Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
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इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला के कुछ कलात्मक पहलू
व्याख्याइण्डो-इस्लामिक वास्तुकला के कुछ कलात्मक पहलू
ईसा की सातवीं और आठवीं शताब्दी में इस्लाम धर्म का प्रसार स्पेन और भारत की ओर हुआ। भारत में इस्लाम मुख्यतः मुस्लिम सौदागरों, व्यापारियों, धर्मगुरुओं और विजेताओं के माध्यम से आया, जो लगभग छह सौ वर्षों तक समय-समय पर आते रहे। मुस्लिम लोगों ने आठवीं शताब्दी से सिंधु, गुजरात आदि क्षेत्रों में इमारतें बनाना शुरू किया, लेकिन बड़े पैमाने पर भवन निर्माण तेरहवीं शताब्दी में तुर्कों के दिल्ली सल्तनत स्थापित करने के बाद शुरू हुआ। बारहवीं शताब्दी तक भारत में भव्य और विशाल भवन निर्माण की प्रक्रिया पूरी तरह से विकसित हो चुकी थी। उस समय भवन निर्माण और अलंकरण की कई विधाएँ प्रचलित थीं, जैसे शहतीरों, टोड़ों और अनेक खंभों के सहारे छतों का निर्माण, चाप, मेहराब, डाट, तोरण आदि। चापें लकड़ी और पत्थर की बनाई जाती थीं, इसलिए वे ऊपर के ढांचे के बोझ को पूरी तरह सहन नहीं कर पाती थीं। गुंबदों के बोझ को सहने के लिए डोलदार चापों/मेहराबों की आवश्यकता पड़ी, जिन्हें डाट पत्थर से चापबंध के माध्यम से बनाया जाता था। इस प्रकार, लटकती हुई बगली डाट पर बने गुंबदों के अंदर खंभे न होने के कारण जगह अधिक हो गई। मुस्लिम शासकों ने स्थानीय सामग्रियों, संस्कृतियों और परंपराओं को अपनी तकनीकों के साथ मिलाकर अपनाया। उन्होंने कुछ तकनीकों को स्वीकार किया, कुछ को अस्वीकार किया और कुछ में परिवर्तन किया। इससे इण्डो-इस्लामिक या इंडो-सार्सेनिक वास्तुकला का विकास हुआ, जिसमें विभिन्न संरचनात्मक तकनीकों, शैलियों, रूपों और सज्जाओं का मिश्रण था। धार्मिक दृष्टिकोण से हिंदू परमेश्वर को अनेक रूपों में मानते हैं और सतहों पर मूर्तियां और चित्र बनाते हैं, जबकि मुस्लिम धर्म में अल्लाह एक है और किसी सजीव रूप की प्रतिकृति बनाना मना है। इसलिए मुस्लिम वास्तुकला में प्लास्टर या पत्थर पर 'अरबस्क' (बेल-बूटे), ज्यामितीय प्रतिरूप और सुलेखन की कलाओं का विकास हुआ।
- इस्लाम धर्म का भारत में आगमन मुस्लिम व्यापारियों और विजेताओं के माध्यम से हुआ।
- बारहवीं शताब्दी तक भारत में भव्य भवन निर्माण की तकनीकें विकसित हो चुकी थीं।
- डोलदार चापों/मेहराबों का उपयोग गुंबदों के बोझ को सहने के लिए किया गया।
- मुस्लिम शासकों ने स्थानीय परंपराओं को अपनी तकनीकों के साथ मिलाकर इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला विकसित की।
- हिंदू और मुस्लिम धार्मिक दृष्टिकोणों के कारण मूर्तिकला और सजावट में भिन्नताएं आईं।
- अरबस्क, ज्यामितीय डिजाइन और सुलेखन मुस्लिम वास्तुकला की विशेषताएं हैं।
- 📌 इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला: भारत में मुस्लिम और स्थानीय स्थापत्य शैलियों का मिश्रण।
- 📌 अरबस्क: बेल-बूटे जैसी सजावटी डिजाइन।
- 📌 डाट पत्थर: गुंबदों और मेहराबों के निर्माण में प्रयुक्त पत्थर।
संरचनाओं के रूपाकार
व्याख्यासंरचनाओं के रूपाकार
भारत में मुस्लिम आगमन के समय यहाँ धार्मिक और धर्म-निरपेक्ष दोनों प्रकार की वास्तुकला विद्यमान थी। मुस्लिम शासकों और संपन्न लोगों ने मस्जिदें, मकबरे, दरगाहें, मीनारें, हमाम, बाग-बगीचे, मदरसे, सराय और कोस मीनारें जैसे अनेक प्रकार के भवन बनवाए। वास्तुकला के निर्माण में धनवान शासक, सामंत, व्यापारी, ग्रामीण संग्रांत वर्ग और पंथ के अनुयायी शामिल थे। इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला पर सीरियाई, फारसी और तुर्की प्रभाव स्पष्ट हैं, लेकिन भारतीय वास्तुकलात्मक और आलंकारिक शैलियों ने भी इस पर गहरा प्रभाव डाला। सामग्री की उपलब्धता, संसाधनों, कौशलों और सौंदर्यबोध ने भी इस वास्तुकला को प्रभावित किया। धर्म और धार्मिकता मध्यकालीन भारत में महत्वपूर्ण थे, फिर भी उन्होंने अन्य संस्कृतियों के वास्तुकलात्मक तत्वों को उदारतापूर्वक अपनाया। इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला को परंपरागत रूप से चार श्रेणियों में बांटा जाता है: शाही शैली (दिल्ली सल्तनत), प्रान्तीय शैली (मांडू, गुजरात, बंगाल, जौनपुर), मुगल शैली (दिल्ली, आगरा, लाहौर) और दक्कनी शैली (बीजापुर, गोलकोंडा)। ये श्रेणियाँ वास्तुकलात्मक कार्यों की विशिष्टताओं के आधार पर बनाई गई हैं, लेकिन इन्हें कठोर रूप से सीमित नहीं किया जा सकता।
- मुस्लिम आगमन के समय भारत में धार्मिक और धर्म-निरपेक्ष दोनों वास्तुकला मौजूद थी।
- मस्जिद, मकबरे, मीनारें, मदरसे, सराय आदि प्रमुख इमारतें थीं।
- वास्तुकला पर सीरियाई, फारसी, तुर्की और भारतीय प्रभाव मिले हुए हैं।
- इण्डो-इस्लामिक वास्तुकला की चार मुख्य शैलियाँ हैं: शाही, प्रान्तीय, मुगल और दक्कनी।
- धार्मिकता के बावजूद अन्य संस्कृतियों के तत्वों को अपनाया गया।
- वास्तुकला में सामग्री, संसाधन और सौंदर्यबोध का भी प्रभाव था।
- 📌 शाही शैली: दिल्ली सल्तनत काल की वास्तुकला।
- 📌 प्रान्तीय शैली: क्षेत्रीय विशेषताओं वाली वास्तुकला।
- 📌 मुगल शैली: मुगल कालीन स्थापत्य कला।
उदारतापूर्वक ग्रहण और प्रभाव
व्याख्याउदारतापूर्वक ग्रहण और प्रभाव
प्रान्तीय शैलियों में बंगाल और जौनपुर की वास्तुकला को अलग माना जाता है। गुजरात की वास्तुकला का क्षेत्रीय स्वरूप विशेष था क्योंकि वहाँ के संरक्षकों ने मकबरों, मस्जिदों और दरगाहों के लिए क्षेत्रीय मंदिर परंपराओं के कई तत्व अपनाए, जैसे तोरण, मेहराबों मे
अभ्यास प्रश्न — Chapter 3
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. क्या आप यह सोचते हैं कि भारत में प्रतिमाएँ/मूर्तियाँ बनाने की कला मौर्य काल में शुरू हो गई थी? इस संबंध में आपके क्या विचार हैं, उदाहरण सहित लिखें।
उत्तर:
भारत में प्रतिमाएँ/मूर्तियाँ बनाने की कला मौर्य काल में तो प्रबल हुई लेकिन इसकी शुरुआत उससे पहले भी हुई थी। मौर्य काल में मूर्तिकला को एक व्यवस्थित और शिल्पकला के रूप में विकसित किया गया। उदाहरण के लिए, अशोक स्तंभों की मूर्तियाँ और शिल्पकारी मौर्य काल की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इससे पहले भी, सिंधु घाटी सभ्यता में मिट्टी और पत्थर की मूर्तियाँ बनती थीं। अतः मौर्य काल में मूर्तिकला की कला की शुरुआत नहीं हुई, बल्कि उसका विकास और विस्तार हुआ।
व्याख्या:
मौर्य काल से पहले भी मूर्तिकला की परंपरा थी, जैसे सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तियाँ। मौर्य काल में मूर्तिकला को शासकीय संरक्षण मिला और अशोक स्तंभ, शिलालेख आदि विकसित हुए। इसलिए यह कहना उचित है कि मौर्य काल में मूर्तिकला की शुरुआत नहीं, बल्कि उसका विकास हुआ।
Q2.2. स्तूप का क्या महत्व था और स्तूप वास्तुकला का विकास कैसे हुआ?
उत्तर:
स्तूप बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्मारक है, जो बुद्ध के अवशेषों या उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को समर्पित होता है। इसका महत्व धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य दृष्टि से अत्यधिक है। स्तूप वास्तुकला का विकास प्रारंभ में छोटे गुम्बदाकार संरचनाओं से हुआ, जो बाद में बड़े और जटिल रूपों में विकसित हुए। प्रारंभिक स्तूपों में मौर्य काल के अशोक स्तूप प्रमुख हैं। बाद में गुप्त और बाद के कालों में स्तूपों की सजावट और आकार में विविधता आई, जैसे कि सांची स्तूप।
व्याख्या:
स्तूप बौद्ध धर्म में पवित्रता और ध्यान का केंद्र होते हैं। मौर्य काल में अशोक ने स्तूपों का निर्माण कराया। समय के साथ स्तूपों की वास्तुकला में विकास हुआ, जिसमें गुम्बदाकार संरचना, परिक्रमा पथ, और सजावटी शिल्प शामिल हुए। यह विकास बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ हुआ।
Q3.3. बुद्ध के जीवन की वे चार घटनाएं कौन-सी थीं जिन्हें बौद्ध कला के भिन्न-भिन्न रूपों में चित्रित किया गया है, ये घटनाएं किस बात का प्रतीक थीं?
उत्तर:
बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाएं हैं: जन्म, बोधि प्राप्ति (ज्ञान प्राप्ति), पहला उपदेश और महापरिनिर्वाण। बौद्ध कला में इन घटनाओं को विभिन्न रूपों में चित्रित किया गया है, जैसे जन्म की घटना में लुम्बिनी उद्यान का चित्रण, बोधि प्राप्ति में पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध, पहला उपदेश में धर्मचक्र प्रवर्तन और महापरिनिर्वाण में शांति की मुद्रा। ये घटनाएं बौद्ध धर्म के मुख्य सिद्धांतों और आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक हैं।
व्याख्या:
बौद्ध कला ने इन चार घटनाओं को प्रतीकात्मक रूपों में दर्शाया है, जो बुद्ध के जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ हैं। ये घटनाएं बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक संदेश और शिक्षाओं को दर्शाती हैं।
Q4.4. जातक क्या है? जातकों का बौद्ध धर्म से क्या संबंध है? पता लगाइए।
उत्तर:
जातक कथाएँ बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं, जिनमें उनके जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक गुणों का वर्णन होता है। ये कथाएँ बौद्ध धर्म के शिक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं क्योंकि वे करुणा, त्याग, और धर्म के सिद्धांतों को समझाने में मदद करती हैं। जातक कथाएँ बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में सहायक रहीं और इन्हें कला और साहित्य में भी चित्रित किया गया है।
व्याख्या:
जातक कथाएँ बौद्ध धर्म के नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षाओं को सरल और प्रभावी रूप में प्रस्तुत करती हैं। ये कथाएँ बुद्ध के आदर्श चरित्र और गुणों को दर्शाती हैं, जो अनुयायियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
Q5.मौर्य कालीन कला के संदर्भ में, मौर्य साम्राज्य ने किस शताब्दी तक भारत के अधिकांश भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था?
उत्तर:
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी
व्याख्या:
मौर्य साम्राज्य ने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी तक अपना प्रभुत्व जमाना शुरू किया और तीसरी शताब्दी तक भारत के अधिकांश भाग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था।
Q6.मौर्य कालीन स्तंभों और एकेमिनियन स्तंभों में मुख्य अंतर क्या था?
उत्तर:
मौर्य स्तंभ एक विशाल पत्थर से कटे होते थे, जबकि एकेमिनियन स्तंभ कई टुकड़ों को जोड़कर बने होते थे।
व्याख्या:
मौर्य कालीन स्तंभ एक विशाल पत्थर से काटे गए होते थे, जिनमें कलाकार का कौशल स्पष्ट दिखता है, जबकि एकेमिनियन स्तंभ कई टुकड़ों को जोड़कर बनाए जाते थे।
Q7.सारनाथ के मौर्य कालीन स्तंभ शीर्ष में किन जानवरों की आकृतियाँ उकेरी गई हैं?
उत्तर:
शेर, साँड़, हाथी, घोड़ा
व्याख्या:
सारनाथ के सिंह शीर्ष पर चार शेरों की आकृतियाँ हैं, और निचले भाग में गतिमान मुद्रा में घोड़ा, साँड़ और हाथी उकेरे गए हैं।
Q8.मौर्य कालीन मूर्तिकला में यक्षिणी की मूर्ति के प्रमुख लक्षण क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
मौर्य कालीन यक्षिणी की मूर्ति लंबी, ऊंची और सुगठित होती है। इसकी सतह चिकनी पॉलिश की हुई होती है। मूर्ति का अंगविन्यास संतुलित और समानुपातिक होता है। उदाहरण के लिए, दीदारगंज, पटना में मिली यक्षिणी मूर्ति में दाहिने हाथ में चामर पकड़े हुए दिखाया गया है और पोशाक तथा आभूषणों का चित्रण सावधानी से किया गया है।
व्याख्या:
यक्षिणी की मूर्ति में प्राकृतिक आकृति चित्रण, चिकनी सतह, संतुलित अंगविन्यास और सूक्ष्म विवरण जैसे पोशाक के मोड़ और आभूषण स्पष्ट होते हैं। दीदारगंज की मूर्ति इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
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