Ch 5निःशुल्क

Chapter 5

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - Macro Economics (Hindi)📖 8 नोट्स⏱️ ~12 मिनट
Chapter 4अध्याय 5 / 15Chapter 6

Chapter 5अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

5.1 परिचय

व्याख्या

5.1 परिचय

इस अनुभाग में रोजगार के कीन्सियन सिद्धांत की पृष्ठभूमि और आवश्यकता पर चर्चा की गई है। 1930 के दशक में महामंदी (Great Depression) के दौरान बेरोजगारी की गंभीर समस्या उत्पन्न हुई थी। उस समय पारंपरिक शास्त्रीय अर्थशास्त्र इस समस्या का समाधान नहीं दे सका। जॉन मेनार्ड कीन्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'जनरल थ्योरी ऑफ एम्प्लॉयमेंट, इंटरेस्ट एंड मनी' (1936) में रोजगार, आय और उत्पादन के निर्धारण के नए सिद्धांत प्रस्तुत किए। कीन्स ने कहा कि कुल मांग (Aggregate Demand) और कुल आपूर्ति (Aggregate Supply) के बीच संबंध के आधार पर रोजगार का स्तर निर्धारित होता है। कीन्स का मानना था कि बाजार तंत्र अपने आप पूर्ण रोजगार की स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता, अतः सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए। इस अध्याय में हम कीन्सियन सिद्धांत, AD एवं AS फलन, प्रभावपूर्ण मांग (Effective Demand) आदि की विस्तार से चर्चा करेंगे।

  • महामंदी के दौरान पारंपरिक सिद्धांत विफल रहे।
  • कीन्स ने रोजगार निर्धारण का नया दृष्टिकोण दिया।
  • कुल मांग और कुल आपूर्ति के बीच संतुलन से रोजगार तय होता है।
  • सरकारी हस्तक्षेप की आवश्यकता को कीन्स ने रेखांकित किया।
  • इस अध्याय में AD, AS और प्रभावपूर्ण मांग के सिद्धांतों का अध्ययन किया जाएगा।
  • 📌 महामंदी: 1930 के दशक की आर्थिक मंदी, जिसमें उत्पादन और रोजगार में भारी गिरावट आई।
  • 📌 कीन्सियन सिद्धांत: रोजगार, आय और उत्पादन निर्धारण का नया दृष्टिकोण।

5.2 कीन्सियन रोजगार निर्धारण का सिद्धांत

अवधारणा

5.2 कीन्सियन रोजगार निर्धारण का सिद्धांत

कीन्सियन सिद्धांत के अनुसार, किसी अर्थव्यवस्था में रोजगार का स्तर कुल प्रभावपूर्ण मांग (Effective Demand) द्वारा निर्धारित होता है। कीन्स ने शास्त्रीय विचारधारा को चुनौती दी, जिसमें यह माना जाता था कि मजदूरी और कीमतों में लचीलापन होने से पूर्ण रोजगार अपने आप सुनिश्चित हो जाता है। कीन्स ने कहा कि मजदूरी और कीमतों में कठोरता के कारण बेरोजगारी बनी रह सकती है। उन्होंने कुल मांग (AD) और कुल आपूर्ति (AS) के सिद्धांत पर बल दिया। जब तक AD और AS बराबर नहीं होते, तब तक अर्थव्यवस्था में असंतुलन रहता है। प्रभावपूर्ण मांग वह बिंदु है जहाँ AD और AS बराबर होते हैं, और इसी बिंदु पर रोजगार का स्तर निश्चित होता है।

  • रोजगार का स्तर प्रभावपूर्ण मांग द्वारा निर्धारित होता है।
  • मजदूरी और कीमतों में कठोरता के कारण बेरोजगारी बनी रह सकती है।
  • AD और AS के संतुलन से रोजगार का निर्धारण होता है।
  • सरकार को कुल मांग बढ़ाने हेतु हस्तक्षेप करना चाहिए।
  • पूर्ण रोजगार अपने आप नहीं आता, सरकारी नीति आवश्यक है।
  • 📌 प्रभावपूर्ण मांग: वह मांग, जहाँ AD और AS बराबर होते हैं।
  • 📌 कुल मांग (AD): अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं और सेवाओं की कुल मांग।
  • 📌 कुल आपूर्ति (AS): अर्थव्यवस्था में सभी वस्तुओं और सेवाओं की कुल आपूर्ति।

5.3 कुल मांग (AD) फलन

व्याख्या

5.3 कुल मांग (AD) फलन

कुल मांग (Aggregate Demand - AD) फलन वह संबंध दर्शाता है, जिसमें किसी अर्थव्यवस्था में विभिन्न आय स्तरों पर कुल खर्च (व्यय) की मात्रा को दर्शाया जाता है। AD में उपभोग (C), निवेश (I), सरकारी खर्च (G) और शुद्ध निर्यात (X - M) शामिल होते हैं। AD = C + I