Chapter 8
Chapter 8 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 16 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
भारतीय कला और स्थापत्य में मौर्योत्तर कालीन प्रवृत्तियाँ
व्याख्याभारतीय कला और स्थापत्य में मौर्योत्तर कालीन प्रवृत्तियाँ
ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के बाद मौर्य साम्राज्य के विघटन के पश्चात भारत में अनेक शासकों ने विभिन्न क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। उत्तर और मध्य भारत में शुंग, कण्व, कुशाण और गुप्त शासकों का प्रभाव रहा, जबकि दक्षिण और पश्चिमी भारत में सातवाहन, इश्वाकु, अभीर और वाकाटक प्रमुख थे। इस काल में वैष्णव और शैव संप्रदायों का उदय भी हुआ। इस अवधि की मूर्तिकला और स्थापत्य कला विभिन्न क्षेत्रों में विकसित हुई, जिनमें भरहुत, बोधगया, मथुरा, साँची, अमरावती, अजंता, एलोरा आदि प्रमुख स्थल हैं। भरहुत में मौर्यकालीन यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाओं की दीर्घाकार मूर्तियाँ पाई जाती हैं, जिनमें रैखिकता और आख्यानात्मक उभार की विशेषता है। मूर्तिकला में पात्रों के हाव-भाव और घटनाओं का चित्रण विस्तार से किया गया है। प्रारंभ में मूर्तिकला में हाथ और पैर शरीर से चिपके हुए दिखाए गए, किंतु बाद में अधिक प्राकृतिक मुद्रा अपनाई गई। भरहुत, बोधगया, साँची स्तूप-2 और जगथ्यपेट की मूर्तियाँ इस शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
- मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद विभिन्न शासकों का उदय हुआ।
- उत्तर भारत में शुंग, कण्व, कुशाण और गुप्त शासकों का प्रभाव।
- दक्षिण और पश्चिमी भारत में सातवाहन, इश्वाकु, अभीर और वाकाटक प्रमुख।
- वैष्णव और शैव संप्रदायों का उदय।
- भरहुत की मूर्तिकला में रैखिकता और आख्यानात्मक उभार।
- मूर्तियों में हाव-भाव और घटनाओं का विस्तार से चित्रण।
- 📌 मौर्योत्तर काल: मौर्य साम्राज्य के बाद का काल।
- 📌 यक्ष-यक्षिणी: प्राचीन भारतीय मूर्तिकला में प्रकृति देवता-देवियाँ।
- 📌 आख्यानात्मक उभार: मूर्तिकला में कथा या घटना का चित्रण।
भरहुत
व्याख्याभरहुत
भरहुत में मौर्योत्तर कालीन मूर्तियाँ दीर्घाकार होती हैं, जिनमें कम उभार होता है और रैखिकता पर विशेष ध्यान दिया गया है। मूर्तियाँ चित्र की सतह से अधिक उभरी नहीं हैं, पर तीन आयामी प्रभाव झुके हुए परिप्रेक्ष्य के माध्यम से दिया गया है। आख्यानात्मक फलक में मुख्य पात्रों के अलावा अन्य पात्र भी चित्रित होते हैं। हाथों को प्रारंभ में छाती से चिपका हुआ और चपटा दिखाया गया, बाद में सहज मुद्रा में प्रस्तुत किया गया। मूर्तिकला की तकनीक में सतह की तैयारी, उत्कीर्णन और आयतन निर्माण की विधि का विकास हुआ। भरहुत की मूर्तियाँ हाथों और पैरों को बाहर निकालने में सीमित थीं, इसलिए हाथ जुड़ा हुआ और पैर बढ़ा हुआ दिखाए गए। भरहुत की मूर्तिकला में आख्यानात्मक फलक पर बुद्ध के जीवन के प्रसंग, जैसे महारानी मायादेवी का स्वप्न और जातक कथाओं के चित्रण मिलते हैं। उदाहरण के लिए, रूरू जातक में हिरन द्वारा आदमी की रक्षा की कथा को चित्रित किया गया है। भरहुत की मूर्तियाँ आज भारतीय संग्रहालय, कोलकाता में सुरक्षित हैं।
- भरहुत की मूर्तियाँ दीर्घाकार और कम उभार वाली।
- आख्यानात्मक फलक में मुख्य और अन्य पात्रों का चित्रण।
- हाथों को प्रारंभ में छाती से चिपका हुआ दिखाया गया।
- महारानी मायादेवी के स्वप्न का मूर्तिकला चित्रण।
- जातक कथाओं का सरल और प्रभावशाली चित्रण।
- भरहुत की मूर्तियाँ कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में सुरक्षित।
- 📌 आख्यानात्मक फलक: कथा या घटना को मूर्तिकला में दर्शाने वाला भाग।
- 📌 यक्षिणी: प्रकृति की देवी, मूर्तिकला में प्रमुख पात्र।
साँची का स्तूप
व्याख्यासाँची का स्तूप
साँची का स्तूप-1 मौर्योत्तर काल की मूर्तिकला विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। इसमें दो प्रदक्षिणा पथ और चार तोरण हैं जो बुद्ध के जीवन की घटनाओं और जातक कथाओं से अलंकृत हैं। मूर्तियों का संयोजन अधिक उभारदार और पूर्ण है, जिसमें हाव-भाव स्वाभाविक और शरीर
अभ्यास प्रश्न — Chapter 8
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. आप इण्डो-इस्लामिक या इण्डो-सारसेनिक शब्दों से क्या समझते हैं? क्या आप इस शैली के लिए किसी दूसरे नाम का सुझाव दे सकते हैं?
उत्तर:
इण्डो-इस्लामिक या इण्डो-सारसेनिक शब्द भारत में इस्लामी और भारतीय स्थापत्य शैलियों के सम्मिलन को दर्शाते हैं। यह शैली भारत में मुस्लिम शासकों के काल में विकसित हुई, जिसमें भारतीय और इस्लामी स्थापत्य तत्वों का मिश्रण होता है। इस शैली के लिए एक अन्य नाम 'मुगल स्थापत्य' भी दिया जा सकता है क्योंकि यह मुगल काल की प्रमुख वास्तुकला शैली थी।
व्याख्या:
इण्डो-इस्लामिक शब्द इस्लामी स्थापत्य कला और भारतीय स्थापत्य कला के मेल को दर्शाता है। इस शैली में मस्जिद, मकबरे, किले आदि में दोनों संस्कृतियों के तत्व मिलते हैं। इसलिए इसे इण्डो-सारसेनिक भी कहा जाता है।
Q2.2. तेरहवीं शताब्दी में भारत में भवन निर्माण के कौन-से नए प्रकार अपनाए गए?
उत्तर:
तेरहवीं शताब्दी में भारत में भवन निर्माण में मस्जिद, मकबरे, किले और महल जैसे नए प्रकार अपनाए गए। इस काल में इस्लामी स्थापत्य कला का प्रभाव बढ़ा और गुंबद, मेहराब, मिनार आदि तत्वों का प्रयोग हुआ। साथ ही पत्थर की नक्काशी और जालीदार खिड़कियाँ भी आम हुईं।
व्याख्या:
इस काल में मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ नई स्थापत्य तकनीकें आईं, जैसे कि गुंबदों का निर्माण, मेहराबों का प्रयोग, और किलों का निर्माण जो सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थे।
Q3.3. इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला की चार श्रेणियों का उल्लेख करें?
उत्तर:
इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला की चार मुख्य श्रेणियाँ हैं: (i) धार्मिक स्थापत्य: मस्जिद, मकबरे आदि। (ii) सैन्य स्थापत्य: किले, दुर्ग। (iii) आवासीय स्थापत्य: महल, हवेलियाँ। (iv) सार्वजनिक स्थापत्य: बाग, बावड़ी, पुल आदि।
व्याख्या:
इस्लामी स्थापत्य कला में विभिन्न प्रकार के भवन बनाए गए जो उनके प्रयोजन के अनुसार वर्गीकृत किए जा सकते हैं। धार्मिक, सैन्य, आवासीय और सार्वजनिक स्थापत्य इन चार श्रेणियों में आते हैं।
Q4.4. मध्य कालीन भारत में किले का क्या महत्व होता था? शत्रुओं को भरमाने या हराने के लिए किलों में क्या-क्या सामरिक उपाय अपनाए जाते थे?
उत्तर:
मध्य कालीन भारत में किले सामरिक और प्रशासनिक केंद्र होते थे। वे शत्रुओं से रक्षा के लिए बनाए जाते थे। किलों में गहरी खाई, मजबूत दीवारें, घुमावदार रास्ते, गुप्त द्वार, और ऊँचे मीनार बनाए जाते थे ताकि शत्रु को भ्रमित किया जा सके। साथ ही, किले में सैनिकों के रहने और हथियार रखने की व्यवस्था होती थी।
व्याख्या:
किले न केवल रक्षा के लिए बल्कि शासन के प्रतीक भी थे। सामरिक उपायों में किले की दीवारों की मोटाई, खाई, और दुश्मन के मार्ग को जटिल बनाना शामिल था ताकि हमला करना कठिन हो।
Q5.5. इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला का उद्भव और विकास कैसे हुआ?
उत्तर:
इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला का उद्भव भारत में मुस्लिम शासकों के आगमन के साथ हुआ। यह शैली भारतीय स्थापत्य कला और इस्लामी स्थापत्य कला के मेल से विकसित हुई। प्रारंभ में यह शैली सिंध, पंजाब और उत्तर भारत में प्रचलित हुई, बाद में दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में इसका विकास हुआ। इसमें गुंबद, मेहराब, मीनार, जाली और पच्चीकारी जैसे तत्व शामिल हुए।
व्याख्या:
मुस्लिम शासकों ने अपने धार्मिक और शाही भवनों के लिए नई स्थापत्य तकनीकें अपनाईं, जो भारतीय स्थापत्य कला के साथ मिश्रित होकर एक नई शैली बनी। समय के साथ यह शैली और परिष्कृत हुई।
Q6.6. मांडु इस तथ्य को कैसे उजागर करता है कि मानव अपने आपको पर्यावरण के अनुरूप ढाल लेते हैं?
उत्तर:
मांडु की वास्तुकला और नगर योजना इस बात को दर्शाती है कि मानव अपने पर्यावरण के अनुसार अपने आवास और संरचनाओं को ढाल लेते हैं। मांडु में प्राकृतिक जल स्रोतों, पहाड़ियों और घाटियों का उपयोग करते हुए किले, महल और बाग बनाए गए हैं जो पर्यावरण के अनुकूल हैं। यहाँ की जल निकासी, छायादार स्थान और प्राकृतिक सौंदर्य के अनुसार डिजाइन यह दर्शाते हैं कि मानव ने अपने पर्यावरण के अनुरूप जीवन शैली अपनाई।
व्याख्या:
मांडु का उदाहरण यह दिखाता है कि मानव ने प्राकृतिक संसाधनों और भूगोल के अनुसार अपने आवासों को डिजाइन किया ताकि जल संरक्षण, सुरक्षा और आराम सुनिश्चित हो सके।
Q7.7. अपूर्ण होते हुए भी गोल गुम्बद को इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला का भव्य एवं अनूठा प्रतीक क्यों माना जाता है?
उत्तर:
गोल गुम्बद, भले ही तकनीकी रूप से पूर्ण न हो, इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला का भव्य प्रतीक इसलिए माना जाता है क्योंकि यह स्थापत्य कौशल, सौंदर्य और धार्मिक महत्व का मेल है। इसका विशाल आकार, संतुलित डिजाइन और गुंबद की संरचना इस शैली की विशिष्टता को दर्शाती है। यह गुम्बद स्थापत्य में नवाचार और भारतीय तथा इस्लामी तत्वों के सम्मिलन का उदाहरण है।
व्याख्या:
गोल गुम्बद की बनावट और उसका प्रभावशाली आकार इसे अनूठा बनाता है। यह स्थापत्य कला में तकनीकी और कलात्मक प्रगति का प्रतीक है, जो इण्डो-इस्लामिक शैली की पहचान है।
Q8.8. मकबरा और दरगाह, कुछ ऐसे स्थान हैं जहां मृतकों को दफनाया जाता है। इन दोनों में क्या अंतर है? क्या आप किसी मृतक व्यक्ति के किसी स्मारक के बारे में जानते हैं?
उत्तर:
मकबरा एक भव्य स्मारक होता है जहाँ किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति को दफनाया जाता है, जबकि दरगाह एक सूफी संत या पवित्र व्यक्ति की कब्र होती है जहाँ श्रद्धालु आते हैं। मकबरे आमतौर पर राजाओं या शासकों के लिए बनाए जाते हैं, जैसे ताजमहल। दरगाह धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र होते हैं। उदाहरण के लिए, अजमेर शरीफ दरगाह सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की है।
व्याख्या:
मकबरा और दरगाह दोनों मृतकों के स्मारक हैं, लेकिन मकबरा अधिक भव्य और राजसी होता है, जबकि दरगाह धार्मिक श्रद्धा का केंद्र होता है।
Bhartiya Kala ka parichay के सभी 8 अध्याय
Fine Art · Class 11