Chapter 17
Chapter 17 — अध्ययन नोट्स
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परिचय
व्याख्यापरिचय
इस अनुभाग में जी. एस. घुरे के जाति और वर्ग व्यवस्था पर किए गए समाजशास्त्रीय अध्ययन का परिचय दिया गया है। घुरे भारतीय समाज के प्रमुख समाजशास्त्री माने जाते हैं, जिन्होंने जाति व्यवस्था को ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समझने का प्रयास किया। उन्होंने जाति व्यवस्था के उद्भव, विकास और उसके समाज पर प्रभाव का गहन विश्लेषण किया। घुरे ने जाति को एक सामाजिक संस्था के रूप में देखा जो भारतीय समाज की संरचना में गहराई से जुड़ी हुई है। उन्होंने जाति और वर्ग व्यवस्था के बीच के अंतर को स्पष्ट किया और बताया कि किस प्रकार ये दोनों व्यवस्थाएँ समाज में सामाजिक स्तरीकरण का आधार बनती हैं। इस अध्याय में घुरे के जाति और वर्ग व्यवस्था पर विचार, उनके द्वारा प्रस्तुत परिभाषाएँ, सिद्धांत, तथा इन व्यवस्थाओं के समाज पर प्रभाव का विस्तार से अध्ययन किया गया है।
- जी. एस. घुरे भारतीय समाजशास्त्र के प्रमुख विद्वान थे।
- उन्होंने जाति व्यवस्था का ऐतिहासिक और सामाजिक विश्लेषण किया।
- जाति और वर्ग व्यवस्था के बीच के अंतर को समझाया।
- जाति को सामाजिक स्तरीकरण का आधार माना।
- घुरे के विचार भारतीय समाज की समझ के लिए महत्वपूर्ण हैं।
- 📌 जाति: जन्म आधारित सामाजिक समूह
- 📌 वर्ग: आर्थिक, सामाजिक या पेशे के आधार पर बना समूह
- 📌 सामाजिक स्तरीकरण: समाज में व्यक्तियों या समूहों का श्रेणीकरण
जाति व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
व्याख्याजाति व्यवस्था की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस अनुभाग में जाति व्यवस्था के उद्भव और विकास की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का वर्णन किया गया है। घुरे के अनुसार, जाति व्यवस्था का प्रारंभ वैदिक काल में वर्ण व्यवस्था के रूप में हुआ था। प्रारंभ में वर्ण व्यवस्था कर्म पर आधारित थी, लेकिन समय के साथ यह जन्म आधारित जाति व्यवस्था में परिवर्तित हो गई। मध्यकाल में जातियों की संख्या में वृद्धि हुई और वे अधिक कठोर हो गईं। ब्रिटिश शासन के दौरान जाति व्यवस्था को औपचारिक रूप से जनगणना और प्रशासनिक कार्यों में शामिल किया गया, जिससे इसकी जड़ें और गहरी हो गईं। घुरे ने जाति व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास को समझने के लिए धार्मिक ग्रंथों, इतिहास और समाज की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि जाति व्यवस्था ने भारतीय समाज में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक असमानता को जन्म दिया।
- जाति व्यवस्था का प्रारंभ वैदिक काल की वर्ण व्यवस्था से हुआ।
- वर्ण व्यवस्था कर्म आधारित थी, जाति व्यवस्था जन्म आधारित हो गई।
- मध्यकाल में जाति व्यवस्था कठोर और जटिल हुई।
- ब्रिटिश शासन में जाति व्यवस्था को औपचारिक मान्यता मिली।
- जाति व्यवस्था ने समाज में असमानता को बढ़ाया।
- 📌 वर्ण: समाज के चार प्रमुख वर्ग (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र)
- 📌 जाति: जन्म आधारित उपविभाजन
- 📌 जनगणना: जनसंख्या का आधिकारिक सर्वेक्षण
जाति व्यवस्था की विशेषताएँ
अवधारणाजाति व्यवस्था की विशेषताएँ
इस अनुभाग में जाति व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। घुरे के अनुसार, जाति व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ हैं: (1) जन्म आधारित सदस्यता, (2) विवाह की बंदिशें (अंतर्जातीय विवाह निषिद्ध), (3) पेशागत विभाजन, (4) सामाजिक श्रेणीक्रम
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Social Thinkers · Vardhman Mahaveer Open University
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