Ch 3निःशुल्क

Chapter 3

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - Macro Economics (Hindi)📖 8 नोट्स⏱️ ~12 मिनट
Chapter 2अध्याय 3 / 15Chapter 4

Chapter 3अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

3.1 प्रस्तावना

व्याख्या

3.1 प्रस्तावना

इस अनुभाग में राष्ट्रीय आय लेखांकन में पर्यावरणीय संदर्भ की आवश्यकता और महत्त्व को स्पष्ट किया गया है। पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन (National Income Accounting) में केवल आर्थिक गतिविधियों का लेखा-जोखा होता है, जिसमें पर्यावरणीय संसाधनों के उपयोग और क्षरण की अनदेखी की जाती है। जैसे-जैसे आर्थिक विकास होता है, प्राकृतिक संसाधनों का दोहन और पर्यावरणीय प्रदूषण भी बढ़ता है, जिससे सतत विकास (Sustainable Development) के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन हो जाता है। अतः पर्यावरणीय संदर्भ को राष्ट्रीय आय लेखांकन में शामिल करना आवश्यक है ताकि विकास की वास्तविक लागत और लाभ का सही आकलन किया जा सके। इस अध्याय में भारत के संदर्भ में पर्यावरणीय लेखांकन के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है।

  • राष्ट्रीय आय लेखांकन में पारंपरिक रूप से पर्यावरणीय कारकों की अनदेखी होती है।
  • आर्थिक विकास के साथ-साथ पर्यावरणीय क्षरण भी बढ़ता है।
  • सतत विकास के लिए पर्यावरणीय संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।
  • पर्यावरणीय संदर्भ को शामिल करने से विकास की वास्तविक लागत ज्ञात होती है।
  • भारत में पर्यावरणीय लेखांकन की आवश्यकता बढ़ रही है।
  • 📌 राष्ट्रीय आय लेखांकन: देश की आर्थिक गतिविधियों का सांख्यिकीय लेखा-जोखा।
  • 📌 पर्यावरणीय संदर्भ: आर्थिक गतिविधियों के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभाव का समावेश।
  • 📌 सतत विकास: वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए भविष्य की आवश्यकताओं से समझौता न करना।

3.2 पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन की सीमाएँ

अवधारणा

3.2 पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन की सीमाएँ

इस अनुभाग में पारंपरिक राष्ट्रीय आय लेखांकन की सीमाओं पर विस्तार से चर्चा की गई है। पारंपरिक प्रणाली में केवल वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन का मूल्यांकन होता है, जिसमें प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग, क्षरण, और प्रदूषण की गणना नहीं की जाती। इससे आर्थिक विकास की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं आती। उदाहरण के लिए, यदि कोई उद्योग नदी में प्रदूषित जल छोड़ता है, तो उसकी सफाई पर होने वाला व्यय भी जीडीपी में जुड़ जाता है, जबकि यह समाज के लिए हानिकारक है। इसी प्रकार, वनों की कटाई से प्राप्त लकड़ी का मूल्य तो जोड़ा जाता है, परंतु वनों के नष्ट होने से होने वाली हानि की अनदेखी होती है।

  • पारंपरिक लेखांकन में पर्यावरणीय क्षरण और संसाधनों की समाप्ति शामिल नहीं होती।
  • प्रदूषण नियंत्रण पर खर्च को भी सकारात्मक आर्थिक गतिविधि माना जाता है।
  • प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण की गणना नहीं होने से जीडीपी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई देती है।
  • सामाजिक कल्याण की सही स्थिति ज्ञात नहीं हो पाती।
  • सतत विकास के लिए यह प्रणाली अपर्याप्त है।
  • 📌 प्राकृतिक संसाधन क्षरण: प्राकृतिक संसाधनों की गुणवत्ता या मात्रा में कमी।
  • 📌 प्रदूषण नियंत्रण व्यय: पर्यावरण को स्वच्छ रखने के लिए किया गया खर्च।

3.3 पर्यावरणीय लेखांकन की आवश्यकता

व्याख्या

3.3 पर्यावरणीय लेखांकन की आवश्यकता

इस अनुभाग में बताया गया है कि पर्यावरणीय लेखांकन क्यों आवश्यक है। जैसे-जैसे आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ती हैं, पर्यावरण पर दबाव भी बढ़ता है। पारंपरिक लेखांकन में प्राकृतिक संसाधनों के क्षरण और प्रदूषण की अनदेखी होती है, जिससे आर्थिक विकास की वास्तविकता छुप