Chapter 7
Chapter 7 — अध्ययन नोट्स
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भारतीय कला में आधुनिकता का परिचय
व्याख्याभारतीय कला में आधुनिकता का परिचय
अंग्रेजों के आगमन के बाद भारतीय ललित कला को यूरोपीय दृष्टिकोण से देखा गया। उन्होंने महसूस किया कि भारतीयों में ललित कला के सृजन और आस्वादन के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और संवेदना की कमी है। 19वीं शताब्दी के मध्य और उत्तरार्ध में भारत के प्रमुख शहरों जैसे लाहौर, कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास में अनेक कला विद्यालयों की स्थापना हुई। इन विद्यालयों में अकादमिक और प्रकृतिवादी कला को बढ़ावा दिया गया, जो विक्टोरियन प्रवृत्ति को प्रतिबिंबित करती थी। भारतीय शिल्प को जो भी समर्थन मिला, वह यूरोपीय अभिरुचि और बाजार की माँगों पर आधारित था। इस दौर में राष्ट्रवादी कला का उदय हुआ, जो औपनिवेशिक पक्षपात के विपरीत था। बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट का विकास अवनीन्द्रनाथ टैगोर और ई.बी. हैवेल ने किया। 1919 में शांतिनिकेतन में विश्वभारती विश्वविद्यालय के अंतर्गत कला भवन की स्थापना हुई, जिसकी परिकल्पना रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी। इसने बंगाल शैली की उन्नत दृष्टि को बनाए रखा और भारतीय समाज में कला को सार्थक बनाने के लिए स्वदेशी पंथ का अनुसरण किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान और बाद में यूरोपीय आधुनिक कला के प्रभाव से भारतीय कलाकार प्रभावित हुए। गगनेंद्रनाथ टैगोर ने घनवादी तत्वों को समाहित कर अपनी विशिष्ट शैली विकसित की, जो पाब्लो पिकासो के घनवाद से भिन्न थी। रवींद्रनाथ टैगोर ने अकादमिक यथार्थवाद का त्याग कर अमूर्त कला के प्रयोग किए और कला को अपनी स्वयं की दुनिया का सृजन मानते थे। उन्होंने डूडल शैली विकसित की, जिसमें मानव चेहरे और भू-दृश्य उनकी कविताओं के साथ मनोरम रूप में दिखते थे। उनका रंगपेट काला, पीला, गेरू, लाल और भूरे रंगों तक सीमित था। नंदलाल बोस, बिनोद बिहारी मुखर्जी और रामकिंकर बैज जैसे कलाकारों ने शांतिनिकेतन में भारतीय समाज और ग्रामीण जीवन के चित्रण को प्राथमिकता दी। उन्होंने न केवल वनस्पति और जीव-जंतुओं का चित्रण किया, बल्कि संथाल जनजातियों के जीवन को भी कला में प्रस्तुत किया। बिनोद बिहारी मुखर्जी ने मध्यकालीन संतों के जीवन को भित्ति चित्र के रूप में चित्रित किया, जिसमें तुलसीदास, कबीर आदि की मानवीय शिक्षाओं को दर्शाया गया। रामकिंकर बैज की मूर्तिकला और चित्रकला में प्रकृति और दैनिक जीवन के अनुभव स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। जैमिनी रॉय ने बंगाल की ग्रामीण लोक कला से प्रेरणा लेकर सरल और शुद्ध रंगों का प्रयोग किया और अपनी विशिष्ट शैली विकसित की।
- अंग्रेजों ने भारतीय कला को यूरोपीय दृष्टिकोण से देखा और प्रशिक्षण की कमी महसूस की।
- 19वीं शताब्दी में प्रमुख शहरों में कला विद्यालय स्थापित हुए।
- बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट और शांतिनिकेतन के कला भवन ने राष्ट्रवादी कला को बढ़ावा दिया।
- गगनेंद्रनाथ टैगोर ने घनवादी शैली विकसित की, जो पिकासो से भिन्न थी।
- रवींद्रनाथ टैगोर ने अमूर्त कला के प्रयोग किए और डूडल शैली विकसित की।
- नंदलाल बोस, बिनोद बिहारी मुखर्जी और रामकिंकर बैज ने ग्रामीण जीवन और जनजातियों का चित्रण किया।
- 📌 अकादमिक कला: पारंपरिक यथार्थवादी कला शैली जो यूरोपीय कला विद्यालयों में सिखाई जाती थी।
- 📌 घनवाद (Cubism): एक आधुनिक कला शैली जिसमें ज्यामितीय आकृतियों का प्रयोग होता है।
- 📌 अमूर्त कला (Abstract Art): ऐसी कला जिसमें वास्तविक वस्तुओं का सटीक चित्रण न होकर रंग, रूप और रेखाओं के माध्यम से भाव व्यक्त किए जाते हैं।
आधुनिक भारतीय कला
व्याख्याआधुनिक भारतीय कला
आधुनिक भारतीय कला का विकास औपनिवेशिक और राष्ट्रवादी प्रवृत्तियों के बीच हुआ। शांतिनिकेतन में कला भवन की स्थापना के बाद नंदलाल बोस, बिनोद बिहारी मुखर्जी और रामकिंकर बैज जैसे कलाकारों ने भारतीय समाज, ग्रामीण जीवन और जनजातीय समुदायों के चित्रण को प्राथमिकता दी। नंदलाल बोस ने अवनीन्द्रनाथ टैगोर के प्रशिक्षण से राष्ट्रीयता की भावना प्राप्त की, परन्तु वे नए कलात्मक प्रयोगों को प्रोत्साहित करते रहे। बिनोद बिहारी मुखर्जी ने मध्यकालीन संतों के जीवन को भित्ति चित्र के रूप में प्रस्तुत किया, जिसमें तुलसीदास, कबीर आदि की मानवीय शिक्षाओं को चित्रित किया गया। रामकिंकर बैज की मूर्तिकला में प्रकृति और दैनिक जीवन के अनुभव स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं। उनकी मूर्ति ‘संथाल परिवार’ में एक संथाल परिवार की पलायन यात्रा को स्मारकीय रूप में प्रस्तुत किया गया है। जैमिनी रॉय ने बंगाल की ग्रामीण लोक कला से प्रेरणा लेकर सरल और शुद्ध रंगों का प्रयोग किया। उन्होंने अपने चित्रों पर हस्ताक्षर किया, जो ग्रामीण कलाकारों की परंपरा से भिन्न था। अमृता शेरगिल, जो अर्द्ध हंगेरियन और अर्द्ध भारतीय थीं, ने पेरिस में प्रशिक्षण प्राप्त किया और प्रभाववाद एवं उत्तर प्रभाववाद को आत्मसात किया। उन्होंने भारतीय विषयों और आकृतियों के साथ अपनी कला को विकसित किया। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी कलाकृतियाँ आधुनिक भारतीय कला में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। प्रोदोष दास गुप्ता के नेतृत्व में 1943 में कलकत्ता समूह का गठन हुआ, जिसने सामाजिक और राजनीतिक विषयों को कला में प्रस्तुत किया। इस समूह ने बंगाल स्कूल की भावुक शैली को त्यागकर सरल और सार्वभौमिक कला की ओर अग्रसर हुआ। दक्षिण भारत के मूर्तिकार पी.वी. जानकीराम ने धातु की चादरों पर रचनात्मक मूर्तिकला की। बॉम्बे में 1946 में प्रोप्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप का गठन हुआ, जिसमें फ्रांसिस न्यूटन सूजा, एम.एफ. हुसैन, के.एच. आरा आदि शामिल थे। सूजा ने कला विद्यालयों की परंपराओं पर प्रश्न उठाए और आधुनिक कला को नई स्वतंत्रता की ओर अग्रसर माना। एम.एफ. हुसैन ने भारतीय पौराणिक कथाओं और लोक कला से प्रेरणा लेकर आधुनिक शैली विकसित की। एस.एच. रजा अमूर्तन की दिशा में अग्रसर हुए, जिन्होंने भू-दृश्य विषयों में रंगों का विविध प्रयोग किया। 1960-70 के दशक में अमूर्तन और आकृतिमूलक कला के बीच संतुलन की खोज हुई। के.सी.एस. पणिकर ने तांत्रिक प्रतीकों का प्रयोग किया और मद्रास के पास कलाकार गाँव चोलमंडलम की स्थापना की। इस समय संकलनवाद (eclecticism) भी प्रमुख हुआ, जिसमें कलाकारों ने विभिन्न स्रोतों से विचार लिए। समूह 1890 जैसे अन्य समूहों ने भी नई कलात्मक भाषाओं का विकास किया।
- शांतिनिकेतन के कलाकारों ने ग्रामीण जीवन और जनजातीय समुदायों का चित्रण किया।
- अमृता शेरगिल ने यूरोपीय आधुनिक कला के प्रभाव को भारतीय विषयों के साथ जोड़ा।
- कलकत्ता समूह ने सामाजिक और राजनीतिक विषयों को कला में प्रस्तुत किया।
- बॉम्बे के प्रोप्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप ने आधुनिक कला में स्वतंत्रता और प्रयोग को बढ़ावा दिया।
- एम.एफ. हुसैन ने भारतीय पौराणिक कथाओं और लोक कला से प्रेरणा ली।
- एस.एच. रजा ने अमूर्तन की दिशा में भू-दृश्य विषयों को चित्रित किया।
- 📌 प्रगतिशील कलाकार समूह (Progressive Artists Group): 1946 में बॉम्बे में स्थापित कलाकारों का समूह जो आधुनिक भारतीय कला को नया रूप देना चाहते थे।
- 📌 अमूर्तन (Abstraction): कला की वह शैली जिसमें वस्तुओं को वास्तविक रूप में न दिखाकर रंग, रेखा और आकृतियों के माध्यम से भाव व्यक्त किए जाते हैं।
- 📌 संकलनवाद (Eclecticism): विभिन्न स्रोतों और शैलियों से विचारों को संग्रहित कर कला में प्रयोग करना।
भारत में आधुनिक विवारधारा और राजनीतिक कला
व्याख्याभारत में आधुनिक विवारधारा और राजनीतिक कला
अमृता शेरगिल की मृत्यु के बाद भी भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था, जिसे द्वितीय विश्व युद्ध और बंगाल अकाल जैसी वैश्विक एवं स्थानीय घटनाओं ने प्रभावित किया। बंगाल अकाल ने ग्रामीणों को शहरों की ओर प्रवास के लिए मजबूर किया, जिससे सामाजिक संकट उत्पन्न हुआ। इ
अभ्यास प्रश्न — Chapter 7
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. पटचित्र ‘ऑडियो-विजुअल’ स्टोरी का एक रूप है, जो भारत के कुछ हिस्सों में अभी भी प्रचलित है। कहानी कहने के इस पारंपरिक रूप की तुलना 1980 के दशक के बाद से कुछ बड़ौदा कलाकारों द्वारा अपनाई गई आधुनिक कथाकारिता से करें।
उत्तर:
पटचित्र एक पारंपरिक ऑडियो-विजुअल स्टोरी टेलिंग का रूप है जिसमें चित्रों के माध्यम से कहानी सुनाई जाती है। यह पारंपरिक रूप स्थानीय संस्कृति, धार्मिक कथाओं और लोककथाओं को दर्शाता है। 1980 के दशक के बाद बड़ौदा के आधुनिक कलाकारों ने इस पारंपरिक कथाकारिता को नए विषयों, तकनीकों और माध्यमों के साथ पुनः प्रस्तुत किया। उन्होंने पारंपरिक चित्रकला के तत्वों को आधुनिक कला के प्रयोगों के साथ जोड़ा, जिससे कथाएं अधिक समकालीन और वैश्विक संदर्भों में प्रस्तुत हुईं। इस तुलना में पारंपरिक पटचित्र अधिक सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्रित होते हैं जबकि आधुनिक कथाकारिता सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत विषयों को भी समेटती है।
व्याख्या:
यह उत्तर पारंपरिक और आधुनिक कथाकारिता के बीच विषय, तकनीक, और प्रस्तुति के अंतर को समझाता है। पारंपरिक पटचित्र में स्थानीय और धार्मिक कथाएं होती हैं, जबकि आधुनिक कथाकारिता में नए विषय और प्रयोग शामिल होते हैं।
Q2.2. वीडियो और डिजिटल मीडिया जैसी नई तकनीक समकालीन कलाकारों को नए विषयों के साथ प्रयोग करने के लिए कैसे प्रोत्साहित करती है? वीडियो कला, संस्थापन कला और डिजिटल कला जैसे विभिन्न कला रूपों पर टिप्पणी करें।
उत्तर:
नई तकनीक जैसे वीडियो और डिजिटल मीडिया ने कलाकारों को पारंपरिक सीमाओं से बाहर जाकर नए विषयों और अभिव्यक्तियों के साथ प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया है। वीडियो कला ने समय और गति के तत्व को कला में शामिल किया, जिससे गतिशील और इंटरैक्टिव प्रस्तुतियां संभव हुईं। संस्थापन कला ने स्थान और पर्यावरण के साथ संवाद स्थापित करते हुए दर्शकों को कला का हिस्सा बनाया। डिजिटल कला ने कंप्यूटर और सॉफ्टवेयर के माध्यम से नए रूप, रंग और टेक्सचर के प्रयोग को आसान बनाया। इन तकनीकों ने कलाकारों को सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत विषयों को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी है।
व्याख्या:
उत्तर में वीडियो, संस्थापन और डिजिटल कला के माध्यम से नई तकनीकों के प्रभाव और कलाकारों को मिले नए अवसरों की व्याख्या की गई है।
Q3.3. आप ‘सार्वजनिक कला’ से क्या समझते हैं? अपने निवास या स्कूल और उनके आसपास रहने वाले विभिन्न समुदायों के बारे में जानकारी प्राप्त करें और उनकी कला की समझ को जानिए। यदि आपको एक सार्वजनिक स्मारक तैयार करनी है, तो आप इसे कैसे डिजाइन करेंगे कि लोग इसके साथ अपनी संबद्धता स्थापित कर सकें?
उत्तर:
सार्वजनिक कला वह कला है जो सार्वजनिक स्थानों में स्थापित की जाती है और समाज के विभिन्न वर्गों के लिए खुली होती है। यह कला समुदाय की संस्कृति, इतिहास और सामाजिक मुद्दों को प्रतिबिंबित करती है। अपने निवास या स्कूल के आसपास के समुदायों की कला समझने के लिए स्थानीय त्योहारों, परंपराओं, लोककथाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों का अध्ययन करना आवश्यक है। यदि मुझे एक सार्वजनिक स्मारक डिजाइन करना हो, तो मैं स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों, सामूहिक स्मृतियों और सामाजिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए ऐसा स्मारक बनाऊंगा जो लोगों की भावनाओं और पहचान से जुड़ सके। डिजाइन में सामुदायिक सहभागिता और संवाद को भी महत्व दूंगा ताकि स्मारक सभी के लिए अर्थपूर्ण हो।
व्याख्या:
उत्तर में सार्वजनिक कला की परिभाषा, स्थानीय समुदाय की कला समझने के तरीके और एक प्रभावी सार्वजनिक स्मारक डिजाइन करने के लिए आवश्यक तत्वों की चर्चा की गई है।
Q4.4. आप कला की दुनिया को कैसे समझते हैं? कला की दुनिया के विभिन्न घटक क्या हैं और ये कला बाजार से किस प्रकार संबंधित हैं?
उत्तर:
कला की दुनिया में कलाकार, कला संस्थान, कला समीक्षक, संग्रहकर्ता, गैलरी, म्यूजियम, कला बाजार और दर्शक शामिल होते हैं। ये घटक मिलकर कला के निर्माण, प्रदर्शन, मूल्यांकन और व्यापार को संचालित करते हैं। कला बाजार वह स्थान है जहाँ कला वस्तुओं का क्रय-विक्रय होता है, जो कलाकारों की आर्थिक स्थिति और कला की लोकप्रियता को प्रभावित करता है। कला की दुनिया में सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारक कला के मूल्य निर्धारण और प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए कला बाजार और कला की दुनिया एक-दूसरे से गहरे जुड़े हुए हैं, जहाँ बाजार कला की आर्थिक वैधता प्रदान करता है और कला की दुनिया सांस्कृतिक और रचनात्मक दिशा निर्धारित करती है।
व्याख्या:
उत्तर में कला की दुनिया के घटकों की पहचान और उनके कला बाजार के साथ संबंध की व्याख्या की गई है।
Q5.अंग्रेजों ने भारतीय ललित कला को किस दृष्टिकोण से देखा और उन्होंने इसमें क्या कमी महसूस की?
उत्तर:
यूरोपीय दृष्टिकोण से, प्रशिक्षण और ऐंड्रिय संवेदना की कमी
व्याख्या:
अंग्रेजों ने भारतीय ललित कला को यूरोपीय रूप में देखा और महसूस किया कि भारतीयों में कला के सृजन और आस्वादन के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और ऐंड्रिय संवेदना की कमी है।
Q6.भारत के किन प्रमुख शहरों में 19वीं शताब्दी के मध्य और उत्तरार्ध में कला विद्यालयों की स्थापना हुई थी?
उत्तर:
लाहौर / कलकत्ता / बॉम्बे / मद्रास
व्याख्या:
19वीं शताब्दी के मध्य और उत्तरार्ध में भारत के प्रमुख शहर लाहौर, कलकत्ता (कोलकाता), बॉम्बे (मुंबई) और मद्रास (चेन्नई) में अनेक कला विद्यालय स्थापित हुए।
Q7.‘बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट’ के विकास में किन कलाकारों का मुख्य योगदान था?
उत्तर:
अवनीन्द्रनाथ टैगोर और ई.बी. हैवेल
व्याख्या:
‘बंगाल स्कूल ऑफ़ आर्ट’ का विकास अवनीन्द्रनाथ टैगोर और ई.बी. हैवेल ने किया, जिन्होंने राष्ट्रवादी कला का मार्ग प्रशस्त किया।
Q8.शांतिनिकेतन में 1919 में स्थापित कला भवन की स्थापना किसने की थी और इसका उद्देश्य क्या था?
उत्तर:
कला भवन की स्थापना रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी। इसका उद्देश्य बंगाल शैली की उन्नत दृष्टि को बनाए रखना और भारतीय समाज में कला को सार्थक बनाना था।
व्याख्या:
कला भवन की स्थापना 1919 में शांतिनिकेतन में विश्वभारती विश्वविद्यालय के अंतर्गत हुई, जिसकी परिकल्पना कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने की थी। यह विद्यालय स्वदेशी पंथ का अनुसरण करते हुए भारतीय कला को नया आयाम देने का कार्य करता था।
Bhartiya Kala ka Itihaas Bhag 2 के सभी 8 अध्याय
Fine Art · Class 12