जाता था।
पांडुलिपि चित्रकला का संग्रह और संरक्षण
व्याख्यापांडुलिपि चित्रकला का संग्रह और संरक्षण
पांडुलिपि चित्रकला के संग्रह और संरक्षण की परंपरा भारतीय कला की समृद्ध विरासत को संरक्षित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। रामायण, भागवत पुराण, महाभारत, गीत गोविंद, रागमाला जैसे ग्रंथों के चित्रों का संकलन किया जाता था। प्रत्येक संग्रह को कपड़े के टुकड़े से लपेटकर राजा या संरक्षक के पुस्तकालय में गठरी या पोटली के रूप में रखा जाता था। संग्रह का सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठ पुष्पिका पृष्ठ होता था, जिसमें संरक्षक, कलाकार या लेखक का नाम, तिथि, संग्रह बनाने का स्थान और अन्य महत्वपूर्ण विवरण लिखे होते थे। हालांकि समय के साथ कई पुष्पिका पृष्ठ लुप्त हो गए हैं। चित्रकला आग, नमी और अन्य आपदाओं के प्रति अतिसंवेदनशील होती है, इसलिए इन्हें संरक्षित करना चुनौतीपूर्ण था। चित्रों को राजकुमारियों के विवाह में उपहार के रूप में, राजाओं और दरबारियों के बीच कृतज्ञता के प्रतीक के रूप में आदान-प्रदान किया जाता था। तीर्थयात्रियों, भिक्षुओं, व्यापारी और कथावाचक इन चित्रों को दूर-दराज के क्षेत्रों में ले जाते थे, जिससे चित्रकला का प्रसार होता था। उदाहरण के लिए, बूंदी के राजा के पास मेवाड़ के चित्रों का संग्रह था और मेवाड़ के राजा के संग्रह में बूंदी के चित्र मिलते थे। चित्रकला के इतिहास का पुनर्निर्माण कठिन है क्योंकि कई चित्र अदिनांकित हैं और बिखरे हुए हैं। इन्हें शैलीगत आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। इस प्रकार पांडुलिपि चित्रकला का संग्रह और संरक्षण कला के इतिहास और विकास को समझने में सहायक है।
- रामायण, भागवत पुराण, महाभारत आदि के चित्रों का संग्रह किया जाता था।
- प्रत्येक संग्रह को कपड़े में लपेटकर गठरी के रूप में रखा जाता था।
- पुष्पिका पृष्ठ में संरक्षक, कलाकार, तिथि आदि का विवरण होता था।
- चित्रकला आग, नमी आदि से प्रभावित होती है, इसलिए संरक्षण चुनौतीपूर्ण था।
- चित्रों का आदान-प्रदान उपहार और धार्मिक कृत्य के रूप में होता था।
- चित्रों का इतिहास शैलीगत आधार पर वर्गीकृत किया जाता है।
- 📌 पुष्पिका पृष्ठ: पांडुलिपि का महत्वपूर्ण पृष्ठ जिसमें विवरण लिखा होता है।
- 📌 गठरी: कपड़े में लिपटी पांडुलिपि का संग्रह।
पश्चिम भारतीय चित्रकला शैली
व्याख्यापश्चिम भारतीय चित्रकला शैली
पश्चिम भारतीय चित्रकला शैली भारत के पश्चिमी भाग में विकसित हुई, जिसमें गुजरात, राजस्थान के दक्षिणी भाग और मध्य भारत के पश्चिमी भाग शामिल हैं। गुजरात के बंदरगाहों के कारण यह क्षेत्र व्यापारिक दृष्टि से समृद्ध था, जिससे यहाँ के व्यापारी और सामंत कला के
अभ्यास प्रश्न — Chapter 1
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. पांडुलिपि चित्रकला क्या है? दो स्थानों का नाम बताएँ जहाँ पांडुलिपि चित्रकला की परंपरा प्रचलित थी?
उत्तर:
पांडुलिपि चित्रकला वह कला है जिसमें धार्मिक, साहित्यिक या अन्य ग्रंथों को सुंदर चित्रों के साथ सजाया जाता है। यह चित्रकला मुख्यतः पांडुलिपियों के पन्नों पर की जाती है। पांडुलिपि चित्रकला की परंपरा मुख्यतः भारत के कश्मीर और बंगाल क्षेत्रों में प्रचलित थी।
व्याख्या:
पांडुलिपि चित्रकला ग्रंथों को सजाने की कला है। कश्मीर और बंगाल में इस कला की समृद्ध परंपरा रही है।
Q2.2. हमारी भाषाओं की पाठ्यपुस्तकों में से किसी एक से एक अध्याय लें तथा चयनित पाठ का सचित्र लेखन करें (न्यूनतम पाँच पृष्ठ)।
उत्तर:
यह एक रचनात्मक कार्य है जिसमें विद्यार्थी अपनी भाषा की पाठ्यपुस्तक से किसी एक अध्याय का चयन कर उसके मुख्य अंशों को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करता है। इसमें पाठ के भाव, पात्र, घटनाएँ और परिवेश को चित्रों के द्वारा स्पष्ट किया जाता है। न्यूनतम पाँच पृष्ठों में इस सचित्र लेखन को पूरा करना होता है।
व्याख्या:
यह प्रश्न विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तक के अध्याय को समझकर उसे चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करता है। चित्रकला के साथ पाठ का संयोजन समझ को गहरा करता है।
Q3.पांडुलिपि चित्रकला की परंपरा में 'प्रतिमा लक्षण' से क्या तात्पर्य है? इसे संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
'प्रतिमा लक्षण' चित्रकला के धर्मसूत्र हैं, जो आकृति बनाने की कला से संबंधित हैं। इनमें तकनीक, उपकरण, सामग्री, सतह, धारणा, परिप्रेक्ष्य और त्रि-आयामी मानव आकृतियों की संरचना का वर्णन होता है। उदाहरण के लिए, विष्णुधर्मोत्तर पुराण के चित्रसूत्र अध्याय में इसका विस्तार से उल्लेख है।
व्याख्या:
प्रतिमा लक्षण भारतीय चित्रकला की मूलभूत तकनीकी और शास्त्रीय नियमावली है, जिसे कलाकार सदियों से अनुसरण करते आए हैं। यह चित्रकला के विभिन्न अंगों जैसे रूप-भेद, प्रमाण, अनुपात, भाव, लावण्य योजना आदि को व्यवस्थित करता है।
Q4.मध्यकालीन चित्रकला को 'लघु चित्रकारी' क्यों कहा जाता था? इसका उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
'लघु चित्रकारी' मध्यकालीन चित्रकला का वह वर्ग था जो छोटे आकार का होता था। इसे हाथों में लेकर करीब से देखा जाता था। इसका उद्देश्य दीवारों पर प्रदर्शित करना नहीं था, बल्कि पांडुलिपि चित्रण के लिए होता था। उदाहरण के लिए, महाकाव्यों और साहित्यिक ग्रंथों के छंदों का चित्रण।
व्याख्या:
लघु चित्रकारी छोटे आकार की होती थी ताकि इसे हाथ में लेकर ध्यान से देखा जा सके। यह चित्रकला दीवारों की सजावट के लिए नहीं, बल्कि पांडुलिपि के रूप में साहित्यिक और धार्मिक ग्रंथों के चित्रण के लिए होती थी।
Q5.पांडुलिपि चित्रकला में चित्रपट के शीर्ष भाग में क्या लिखा जाता था और इसका महत्व क्या था?
उत्तर:
चित्रपट के शीर्ष भाग में हस्तलिखित छंद सीमांकित आयताकार स्थानों में लिखा जाता था। इसका महत्व यह था कि यह चित्र के विषय को स्पष्ट करता था और पांडुलिपि के साहित्यिक या धार्मिक संदर्भ को दर्शाता था। उदाहरण के लिए, रामायण या भागवत पुराण के छंद।
व्याख्या:
शीर्ष भाग में छंद लिखने से चित्र और लेखन का समन्वय होता था। इससे पाठक को चित्र की विषयवस्तु समझने में सहायता मिलती थी। कभी-कभी यह लेख चित्र के पीछे भी लिखा जाता था।
Q6.पांडुलिपि चित्रकला के संग्रह और संरक्षण की परंपरा में पुष्पिका पृष्ठ का क्या महत्व था? इसे समझाइए।
उत्तर:
पुष्पिका पृष्ठ संग्रह का सबसे महत्वपूर्ण पृष्ठ होता था, जिसमें संरक्षक का नाम, कलाकार या लेखक, तिथि, संग्रह बनाने का स्थान और अन्य महत्वपूर्ण विवरण लिखे होते थे। इसका महत्व संग्रह की पहचान और प्रमाणिकता में होता था। उदाहरण के लिए, मेवाड़ के विजयसिंह के संग्रह में पुष्पिका पृष्ठ होता था।
व्याख्या:
पुष्पिका पृष्ठ से संग्रह की जानकारी मिलती थी, जो कला के इतिहास और संरक्षण के लिए आवश्यक थी। समय के साथ ये पृष्ठ लुप्त हो गए हैं, जिससे शोधकर्ताओं को कठिनाई होती है।
Q7.पांडुलिपि चित्रकला के संरक्षण के लिए किस प्रकार की सामग्री और विधि का उपयोग किया जाता था? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
पांडुलिपि चित्रकला को कपड़े के टुकड़े से लपेटकर गठरी या पोटली के रूप में संग्रहित किया जाता था। पृष्ठों को लकड़ी के आवरण (पटलिस) में बाँधा जाता था और डोर से सुरक्षित रखा जाता था। उदाहरण के लिए, मेवाड़ और बूंदी के संग्रह।
व्याख्या:
इस प्रकार की संरक्षण विधि से चित्रकला को आग, नमी और अन्य आपदाओं से बचाया जाता था। लकड़ी के आवरण और कपड़े की गठरी चित्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करती थी।
Q8.निम्नलिखित में से कौन-सी पांडुलिपि चित्रकला शैली पश्चिम भारत में विकसित हुई थी? A) पाल शैली B) जैन शैली C) सल्तनत शैली D) मुगल शैली
उत्तर:
जैन शैली
व्याख्या:
पश्चिम भारतीय चित्रकला शैली में गुजरात, राजस्थान के दक्षिणी भाग और मध्य भारत के पश्चिमी भाग शामिल हैं, जहाँ मुख्य रूप से जैन समुदाय ने जैन धर्म के विषयों को चित्रित कर इस शैली को समृद्ध किया। पाल शैली पूर्वी भारत की है, सल्तनत शैली बाद में विकसित हुई।
Bhartiya Kala ka Itihaas Bhag 2 के सभी 8 अध्याय
Fine Art · Class 12