Chapter 2
Chapter 2 — अध्ययन नोट्स
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2.1 सुदूर संवेदन: परिभाषा और महत्व
परिभाषा2.1 सुदूर संवेदन: परिभाषा और महत्व
सुदूर संवेदन (Remote Sensing) वह तकनीक है जिसके माध्यम से पृथ्वी की सतह, जल, वायुमंडल आदि के बारे में जानकारी बिना प्रत्यक्ष संपर्क के, उपग्रहों या वायुयान से प्राप्त की जाती है। यह तकनीक भौगोलिक, पर्यावरणीय, कृषि, वन, जल संसाधन, शहरी नियोजन आदि क्षेत्रों में अत्यंत महत्वपूर्ण है। सुदूर संवेदन के माध्यम से बड़े क्षेत्र की जानकारी एक साथ, तीव्रता से और सटीक रूप में प्राप्त की जा सकती है। यह तकनीक दृश्य, अवरक्त, सूक्ष्मतरंग, तापीय आदि विभिन्न विद्युत-चुंबकीय वर्णक्रम (Electromagnetic Spectrum) के हिस्सों का उपयोग करती है। सुदूर संवेदन के महत्व को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि यह तकनीक किस प्रकार से पारंपरिक सर्वेक्षण विधियों की तुलना में अधिक कुशल, समय-बचत और लागत-कम करती है। सुदूर संवेदन के माध्यम से प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी, फसल की स्थिति का मूल्यांकन, जल संसाधन प्रबंधन, शहरी विस्तार की निगरानी, पर्यावरणीय परिवर्तनों का अध्ययन आदि कार्य किए जाते हैं।
- सुदूर संवेदन में प्रत्यक्ष संपर्क के बिना जानकारी एकत्रित की जाती है।
- यह तकनीक विद्युत-चुंबकीय वर्णक्रम के विभिन्न हिस्सों का उपयोग करती है।
- सुदूर संवेदन कृषि, वन, जल, शहरी नियोजन आदि में उपयोगी है।
- यह पारंपरिक सर्वेक्षण विधियों की तुलना में अधिक सटीक और तीव्र है।
- प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी में सुदूर संवेदन का विशेष महत्व है।
- 📌 सुदूर संवेदन: बिना प्रत्यक्ष संपर्क के जानकारी एकत्रित करने की तकनीक।
- 📌 विद्युत-चुंबकीय वर्णक्रम: ऊर्जा का वह क्षेत्र जिसमें दृश्य, अवरक्त, सूक्ष्मतरंग आदि आते हैं।
2.2 सुदूर संवेदन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
व्याख्या2.2 सुदूर संवेदन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सुदूर संवेदन की शुरुआत 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुई जब पहली बार गुब्बारों से कैमरे का उपयोग कर पृथ्वी की सतह के चित्र लिए गए। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हवाई फोटोग्राफी का सैन्य उद्देश्यों के लिए व्यापक उपयोग हुआ। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, वायुयान और उपग्रहों के विकास के साथ सुदूर संवेदन तकनीक में तीव्र प्रगति हुई। 1960 के दशक में अमेरिकी उपग्रह 'लैंडसैट' (LANDSAT) के प्रक्षेपण के साथ सुदूर संवेदन का युग प्रारंभ हुआ। भारत में सुदूर संवेदन की शुरुआत 1970 के दशक में हुई और 1988 में 'IRS-1A' (Indian Remote Sensing Satellite) के प्रक्षेपण के साथ भारत ने स्वदेशी सुदूर संवेदन उपग्रहों का निर्माण और संचालन प्रारंभ किया। आज भारत के पास विश्व की सबसे बड़ी सुदूर संवेदन उपग्रह श्रृंखला है।
- 19वीं शताब्दी में गुब्बारों से फोटोग्राफी द्वारा सुदूर संवेदन की शुरुआत।
- प्रथम विश्व युद्ध में हवाई फोटोग्राफी का सैन्य उपयोग।
- 1960 के दशक में उपग्रह आधारित सुदूर संवेदन का विकास।
- भारत में 1988 में IRS-1A उपग्रह का प्रक्षेपण।
- भारत विश्व में सुदूर संवेदन उपग्रहों के क्षेत्र में अग्रणी।
- 📌 हवाई फोटोग्राफी: वायुयान या गुब्बारों से ली गई पृथ्वी की सतह की तस्वीरें।
- 📌 लैंडसैट: अमेरिका द्वारा प्रक्षेपित सुदूर संवेदन उपग्रह।
- 📌 IRS: भारतीय सुदूर संवेदन उपग्रह।
2.3 विद्युत-चुंबकीय वर्णक्रम
अवधारणा2.3 विद्युत-चुंबकीय वर्णक्रम
विद्युत-चुंबकीय वर्णक्रम (Electromagnetic Spectrum) वह संपूर्ण क्षेत्र है जिसमें विद्युत-चुंबकीय तरंगें विभिन्न तरंगदैर्घ्य (wavelength) और आवृत्तियों (frequency) में फैलती हैं। सुदूर संवेदन में मुख्य रूप से दृश्य (Visible), अवरक्त (Infrared), सूक्ष्
SLM - Practical Geography (Hindi) के सभी 8 अध्याय
Practical Geography · Vardhman Mahaveer Open University