Chapter 4
Chapter 4 — अध्ययन नोट्स
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दक्कनी चित्रकला शैली
व्याख्यादक्कनी चित्रकला शैली
दक्कनी चित्रकला शैली का इतिहास सोलहवीं शताब्दी के अंत से सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक फैला हुआ है, जब मुगलों ने दक्कन पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। यह शैली उन्नीसवीं शताब्दी के असफिया राजवंश, प्रांतीय राज्यों के राजाओं, नवाबों और हैदराबाद के निजामों के अधीनस्थ शासकों के काल तक प्रभावी रही। परंपरागत रूप से इसे इंडो-पर्शियन शैली माना जाता था, लेकिन यह शैली मध्य पूर्वी सफ्राविद, फ़ारसी, तुर्की और मुगल चित्रकला की मिश्रित छवि है। कला इतिहासकारों ने इसे स्वतंत्र शैली के रूप में पूर्णतः स्वीकार नहीं किया, परन्तु दक्कन के राजाओं ने इस शैली को संरक्षण दिया और इसे अपनी शासकीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया। इस शैली में मानव आकृतियों का चित्रण, ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों का चित्रांकन प्रमुख था। यह चित्रकला मुगल, सफ्राविद और ऑटोमन शैलियों से प्रभावित थी, लेकिन अपनी विशिष्टता भी रखती थी। दक्कनी चित्रकला में रंगों की तीव्रता, संयोजन की जटिलता और सौंदर्यबोध की सहज अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। यह शैली दक्षिण भारत के पठारी क्षेत्रों में विकसित हुई, जहाँ बीजापुर, गोलकुंडा और अहमदनगर के शासकों ने इसे परिष्कृत किया। चित्रकारों ने घने संयोजन वाले चित्रों में प्रेम, सौंदर्य और सांस्कृतिक भावनाओं को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। रंग योजना में तीव्रता और क्षेत्रीय सौंदर्यबोध का मेल इस शैली की प्रमुख विशेषता है। दक्कनी चित्रकला में फ़ारसी प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता है, विशेषकर पृष्ठभूमि और आकाश के चित्रण में। इस प्रकार दक्कनी चित्रकला शैली मुगल चित्रकला से भिन्न होते हुए भी उससे प्रभावित रही और अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।
- दक्कनी चित्रकला का विकास सोलहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक हुआ।
- इसे पारंपरिक रूप से इंडो-पर्शियन शैली माना जाता था।
- मध्य पूर्वी सफ्राविद, फ़ारसी, तुर्की और मुगल चित्रकला से प्रभावित।
- दक्कन के राजाओं ने इस शैली को संरक्षण दिया और विकसित किया।
- मानव आकृतियों, ऐतिहासिक और धार्मिक विषयों का चित्रण प्रमुख।
- रंगों की तीव्रता और क्षेत्रीय सौंदर्यबोध इस शैली की विशेषताएँ हैं।
- 📌 दक्कनी चित्रकला: दक्कन क्षेत्र की विशिष्ट चित्रकला शैली जो मुगल और फ़ारसी प्रभावों से प्रभावित है।
- 📌 इंडो-पर्शियन शैली: भारतीय और फ़ारसी चित्रकला का मिश्रित रूप।
- 📌 सफ्राविद शैली: ईरान की एक प्रमुख चित्रकला शैली।
अहमदनगर चित्रकला शैली
व्याख्याअहमदनगर चित्रकला शैली
अहमदनगर चित्रकला शैली दक्कनी चित्रकला की प्रारंभिक और महत्वपूर्ण शाखा है। इसके शुरुआती उदाहरण हुसैन निजामशाह प्रथम (1553–65) के कविता संग्रह में मिलते हैं। इन चित्रों में बारह लघु चित्रकारियाँ हैं, जिनमें अधिकांश युद्ध दृश्यों का चित्रण है, लेकिन कलात्मक विशिष्टता कम है। हालांकि, रानी के विवाह जैसे चित्रों में रंगों की भव्यता और रेखांकन की मधुरता स्पष्ट होती है। युवती का चित्रण उत्तर भारतीय परंपरा से प्रभावित है, जिसमें चोली और लंबी चोटी के साथ दक्षिण भारतीय शैली का दुपट्टा भी शामिल है। रंग योजना मुगल चित्रकला से मेल खाती है, जिसमें तीखे और समृद्ध रंगों का प्रयोग होता है। आकाश का सुनहरा चित्रण और ऊँचा उठाया हुआ वृत्ताकार ध्वितिज फ़ारसी प्रभाव दर्शाता है। दक्कनी रागमाला चित्रकला श्रृंखला में नारी चित्रण की वेशभूषा रोचक है, जहाँ बालों का जूड़ा लिपाक्षी भित्ति चित्रों की तरह गर्दन पर टिका हुआ है। पृष्ठभूमि में रंग विहीन उदासीनता और छोटे पौधों के चित्रण से दक्कनी शैली की पहचान होती है। पुरुषों की वेशभूषा में लंबी नुकीली चाक वाला जामा और छोटी पगड़ी प्रारंभिक अकबरी लघु चित्रकारी के प्रभाव को दर्शाती है। इस शैली में फ़ारसी और उत्तर भारतीय चित्रकला के तत्वों का संयोजन है। युसुफ नामक चित्रकार द्वारा 1569 में इब्राहिम आदिलशाह को समर्पित पांडुलिपि में बुखारा की शैली के सात लघु चित्रकारी भी अहमदनगर शैली के विकास को दर्शाती हैं। इस प्रकार अहमदनगर चित्रकला शैली दक्कनी चित्रकला की जड़ और विकास का महत्वपूर्ण आधार है।
- अहमदनगर शैली के शुरुआती उदाहरण हुसैन निजामशाह प्रथम के कविता संग्रह में।
- युद्ध दृश्यों में कम कलात्मकता, पर विवाह चित्रों में रंगों की भव्यता।
- युवती का चित्रण उत्तर भारतीय परंपरा से प्रभावित।
- फ़ारसी प्रभाव आकाश और ध्वितिज के चित्रण में स्पष्ट।
- नारी और पुरुषों की वेशभूषा में उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय तत्व।
- युसुफ नामक चित्रकार की पांडुलिपि अहमदनगर शैली को दर्शाती है।
- 📌 अहमदनगर चित्रकला: दक्कनी चित्रकला की प्रारंभिक शैली, जिसमें फ़ारसी और उत्तर भारतीय प्रभाव हैं।
- 📌 ध्वितिज: चित्रकला में आकाश के पीछे गोलाकार या वृत्ताकार आकृति।
- 📌 रागमाला चित्रकला: भारतीय संगीत रागों के चित्रात्मक प्रतिनिधित्व।
बीजापुर चित्रकला शैली
व्याख्याबीजापुर चित्रकला शैली
बीजापुर चित्रकला शैली सोलहवीं शताब्दी में विकसित हुई और इसका महत्वपूर्ण उदाहरण 1570 ई. का चित्रित विश्वकोश 'नुजूम-अल-उलूम' है, जिसमें 876 लघु चित्रकारियाँ हैं। इन चित्रों में पात्र, अस्त्र-शस्त्र, नक्षत्र और नारियों का चित्रण होता है। नारियों का चित्
अभ्यास प्रश्न — Chapter 4
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. दक्कनी शैली के योगिनी चित्रकला की क्या विशेषताएँ हैं? क्या आप वर्तमान में इस शैली जैसा काम करने वाले चित्रकार को ढूँढ़ सकते हैं?
उत्तर:
दक्कनी शैली की योगिनी चित्रकला की विशेषताएँ इस प्रकार हैं: - यह शैली धार्मिक और रहस्यमय विषयों को चित्रित करती है, विशेषकर योगिनी देवीयों के रूप में। - चित्रों में आकृतियाँ सरल, लेकिन भावपूर्ण होती हैं, जो आध्यात्मिकता और शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। - रंगों का प्रयोग सीमित और प्रभावशाली होता है, जो चित्रों को गूढ़ता प्रदान करता है। - इस शैली में चित्रों की रेखाएँ स्पष्ट और सटीक होती हैं, जो आकृतियों को जीवंत बनाती हैं। - वर्तमान में इस शैली जैसा काम करने वाले चित्रकार दुर्लभ हैं, लेकिन कुछ कलाकार पारंपरिक कला को पुनर्जीवित करने के प्रयास कर रहे हैं।
व्याख्या:
दक्कनी योगिनी चित्रकला की विशेषताएँ उसके धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों में निहित हैं। चित्रों में योगिनी देवीयों के रूप में शक्ति और रहस्य का चित्रण होता है। रंग और रेखा का संयोजन इसे विशिष्ट बनाता है। वर्तमान में पारंपरिक कलाकार इस शैली को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।
Q2.2. दक्कनी चित्रकला शैली की लोकप्रिय विषयवस्तु क्या है?
उत्तर:
दक्कनी चित्रकला शैली की लोकप्रिय विषयवस्तु में मुख्यतः धार्मिक और शाही जीवन के दृश्य शामिल हैं। इसमें योगिनी देवी, सूफी संत, शाही दरबार, संगीत और नृत्य के दृश्य, शिकार और खेल जैसे पोलो आदि विषय प्रमुख हैं। इसके अलावा प्राकृतिक दृश्यों, पशु-पक्षियों और पौराणिक कथाओं का चित्रण भी इस शैली में देखा जाता है।
व्याख्या:
दक्कनी चित्रकला में धार्मिक, सांस्कृतिक और शाही जीवन के विविध पहलुओं को चित्रित किया गया है। यह विषयवस्तु उस समय के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश को दर्शाती है।
Q3.3. दक्कनी शैली की अपनी पसंद की किन्हीं दो चित्रकलाओं पर लगभग 100 शब्दों में लिखिए।
उत्तर:
दक्कनी शैली की पसंदीदा दो चित्रकलाएँ निम्नलिखित हैं: (1) संयोजित घोड़ा: यह सत्रहवीं शताब्दी की चित्रकला है जिसमें मानव और पशु-पक्षी की आकृतियों का रोचक मिश्रण है। इसमें उड़ते हुए पक्षी, सिंह, चीनी बादल, पौधे और विशाल वृक्षों का संयोजन है। चित्र में गति और कल्पनाशीलता का समावेश है, जो इसे विशिष्ट बनाता है। (2) राग हिंडोल की रागिनी पथमासिका: यह चित्रकला भारतीय संगीत रागमाला परिवार का हिस्सा है। इसमें वीणा बजाती महिला और दो अन्य महिलाएँ लयबद्ध मुद्रा में हैं। फ़ारसी और देशी प्रभावों का संयोजन इस चित्रकला की विशेषता है। लाल और हरे रंग प्रमुख हैं, और आकृतियाँ शैलीबद्ध हैं।
व्याख्या:
प्रत्येक चित्रकला की विशेषताओं, विषयवस्तु और शैलीगत तत्वों का वर्णन करते हुए लगभग 100 शब्दों में लिखा गया है। यह उत्तर दक्कनी चित्रकला की विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि को दर्शाता है।
Q4.4. दक्कनी चित्रकला शैली मुगल चित्रकला शैली से किस प्रकार भिन्न है? बताइए।
उत्तर:
दक्कनी चित्रकला शैली और मुगल चित्रकला शैली में निम्नलिखित भिन्नताएँ हैं: - दक्कनी शैली में फ़ारसी और देशी प्रभावों का मिश्रण होता है, जबकि मुगल चित्रकला में फ़ारसी प्रभाव अधिक प्रबल होता है। - दक्कनी चित्रकला में रंगों का प्रयोग सीमित और संयमित होता है, जबकि मुगल चित्रकला में रंगों की विविधता और चमक अधिक होती है। - दक्कनी शैली में विषयवस्तु में शाही जीवन के साथ-साथ धार्मिक और लोक जीवन के दृश्य भी होते हैं, जबकि मुगल चित्रकला मुख्यतः शाही जीवन और ऐतिहासिक घटनाओं पर केंद्रित होती है। - दक्कनी चित्रकला में आकृतियाँ अधिक सरल और शैलीबद्ध होती हैं, जबकि मुगल चित्रकला में यथार्थवादी चित्रण होता है।
व्याख्या:
दोनों शैलियों के कलात्मक तत्वों, रंग प्रयोग, विषयवस्तु और शैलीगत भेदों का तुलनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है।
Q5.5. दरबारी दक्कनी चित्रकला का शाही प्रतीक क्या है?
उत्तर:
दरबारी दक्कनी चित्रकला का शाही प्रतीक घोड़ा है। यह प्रतीक शक्ति, गति और शाही वैभव का प्रतिनिधित्व करता है। चित्रों में दौड़ते हुए घोड़े का चित्रण शाही जीवन की ऊर्जा और गतिशीलता को दर्शाता है। इसके अलावा, शासकों के वस्त्र, सिंहासन, और तलवारें भी शाही प्रतीकों के रूप में चित्रित होती हैं।
व्याख्या:
घोड़ा और अन्य शाही प्रतीक दक्कनी चित्रकला में शासकों की शक्ति और वैभव को दर्शाने के लिए प्रयुक्त होते हैं।
Q6.6. दक्कनी चित्रकला शैली के केंद्रों के बारे में बताइए और उन्हें मानचित्र पर दर्शाइए।
उत्तर:
दक्कनी चित्रकला शैली के प्रमुख केंद्र बीजापुर, गोलकुंडा, और अहमदनगर थे। ये केंद्र दक्कन के प्रमुख मुस्लिम शासकों के दरबार थे जहाँ कला और संस्कृति का विकास हुआ। बीजापुर विशेष रूप से अपनी समृद्ध चित्रकला के लिए प्रसिद्ध था। गोलकुंडा और अहमदनगर में भी चित्रकला की विशिष्ट शैलियाँ विकसित हुईं। मानचित्र पर ये केंद्र दक्कन क्षेत्र में स्थित हैं, जो वर्तमान में महाराष्ट्र, कर्नाटक और तेलंगाना राज्यों के अंतर्गत आते हैं।
व्याख्या:
दक्कनी चित्रकला के ऐतिहासिक और भौगोलिक केंद्रों का विवरण और उनका मानचित्र पर स्थान बताना आवश्यक है।
Q7.दक्कनी चित्रकला शैली का इतिहास किस काल से किस काल तक फैला हुआ है और इस शैली के उद्गम का आधार कौन-कौन सी चित्रकला शैलियाँ मानी जाती हैं?
उत्तर:
दक्कनी चित्रकला शैली का इतिहास सोलहवीं शताब्दी के अंत से सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक फैला हुआ है। इस शैली के उद्गम का आधार मध्य पूर्वी सफ्राविद, फ़ारसी, तुर्की चित्रकला शैली और मुगल चित्रकला शैली को माना जाता है।
व्याख्या:
दक्कनी चित्रकला शैली का विकास सोलहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के दौरान हुआ, जब मुगलों ने दक्कन पर आधिपत्य स्थापित किया। इसका मूल मध्य पूर्वी सफ्राविद, फ़ारसी, तुर्की और मुगल चित्रकलाओं का मिश्रण है, जो इसे एक विशिष्ट शैली बनाता है।
Q8.दक्कनी चित्रकला शैली को स्वतंत्र शैली क्यों नहीं माना गया, जबकि इसे दक्कन के शासकों द्वारा संरक्षण प्राप्त था?
उत्तर:
कला इतिहासकारों ने दक्कनी चित्रकला को एक विशिष्ट शैली माना, लेकिन स्वतंत्र शैली के रूप में स्वीकार नहीं किया क्योंकि यह मध्य पूर्वी सफ्राविद, फ़ारसी, तुर्की और मुगल चित्रकला का मिश्रण थी। इसके बावजूद दक्कन के शासकों ने इसे संरक्षण दिया और अपनी आवश्यकताओं के अनुसार विकसित किया।
व्याख्या:
दक्कनी चित्रकला शैली में कई अन्य शैलियों के प्रभाव स्पष्ट थे, इसलिए इसे स्वतंत्र शैली नहीं माना गया। परन्तु दक्कन के शासकों ने इसे संरक्षण देकर इसकी संवेदनशीलता और विकास को बढ़ावा दिया।
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