Chapter 16
Chapter 16 — अध्ययन नोट्स
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परिचय
व्याख्यापरिचय
इस खंड में डी. पी. मुखर्जी के जीवन, उनके सामाजिक दृष्टिकोण और कला-साहित्य के विकास पर उनके विचारों का परिचय दिया गया है। डी. पी. मुखर्जी (1894-1961) भारतीय समाजशास्त्र के प्रमुख विचारकों में से एक थे। उन्होंने भारतीय समाज के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक पहलुओं का गहन अध्ययन किया। मुखर्जी ने भारतीय कला और साहित्य के विकास को समाज के परिवर्तनशील ढांचे से जोड़कर देखा। उनके अनुसार, भारतीय कला और साहित्य का विकास केवल पश्चिमी प्रभाव या औपनिवेशिक आधुनिकता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न हुआ है। वे मानते थे कि भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता के बीच निरंतर संवाद चलता रहता है, और इसी संवाद से कला तथा साहित्य का विकास होता है। मुखर्जी ने भारतीय समाज के विश्लेषण में 'परंपरा' (Tradition) और 'परिवर्तन' (Change) के द्वंद्व को केंद्रीय स्थान दिया। वे मानते थे कि भारतीय समाज में परंपराएं स्थिर नहीं रहतीं, बल्कि समय के साथ उनमें बदलाव आते रहते हैं। इसी प्रक्रिया में कला और साहित्य का विकास होता है। इस खंड में यह भी बताया गया है कि डी. पी. मुखर्जी ने भारतीय समाजशास्त्र को पश्चिमी समाजशास्त्र से अलग पहचान दिलाने का प्रयास किया। उन्होंने भारतीय संदर्भों में समाजशास्त्रीय अवधारणाओं को विकसित किया।
- डी. पी. मुखर्जी भारतीय समाजशास्त्र के प्रमुख विचारक थे।
- उन्होंने भारतीय कला और साहित्य के विकास को समाज के ढांचे से जोड़ा।
- परंपरा और परिवर्तन के द्वंद्व को उन्होंने केंद्रीय स्थान दिया।
- भारतीय समाज में निरंतर संवाद से कला-साहित्य का विकास होता है।
- मुखर्जी ने भारतीय समाजशास्त्र को स्वदेशी दृष्टिकोण से देखा।
- 📌 परंपरा: समाज में चली आ रही सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक मान्यताएँ।
- 📌 परिवर्तन: समय के साथ समाज में आने वाले बदलाव।
डी. पी. मुखर्जी का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण
अवधारणाडी. पी. मुखर्जी का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण
इस खंड में डी. पी. मुखर्जी के समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की विस्तार से चर्चा की गई है। मुखर्जी ने भारतीय समाज के अध्ययन के लिए पश्चिमी समाजशास्त्रीय मॉडल की सीमाओं को रेखांकित किया और भारतीय संदर्भ में नए दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। उनके अनुसार, भारतीय समाज बहुस्तरीय और बहुआयामी है, जिसमें विभिन्न परंपराएँ, जातियाँ, भाषाएँ और सांस्कृतिक समूह सह-अस्तित्व में रहते हैं। मुखर्जी ने 'समाज' की परिभाषा को केवल आर्थिक या राजनीतिक संरचना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसमें सांस्कृतिक और ऐतिहासिक तत्वों को भी जोड़ा। वे मानते थे कि भारतीय समाज में परंपरा और आधुनिकता के बीच निरंतर संवाद चलता रहता है, जिससे समाज में गतिशीलता बनी रहती है। उन्होंने 'संवाद' (Dialogue) की अवधारणा को महत्वपूर्ण माना, जिसमें विभिन्न सांस्कृतिक तत्व एक-दूसरे से प्रभावित होते हैं और नया निर्माण करते हैं। मुखर्जी के अनुसार, भारतीय समाज में परिवर्तन धीरे-धीरे और सतत् प्रक्रिया के रूप में होता है, न कि अचानक या क्रांतिकारी तरीके से। मुखर्जी ने भारतीय समाज में 'सामूहिकता' (Collectivity) और 'समूह चेतना' (Group Consciousness) को भी महत्वपूर्ण माना। उनके अनुसार, भारतीय समाज में व्यक्ति की पहचान उसके समूह, जाति, धर्म और परंपरा से जुड़ी होती है।
- मुखर्जी ने भारतीय समाज के अध्ययन के लिए स्वदेशी दृष्टिकोण अपनाया।
- भारतीय समाज बहुस्तरीय और बहुआयामी है।
- परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद को उन्होंने महत्वपूर्ण माना।
- परिवर्तन सतत् और क्रमिक प्रक्रिया है।
- समूह चेतना भारतीय समाज की विशेषता है।
- 📌 संवाद: विभिन्न सांस्कृतिक तत्वों के बीच आपसी प्रभाव की प्रक्रिया।
- 📌 समूह चेतना: किसी समूह के सदस्यों में साझा पहचान और एकता की भावना।
भारतीय कला का सामाजिक संदर्भ
व्याख्याभारतीय कला का सामाजिक संदर्भ
इस खंड में डी. पी. मुखर्जी द्वारा भारतीय कला के सामाजिक संदर्भ की व्याख्या की गई है। उनके अनुसार, भारतीय कला का विकास केवल सौंदर्यबोध या व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक चेतना, परंपरा और सामाजिक संरचना से गहराई से जुड़
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Social Thinkers · Vardhman Mahaveer Open University
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