NCERTCh 2निःशुल्क

Chapter 2

🎓 Class 12📖 Bhartiya Kala ka Itihaas Bhag 2📖 17 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~26 मिनट
Chapter 1अध्याय 2 / 8Chapter 3

Chapter 2अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 17 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

राजस्थानी चित्रकला शैली

व्याख्या

राजस्थानी चित्रकला शैली

राजस्थानी चित्रकला शैली उन चित्रकला शैलियों को कहा जाता है जो मुख्य रूप से राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के कुछ शाही राज्यों में विकसित हुईं। इनमें मेवाड़, बूंदी, कोटा, जयपुर, बीकानेर, किशनगढ़, जोधपुर (मारवाड़), मालवा, सिरोही आदि प्रमुख हैं। यह शैली सोलहवीं शताब्दी के मध्य से उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक विकसित हुई। आनंद कुमारस्वामी ने 1916 में इसे ‘राजपूत चित्रकला’ नाम दिया था, क्योंकि इन राज्यों के शासक राजपूत थे और यह मुगल चित्रकला से भिन्न थी। बाद में इस नाम को बदलकर राजस्थानी और पहाड़ी शैली कहा जाने लगा। राजस्थानी चित्रकला की विशेषताएँ हैं - सशक्त रेखांकन, रंगों की वरीयता (चमकदार व सौम्य), संयोजन के तत्व जैसे वास्तु, मानव आकृतियाँ, प्रकृति, अंकन तकनीक, प्रकृतिवाद और वर्णन विधि। चित्रकला सामान्यतया वसली (कागज के पन्नों को गोंद से चिपकाकर बनाई गई सतह) पर की जाती थी। रेखांकन के बाद प्राकृतिक खनिज रंगों और सोना-चाँदी जैसे धातुओं से चित्र रंगे जाते थे। ब्रुश ऊँट या गिलहरी के बालों से बनते थे। चित्रण के बाद अगेट पत्थर से पुटाई की जाती थी जिससे चित्र की सतह चमकदार और समतल होती थी। चित्रकला एक सामूहिक कार्य था जिसमें एक प्रधान कलाकार रेखांकन करता था और शिष्य रंग भरते थे। अंत में प्रधान कलाकार अंतिम रूप देता था। सुलेखक चित्र के संबंधित श्लोक या पद लिखता था।

  • राजस्थानी चित्रकला शैली राजस्थान और मध्य प्रदेश के शाही राज्यों में विकसित हुई।
  • इस शैली का विकास सोलहवीं से उन्नीसवीं शताब्दी के बीच हुआ।
  • चित्रकला में सशक्त रेखांकन, चमकदार और सौम्य रंगों का प्रयोग होता था।
  • चित्रकला वसली पर की जाती थी, जिसमें प्राकृतिक खनिज रंग और धातु प्रयोग होते थे।
  • चित्रकला सामूहिक कार्य था, जिसमें प्रधान कलाकार और शिष्य मिलकर काम करते थे।
  • चित्रण के बाद अगेट पत्थर से पुटाई की जाती थी जिससे चित्र की सतह चमकदार बनती थी।
  • 📌 वसली: कागज के पन्नों को गोंद से चिपकाकर बनाई गई चित्रकला की सतह।
  • 📌 पुटाई: चित्र की सतह को अगेट पत्थर से रगड़कर चमकदार बनाना।
  • 📌 प्रधान कलाकार: चित्रकला कार्य का नेतृत्व करने वाला मुख्य कलाकार।

चित्रकला के विषय—एक समीक्षा

व्याख्या

चित्रकला के विषय—एक समीक्षा

सोलहवीं शताब्दी तक राम और कृष्ण से संबंधित वैष्णव भक्ति आंदोलन पूरे भारत में लोकप्रिय हो चुका था। कृष्ण की उपासना केवल ईश्वर के रूप में नहीं, बल्कि आदर्श प्रेमी के रूप में भी की जाने लगी। प्रेम की धारणा धार्मिक विषय के रूप में पोषित हुई, जिसमें भावना और रहस्यवाद का समन्वय था। गीत गोविंद (जयदेव, 12वीं शताब्दी) में राधा-कृष्ण के आध्यात्मिक प्रेम को भौतिक रूप में चित्रित किया गया। भानुदत्त ने 14वीं शताब्दी में रसमंजरी नामक संस्कृत ग्रंथ लिखा, जिसमें रसों और नायिका-नायक के प्रकारों का वर्णन है। रसिकप्रिया (केशवदास, 1591) में प्रेम की विभिन्न अवस्थाओं को राधा-कृष्ण के माध्यम से दर्शाया गया। बिहारी सतसई (बिहारीलाल, 1667) में सूक्ति और नैतिक हाजिरजवाबी के पद हैं जो जयपुर और पहाड़ी शैली में चित्रित हुए। रागमाला चित्रकला में रागों और रागिनियों को चित्रात्मक रूप दिया गया। प्रत्येक राग एक विशेष समय, ऋतु और अवस्था से जुड़ा होता है। चारण और अन्य प्रेमाख्यान जैसे डोलामारू, सोनी-महिवाल आदि भी चित्रकारों के प्रिय विषय थे। रामायण, भागवतपुराण, महाभारत, देवी महात्म्य जैसे ग्रंथों के चित्र भी बनाए गए। दरबार के दृश्य, शिकार, युद्ध, उत्सव, वनमोज, नृत्य, संगीत, त्यौहार, वैवाहिक उत्सव, शहरी जीवन आदि विषय भी चित्रों में प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।

  • राम और कृष्ण से संबंधित वैष्णव भक्ति आंदोलन चित्रकला के प्रमुख विषय थे।
  • गीत गोविंद, रसिकप्रिया, रसमंजरी जैसे ग्रंथ चित्रकारों के लिए प्रेरणा स्रोत थे।
  • रागमाला चित्रकला में रागों और रागिनियों को चित्रित किया जाता था।
  • चारण और लोक प्रेम कथाएँ चित्रकला के लोकप्रिय विषय थे।
  • दरबार के शिकार, युद्ध, उत्सव, नृत्य आदि विषय भी चित्रों में दर्शाए गए।
  • 📌 गीत गोविंद: जयदेव द्वारा रचित संस्कृत काव्य जिसमें राधा-कृष्ण के प्रेम का वर्णन है।
  • 📌 रसिकप्रिया: केशवदास द्वारा रचित ब्रजभाषा काव्य जिसमें प्रेम की विभिन्न अवस्थाएँ वर्णित हैं।
  • 📌 रागमाला: रागों और रागिनियों की चित्रात्मक अभिव्यक्ति।

मालवा चित्रकला शैली

व्याख्या

मालवा चित्रकला शैली

मालवा चित्रकला शैली सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में विकसित हुई और यह हिंदू राजपूत दरबार की प्रतिनिधि शैली है। इसकी द्वि-आयामी, सपाट और सरल भाषा जैन पांडुलिपियों से विकसित हुई। मालवा शैली मध्य भारत के बड़े भू-भाग में फैली थी, जिसमें मांडू, नुसरतगढ़ और

अभ्यास प्रश्नChapter 2

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. आपके विचार में किस प्रकार से पश्चिमी भारतीय पांडुलिपि चित्रकला परंपरा ने राजस्थान लघु चित्रकला परंपराओं के विकास को दिशा निर्देश दिए?

उत्तर:

पश्चिमी भारतीय पांडुलिपि चित्रकला परंपरा ने राजस्थान की लघु चित्रकला परंपराओं को कई महत्वपूर्ण दिशानिर्देश प्रदान किए। इस परंपरा ने विषय चयन, रंग प्रयोग, रेखांकन शैली, और कथात्मक प्रस्तुति के तरीकों को प्रभावित किया। उदाहरण के लिए, भागवत पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों के चित्रण में कृष्ण की लीलाओं को विस्तार से दिखाने की परंपरा राजस्थान की चित्रकला में भी विकसित हुई। साथ ही, सतह को सावधानीपूर्वक विभाजित कर विभिन्न दृश्यों को एक साथ प्रस्तुत करने की शैली भी पश्चिमी भारतीय पांडुलिपि चित्रकला से प्रेरित थी। इस प्रकार, यह परंपरा राजस्थान की चित्रकला को न केवल तकनीकी बल्कि विषयगत दृष्टि से भी समृद्ध करने में सहायक रही।

व्याख्या:

पश्चिमी भारतीय पांडुलिपि चित्रकला की तकनीक, विषय चयन और प्रस्तुति शैली ने राजस्थान की लघु चित्रकला को दिशा दी। भागवत पुराण के चित्रण में कृष्ण की लीलाओं को विभिन्न दृश्यों में विभाजित कर दिखाना इसका उदाहरण है। इस प्रकार की कथात्मक प्रस्तुति राजस्थान की चित्रकला में भी अपनाई गई। रंगों और रेखांकन की शैली में भी इसका प्रभाव देखा जाता है।

MediumNCERT
Q2.2. राजस्थानी चित्रकला की विभिन्न शैलियों का वर्णन करें और उनकी विशेषताओं को उदाहरण सहित लिखें।

उत्तर:

राजस्थानी चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ हैं: मालवा, मेवाड़, मारवाड़, बूंदी, किशनगढ़, और जोधपुर। - मालवा शैली: सतह को सावधानीपूर्वक विभाजित कर विभिन्न दृश्यों को एक साथ प्रस्तुत करती है। उदाहरण के लिए, भागवत पुराण के चित्र जिसमें कृष्ण की लीलाओं के कई दृश्य एक पृष्ठ पर दिखाए गए हैं। - मेवाड़ शैली: इसमें रागमाला चित्रों का संग्रह महत्वपूर्ण है, जैसे मारु रागिनी, जो शारीरिक सुंदरता और भावों को दर्शाती है। - मारवाड़ शैली: इसमें युद्ध और राजसी जीवन के चित्रण प्रमुख हैं। - बूंदी और किशनगढ़ शैली: चेहरे की विशेषताओं और रंगों में विशिष्टता होती है। - जोधपुर शैली: मुगल और दक्कन प्रभाव के साथ चौगन खेलती राजकुमारीयों के चित्र प्रसिद्ध हैं। प्रत्येक शैली की अपनी विशिष्ट रंग योजना, रेखांकन शैली और विषय होते हैं जो राजस्थान की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाते हैं।

व्याख्या:

प्रत्येक शैली की विशेषताओं को समझने के लिए उनके प्रमुख चित्रों का अध्ययन आवश्यक है। मालवा शैली में सतह विभाजन, मेवाड़ में रागमाला चित्र, जोधपुर में मुगल प्रभाव आदि प्रमुख हैं। उदाहरण चित्रों से इन विशेषताओं को स्पष्ट किया जा सकता है।

MediumNCERT
Q3.3. रागमाला क्या है? राजस्थान की विभिन्न शैलियों से रागमाला चित्रों के उदाहरण दीजिए।

उत्तर:

रागमाला एक चित्रकला शैली है जिसमें विभिन्न रागों और रागिनियों को चित्रों के माध्यम से दर्शाया जाता है। यह संगीत और चित्रकला का संयोजन है, जिसमें प्रत्येक राग या रागिनी की विशिष्ट भावनाओं, समय और ऋतु को चित्रित किया जाता है। राजस्थान की विभिन्न शैलियों में रागमाला चित्रों के उदाहरण हैं: - मेवाड़ शैली: मारु रागिनी, जो राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में संग्रहित है, जिसमें मारु को राग श्री की रागिनी के रूप में दर्शाया गया है। - बूंदी और किशनगढ़ शैली में भी रागमाला चित्रों की परंपरा रही है, जहां रंगों और भावों के माध्यम से रागों का चित्रण किया जाता है। रागमाला चित्रों में कलाकारों ने पद्य और चित्र दोनों को समतुल्य महत्व दिया है, जिससे चित्रों में लिखित पद्य के अनुरूप भावनात्मक अभिव्यक्ति मिलती है।

व्याख्या:

रागमाला चित्रकला संगीत के रागों को चित्रों के माध्यम से व्यक्त करती है। राजस्थान की मेवाड़ शैली में मारु रागिनी इसका प्रमुख उदाहरण है। चित्रों में रागों की भावनाओं और कथाओं को दर्शाया जाता है।

MediumNCERT
Q4.4. एक मानचित्र बनाएँ और उसमें राजस्थानी लघु चित्रकारी की सभी शैलियों को दर्शाएँ।

उत्तर:

राजस्थान का मानचित्र बनाएं और उसमें प्रमुख लघु चित्रकला शैलियों के क्षेत्र चिन्हित करें: - मालवा शैली: राजस्थान के दक्षिण-पश्चिमी भाग में - मेवाड़ शैली: उदयपुर और आसपास के क्षेत्र में - मारवाड़ शैली: जोधपुर क्षेत्र में - बूंदी शैली: बूंदी जिले में - किशनगढ़ शैली: किशनगढ़ क्षेत्र में - जोधपुर शैली: जोधपुर के आसपास मानचित्र में प्रत्येक शैली के क्षेत्र को अलग-अलग रंगों या प्रतीकों से दर्शाएं और उनके नाम लिखें। इससे राजस्थान की चित्रकला की भौगोलिक विविधता स्पष्ट होगी।

व्याख्या:

मानचित्र पर शैलियों के क्षेत्र चिन्हित करने से उनकी भौगोलिक स्थिति और सांस्कृतिक प्रभाव समझने में मदद मिलती है। प्रत्येक शैली के केंद्र और प्रभाव क्षेत्र को दर्शाना आवश्यक है।

MediumNCERT
Q5.5. कौन-से ग्रंथ लघु चित्रकारी के लिए सामग्री और विषय प्रदान करते हैं? उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।

उत्तर:

लघु चित्रकारी के लिए अनेक धार्मिक और सांस्कृतिक ग्रंथ विषय और सामग्री प्रदान करते हैं। प्रमुख ग्रंथ हैं: - भागवत पुराण: भगवान कृष्ण के जीवन और लीलाओं के चित्रण के लिए प्रमुख स्रोत। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय संग्रहालय में संग्रहित भागवत पुराण के चित्र जिसमें कृष्ण द्वारा दानव शक्तासुर का वध दर्शाया गया है। - रागमाला ग्रंथ: विभिन्न रागों और रागिनियों के चित्रण के लिए। जैसे मेवाड़ की मारु रागिनी। - अन्य धार्मिक ग्रंथ जैसे रामायण, महाभारत, और विभिन्न लोककथाएँ भी चित्रकारी के लिए विषय प्रदान करती हैं। इन ग्रंथों से कलाकारों ने कथानक, भाव, और सांस्कृतिक संदर्भ लेकर चित्रों में जीवंतता प्रदान की है।

व्याख्या:

भागवत पुराण जैसे धार्मिक ग्रंथों ने चित्रकारी के लिए विस्तृत विषय प्रदान किए। रागमाला ग्रंथ संगीत और चित्रकला के संयोजन के लिए आधार हैं। इन ग्रंथों के माध्यम से चित्रकारों ने धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक कथाओं को चित्रित किया।

MediumNCERT
Q6.राजस्थानी चित्रकला शैली का विकास किन क्षेत्रों में हुआ था और इसका समयकाल क्या था?
A.A) राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ शाही राज्यों में, सोलहवीं शताब्दी के मध्य से उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक
B.B) केवल राजस्थान में, सत्रहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक
C.C) पूरे भारत में, बारहवीं से पंद्रहवीं शताब्दी तक
D.D) केवल मध्य प्रदेश में, सोलहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक

उत्तर:

राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ शाही राज्यों में, सोलहवीं शताब्दी के मध्य से उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक

व्याख्या:

राजस्थानी चित्रकला शैली मुख्य रूप से राजस्थान और मध्य प्रदेश के कुछ शाही राज्यों जैसे मेवाड़, बूंदी, कोटा आदि में विकसित हुई थी। इसका विकास सोलहवीं शताब्दी के मध्य से लेकर उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक हुआ।

Easy
Q7.चित्रकला के निर्माण में वसली क्या होती है और इसे बनाने की प्रक्रिया क्या है?

उत्तर:

व्याख्या:

वसली कागज के पतले पन्नों को गोंद से चिपकाकर आवश्यक मोटाई में बनाई गई सतह होती है। इसे बनाने की प्रक्रिया में कई कागज के पन्नों को एक-दूसरे से चिपकाकर मोटी सतह तैयार की जाती है, जिस पर चित्रकला की जाती है। यह सतह चित्रों के लिए मजबूत आधार प्रदान करती है।

Medium
Q8.राजस्थानी चित्रकला में रंगों के निर्माण के लिए किन पदार्थों का उपयोग किया जाता था?

उत्तर:

प्रकृति से प्राप्त खनिज पदार्थों और सोना व चाँदी / प्राकृतिक खनिज रंग और बहुमूल्य धातुएं

व्याख्या:

राजस्थानी चित्रकला में रंग मुख्य रूप से प्राकृतिक खनिज पदार्थों से बनाए जाते थे। इसके अलावा सोना और चाँदी जैसे बहुमूल्य धातुओं का भी उपयोग रंगों के निर्माण में किया जाता था, जिन्हें गोंद में मिलाकर चित्रों में लगाया जाता था।

Easy