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Chapter 6

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - Social Thinkers (Hindi)📖 10 नोट्स⏱️ ~15 मिनट
Chapter 5अध्याय 7 / 18Chapter 7

Chapter 6अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

परिचय

व्याख्या

परिचय

इस अनुभाग में इमाइल दुर्कीम के जीवन, उनके समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण और सामाजिक तथ्य की अवधारणा की पृष्ठभूमि का परिचय दिया गया है। इमाइल दुर्कीम (1858-1917) फ्रांस के प्रमुख समाजशास्त्री थे, जिन्हें समाजशास्त्र को एक वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में स्थापित करने का श्रेय दिया जाता है। दुर्कीम ने समाज को एक वास्तविकता के रूप में देखा, जो व्यक्तियों से अलग और स्वतंत्र होती है। उन्होंने समाजशास्त्र के अध्ययन के लिए 'सामाजिक तथ्य' (Social Facts) की अवधारणा प्रस्तुत की, जो उनके विचारों की आधारशिला है। सामाजिक तथ्य वे तरीके, नियम, मूल्य और विश्वास हैं, जो समाज में व्याप्त होते हैं और व्यक्ति पर बाहरी दबाव डालते हैं। दुर्कीम का मानना था कि समाजशास्त्र को उन्हीं तथ्यों का अध्ययन करना चाहिए, जिन्हें वस्तुनिष्ठ रूप से देखा और मापा जा सके। उन्होंने आत्महत्या, धर्म, शिक्षा आदि विषयों पर अपने सिद्धांतों को लागू किया। इस परिचयात्मक भाग में दुर्कीम के योगदान, उनके समय की सामाजिक परिस्थितियों और उनके समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता को स्पष्ट किया गया है।

  • इमाइल दुर्कीम का जन्म 1858 में फ्रांस में हुआ था।
  • दुर्कीम ने समाजशास्त्र को एक स्वतंत्र और वैज्ञानिक अनुशासन के रूप में स्थापित किया।
  • सामाजिक तथ्य की अवधारणा दुर्कीम के विचारों का केंद्र बिंदु है।
  • दुर्कीम ने समाज को व्यक्तियों से अलग और स्वतंत्र वास्तविकता माना।
  • उनका मानना था कि समाजशास्त्र को वस्तुनिष्ठ तथ्यों का अध्ययन करना चाहिए।
  • दुर्कीम के विचार आज भी समाजशास्त्र में महत्वपूर्ण हैं।
  • 📌 सामाजिक तथ्य: वे तरीके, नियम, मूल्य, विश्वास आदि जो समाज में व्याप्त होते हैं और व्यक्ति पर बाहरी दबाव डालते हैं।
  • 📌 वस्तुनिष्ठता: किसी तथ्य या घटना का निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित अध्ययन।

सामाजिक तथ्य की अवधारणा

अवधारणा

सामाजिक तथ्य की अवधारणा

इस अनुभाग में इमाइल दुर्कीम द्वारा प्रतिपादित 'सामाजिक तथ्य' की अवधारणा का विस्तार से वर्णन किया गया है। दुर्कीम के अनुसार, सामाजिक तथ्य वे हैं जो समाज में व्यापक रूप से प्रचलित होते हैं और व्यक्ति पर बाहरी दबाव डालते हैं। ये तथ्य व्यक्ति की इच्छा या पसंद से स्वतंत्र होते हैं, जैसे भाषा, धर्म, कानून, नैतिकता, रीति-रिवाज आदि। दुर्कीम ने सामाजिक तथ्य को 'बाह्य' (external) और 'बाध्यकारी' (coercive) बताया है। उनका मानना था कि समाजशास्त्र को उन्हीं तथ्यों का अध्ययन करना चाहिए, जिन्हें वस्तुनिष्ठ रूप से देखा और मापा जा सके। सामाजिक तथ्य का अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति से करना चाहिए, जैसे भौतिक विज्ञान में वस्तुओं का अध्ययन किया जाता है। दुर्कीम ने सामाजिक तथ्य को दो भागों में बाँटा: भौतिक (material) और अमूर्त (non-material)। भौतिक तथ्य में कानून, संस्थाएँ, जनसंख्या आदि आते हैं, जबकि अमूर्त तथ्य में नैतिकता, विश्वास, परंपराएँ आदि शामिल हैं।

  • सामाजिक तथ्य समाज में व्यापक रूप से प्रचलित होते हैं।
  • ये व्यक्ति पर बाहरी दबाव डालते हैं और बाध्यकारी होते हैं।
  • सामाजिक तथ्य व्यक्ति की इच्छा से स्वतंत्र होते हैं।
  • दुर्कीम ने सामाजिक तथ्य को भौतिक और अमूर्त दो भागों में बाँटा।
  • सामाजिक तथ्य का अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति से किया जाना चाहिए।
  • सामाजिक तथ्य समाजशास्त्र का मुख्य अध्ययन क्षेत्र है।
  • 📌 भौतिक सामाजिक तथ्य: वे तथ्य जो भौतिक रूप में होते हैं, जैसे कानून, संस्थाएँ।
  • 📌 अमूर्त सामाजिक तथ्य: वे तथ्य जो विचारों, विश्वासों या मूल्यों के रूप में होते हैं।

सामाजिक तथ्य की विशेषताएँ

व्याख्या

सामाजिक तथ्य की विशेषताएँ

इस अनुभाग में सामाजिक तथ्य की मुख्य विशेषताओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। दुर्कीम के अनुसार, सामाजिक तथ्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं: (1) बाह्यत्व (Externality): सामाजिक तथ्य व्यक्ति के बाहर होते हैं, वे समाज में पहले से विद्यमान रहते हैं। (2) बाध्