Chapter 7
Chapter 7 — अध्ययन नोट्स
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परिचय
व्याख्यापरिचय
इस अनुभाग में इमाइल दुर्कीम के जीवन, उनके समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण और धर्म के अध्ययन में उनके योगदान का परिचय दिया गया है। दुर्कीम का जन्म 1858 में फ्रांस में हुआ था और वे आधुनिक समाजशास्त्र के संस्थापकों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने धर्म को सामाजिक तथ्य के रूप में देखा और यह समझाया कि धर्म केवल व्यक्तिगत आस्था का विषय नहीं है, बल्कि यह समाज में एक सामूहिक चेतना का निर्माण करता है। दुर्कीम ने धर्म के सामाजिक कार्यों और उसके समाज में एकजुटता लाने वाले तत्वों पर विशेष बल दिया। उनका मानना था कि धर्म समाज के नैतिक ढांचे को बनाए रखने में सहायक होता है। इस अध्याय में, दुर्कीम के 'धर्म विभाजन' संबंधी विचारों को विस्तार से समझाया गया है।
- इमाइल दुर्कीम का जन्म 1858 में फ्रांस में हुआ।
- दुर्कीम ने धर्म को एक सामाजिक तथ्य के रूप में परिभाषित किया।
- धर्म समाज में एकजुटता और नैतिकता को बनाए रखने में सहायक है।
- दुर्कीम के विचारों ने आधुनिक समाजशास्त्र को दिशा दी।
- धर्म के सामाजिक कार्यों पर दुर्कीम ने विशेष बल दिया।
- 📌 सामाजिक तथ्य: समाज में विद्यमान वे तत्व जो व्यक्ति के बाहर होते हैं और उस पर प्रभाव डालते हैं।
- 📌 सामूहिक चेतना: समाज के सदस्यों द्वारा साझा की गई मान्यताओं और मूल्यों का समूह।
दुर्कीम की धर्म की परिभाषा
परिभाषादुर्कीम की धर्म की परिभाषा
इस अनुभाग में इमाइल दुर्कीम द्वारा दी गई धर्म की परिभाषा का विस्तार से वर्णन किया गया है। दुर्कीम के अनुसार, 'धर्म एक एकीकृत प्रणाली है, जिसमें विश्वास और प्रथाएँ शामिल हैं, जो पवित्र वस्तुओं से संबंधित होती हैं।' इन विश्वासों और प्रथाओं के माध्यम से एक नैतिक समुदाय, अर्थात् 'मण्डली' या 'समाज', बनता है। दुर्कीम ने धर्म के दो मुख्य तत्व बताए: पवित्र (Sacred) और अपवित्र (Profane)। पवित्र वे वस्तुएँ हैं जिन्हें समाज विशेष महत्व देता है, जबकि अपवित्र वे हैं जो सामान्य जीवन से जुड़ी होती हैं। दुर्कीम ने यह भी बताया कि धर्म का मुख्य कार्य सामाजिक एकता और अनुशासन बनाए रखना है।
- धर्म एक एकीकृत प्रणाली है जिसमें विश्वास और प्रथाएँ शामिल हैं।
- पवित्र और अपवित्र का विभाजन धर्म का मूल तत्व है।
- धर्म समाज में नैतिक समुदाय का निर्माण करता है।
- धर्म सामाजिक एकता और अनुशासन बनाए रखने में सहायक है।
- 📌 पवित्र: वे वस्तुएँ या विचार जिन्हें समाज विशेष महत्व देता है।
- 📌 अपवित्र: सामान्य, रोजमर्रा की वस्तुएँ या कार्य।
धर्म का सामाजिक कार्य
अवधारणाधर्म का सामाजिक कार्य
इस अनुभाग में दुर्कीम ने धर्म के सामाजिक कार्यों का विश्लेषण किया है। उनका मानना था कि धर्म केवल आध्यात्मिक या व्यक्तिगत आस्था नहीं है, बल्कि यह समाज में एकजुटता और अनुशासन बनाए रखने का साधन है। धर्म सामाजिक नियमों और मूल्यों की स्थापना करता है, जिसस
SLM - Social Thinkers (Hindi) के सभी 18 अध्याय
Social Thinkers · Vardhman Mahaveer Open University
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