Chapter 6
Chapter 6 — अध्ययन नोट्स
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6.1 उपसहसंयोजक यौगिकों का परिचय
व्याख्या6.1 उपसहसंयोजक यौगिकों का परिचय
इस अनुभाग में उपसहसंयोजक यौगिकों (Coordination Compounds) का परिचय दिया गया है। उपसहसंयोजक यौगिक वे रासायनिक यौगिक होते हैं जिनमें एक केंद्रीय धातु आयन के चारों ओर लिगैंड्स (Ligands) नामक अणु या आयन जुड़े रहते हैं। ये लिगैंड्स केंद्रीय धातु आयन के साथ सहसंयोजक बंध के माध्यम से जुड़े होते हैं। उपसहसंयोजक यौगिकों का अध्ययन अकार्बनिक रसायन का महत्वपूर्ण भाग है, क्योंकि ये यौगिक जैविक प्रक्रियाओं, औद्योगिक उत्प्रेरण, रंगों, औषधियों आदि में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उपसहसंयोजक यौगिकों की खोज सर्वप्रथम वर्नर (Werner) ने की थी, जिन्होंने इनके संरचनात्मक सिद्धांत दिए। वर्नर के अनुसार, केंद्रीय धातु आयन के चारों ओर लिगैंड्स की निश्चित संख्या होती है, जिसे समन्वय संख्या (Coordination Number) कहते हैं। उपसहसंयोजक यौगिकों में केंद्रीय धातु आयन धनावेशित या उदासीन हो सकता है, जबकि लिगैंड्स ऋणावेशित, धनावेशित या उदासीन हो सकते हैं। इन यौगिकों की संरचना और नामकरण के लिए IUPAC द्वारा नियम निर्धारित किए गए हैं। उपसहसंयोजक यौगिकों के उदाहरणों में [Fe(CN)₆]⁴⁻, [Cu(NH₃)₄]²⁺, [Co(NH₃)₆]³⁺ आदि आते हैं। इन यौगिकों के अध्ययन से हमें रासायनिक बंधन, संरचना, रंग, चुम्बकीय गुण, तथा जैव-रसायन में इनकी भूमिका को समझने में सहायता मिलती है।
- उपसहसंयोजक यौगिकों में केंद्रीय धातु आयन के चारों ओर लिगैंड्स जुड़े होते हैं।
- लिगैंड्स सहसंयोजक बंध के माध्यम से केंद्रीय आयन से जुड़ते हैं।
- समन्वय संख्या केंद्रीय आयन के चारों ओर जुड़े लिगैंड्स की संख्या होती है।
- वर्नर ने उपसहसंयोजक यौगिकों की संरचना का सिद्धांत दिया।
- इन यौगिकों के नामकरण के लिए IUPAC नियम लागू होते हैं।
- ये यौगिक जैविक, औद्योगिक एवं चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।
- 📌 उपसहसंयोजक यौगिक: केंद्रीय धातु आयन के चारों ओर लिगैंड्स से बने यौगिक।
- 📌 लिगैंड: वह आयन या अणु जो केंद्रीय धातु आयन से सहसंयोजक बंध बनाता है।
- 📌 समन्वय संख्या: केंद्रीय आयन के चारों ओर जुड़े लिगैंड्स की संख्या।
6.2 उपसहसंयोजक यौगिकों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
व्याख्या6.2 उपसहसंयोजक यौगिकों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इस अनुभाग में उपसहसंयोजक यौगिकों की खोज और उनके विकास का ऐतिहासिक विवरण दिया गया है। प्रारंभ में, उपसहसंयोजक यौगिकों की संरचना को समझना कठिन था क्योंकि वे सामान्य यौगिकों से भिन्न गुण दर्शाते थे। 19वीं शताब्दी के अंत में, अल्फ्रेड वर्नर ने उपसहसंयोजक यौगिकों की संरचना और बंधन के सिद्धांत प्रस्तुत किए। वर्नर के प्रयोगों से यह स्पष्ट हुआ कि केंद्रीय धातु आयन के चारों ओर लिगैंड्स एक निश्चित ज्यामिति में व्यवस्थित होते हैं। वर्नर ने दो प्रकार की संयोज्यता (Valency) का प्रस्ताव किया: प्राथमिक संयोज्यता (Primary Valency) और द्वितीयक संयोज्यता (Secondary Valency)। प्राथमिक संयोज्यता आयनिक बंधन को दर्शाती है, जबकि द्वितीयक संयोज्यता लिगैंड्स के साथ सहसंयोजक बंधन को दर्शाती है। वर्नर के कार्यों ने उपसहसंयोजक यौगिकों की संरचना, रंग, और क्रियाशीलता को समझने में क्रांति ला दी। वर्नर के सिद्धांत को उनके द्वारा किए गए कोबाल्ट अमोनिया यौगिकों के अध्ययन से बल मिला। उन्होंने विभिन्न कोबाल्ट अमोनिया लवणों की संरचना, रंग, और विद्युत अपघटन के आधार पर उनकी समन्वय संख्या निर्धारित की। वर्नर को 1913 में रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार भी मिला।
- प्रारंभ में उपसहसंयोजक यौगिकों की संरचना अस्पष्ट थी।
- वर्नर ने संयोज्यता के दो प्रकार (प्राथमिक व द्वितीयक) बताए।
- कोबाल्ट अमोनिया यौगिकों के अध्ययन से वर्नर के सिद्धांत को बल मिला।
- वर्नर ने समन्वय संख्या की अवधारणा दी।
- 1913 में वर्नर को नोबेल पुरस्कार मिला।
- इन सिद्धांतों से उपसहसंयोजक यौगिकों की संरचना स्पष्ट हुई।
- 📌 प्राथमिक संयोज्यता: केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था द्वारा दर्शाई गई संयोज्यता।
- 📌 द्वितीयक संयोज्यता: केंद्रीय धातु के चारों ओर लिगैंड्स की संख्या।
6.3 लिगैंड्स के प्रकार
अवधारणा6.3 लिगैंड्स के प्रकार
इस अनुभाग में लिगैंड्स के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया गया है। लिगैंड्स वे अणु या आयन होते हैं जो केंद्रीय धातु आयन से सहसंयोजक बंध बनाते हैं। लिगैंड्स को उनके दातृत्व (Donor) परमाणुओं की संख्या के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। 1. एकदंती लिगैंड (
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Inorganic Chemistry · Vardhman Mahaveer Open University