Chapter 3
Chapter 3 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
मौर्य कालीन कला
व्याख्यामौर्य कालीन कला
छठी शताब्दी ईसा पूर्व में गंगा घाटी में बौद्ध और जैन धर्मों के रूप में नए धार्मिक और सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत हुई। ये दोनों धर्म श्रमण परंपरा के अंग थे, जो सनातन धर्म की वर्ण और जाति व्यवस्था के विरोध में थे। उस समय मगध एक शक्तिशाली राज्य था जिसने अन्य राज्यों को अपने नियंत्रण में ले लिया। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व तक मौर्यों ने अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था और तीसरी शताब्दी तक भारत का बड़ा हिस्सा मौर्यों के अधीन था। मौर्य सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी में बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया। उस समय पूजा के अनेक रूप प्रचलित थे, जिनमें यक्ष और मातृदेवियों की पूजा भी शामिल थी। बौद्ध धर्म सामाजिक और धार्मिक आंदोलन के रूप में सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ। यक्ष पूजा बौद्ध धर्म के आगमन से पहले और बाद में भी लोकप्रिय रही, लेकिन बाद में यह बौद्ध और जैन धर्मों में विलीन हो गई।
- गंगा घाटी में छठी शताब्दी में बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ।
- मौर्य साम्राज्य ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक भारत के बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित किया।
- अशोक ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और इसे प्रोत्साहित किया।
- पूजा के विभिन्न रूप प्रचलित थे, जिनमें यक्ष और मातृदेवियों की पूजा भी शामिल थी।
- बौद्ध धर्म सामाजिक और धार्मिक आंदोलन के रूप में लोकप्रिय हुआ।
- यक्ष पूजा बौद्ध और जैन धर्मों में विलीन हो गई।
- 📌 मौर्य साम्राज्य: प्राचीन भारत का एक बड़ा साम्राज्य जो तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित हुआ।
- 📌 श्रृमण परंपरा: सनातन धर्म की वर्ण व्यवस्था के विरोध में धार्मिक आंदोलन।
- 📌 यक्ष पूजा: प्राकृतिक और लोक विश्वासों से जुड़ी पूजा पद्धति।
खंभे, मूर्तियाँ और शैलकृत वास्तुकला
व्याख्याखंभे, मूर्तियाँ और शैलकृत वास्तुकला
मौर्य काल में मठों के साथ स्तूपों और विहारों का निर्माण श्रमण परंपरा का हिस्सा था। इस काल में पत्थर के स्तंभ, चट्टानों को काटकर गुफाएं और विशाल मूर्तियाँ बनाई गईं। मौर्य कालीन स्तंभ एक विशाल पत्थर से कटे हुए होते थे, जो एकेमिनियन साम्राज्य के स्तंभों से भिन्न थे, क्योंकि एकेमिनियन स्तंभ कई टुकड़ों को जोड़कर बनाए जाते थे। मौर्य स्तंभों पर शिलालेख उत्कीर्ण होते थे और उनकी शीर्षकितियाँ साँड़, शेर, हाथी जैसे पशुओं की आकृतियों से सजाई जाती थीं। ये शीर्षकितियाँ वर्गाकार या गोल वेदी पर खड़ी होती थीं, जिनमें कमल के फूलों की सजावट होती थी। ऐसे स्तंभ बिहार और उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर आज भी देखे जा सकते हैं। सारनाथ का सिंह शीर्ष मौर्य कालीन मूर्तिकला का उत्कृष्ट उदाहरण है, जो राष्ट्रीय प्रतीक भी है। इसमें चार शेरों की आकृतियाँ और नीचे घोड़ा, साँड़, हिरन आदि गतिमान मुद्रा में उकेरे गए हैं। ये स्तंभ धम्मचक्र प्रवर्तन का प्रतीक हैं।
- मौर्य कालीन स्तंभ एक ही पत्थर से कटे हुए होते थे।
- स्तंभों की शीर्षकितियाँ पशु आकृतियों से सजी होती थीं।
- सारनाथ का सिंह शीर्ष राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में प्रसिद्ध है।
- मौर्य कालीन मूर्तिकला में यक्ष, यक्षिणी और पशु आकृतियाँ प्रमुख थीं।
- शैलकृत वास्तुकला में चट्टानों को काटकर गुफाएं बनाई गईं।
- मौर्य स्तंभों पर शिलालेख उत्कीर्ण होते थे।
- 📌 शैलकृत वास्तुकला: चट्टानों को काटकर बनाई गई वास्तुकला।
- 📌 शीर्षकितियाँ: स्तंभों के शीर्ष पर बनी पशु आकृतियाँ।
- 📌 धम्मचक्र प्रवर्तन: बुद्ध द्वारा पहला उपदेश देने की घटना।
मौर्य कालीन मूर्तिकला
व्याख्यामौर्य कालीन मूर्तिकला
मौर्य काल में मूर्तिकला का विकास स्तंभों के समान ही महत्वपूर्ण था। इस काल की मूर्तियाँ प्रायः यक्ष, यक्षिणी, और पशु जैसे हाथी, सिंह, बैल आदि के रूप में पाई जाती हैं। ये मूर्तियाँ धार्मिक आस्था, लोक विश्वास और सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती
अभ्यास प्रश्न — Chapter 3
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. क्या आप यह सोचते हैं कि भारत में प्रतिमाएँ/मूर्तियाँ बनाने की कला मौर्य काल में शुरू हो गई थी? इस संबंध में आपके क्या विचार हैं, उदाहरण सहित लिखें।
उत्तर:
भारत में प्रतिमाएँ/मूर्तियाँ बनाने की कला मौर्य काल में तो प्रबल हुई लेकिन इसकी शुरुआत उससे पहले भी हुई थी। मौर्य काल में मूर्तिकला को एक व्यवस्थित और शिल्पकला के रूप में विकसित किया गया। उदाहरण के लिए, अशोक स्तंभों की मूर्तियाँ और शिल्पकारी मौर्य काल की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इससे पहले भी, सिंधु घाटी सभ्यता में मिट्टी और पत्थर की मूर्तियाँ बनती थीं। अतः मौर्य काल में मूर्तिकला की कला की शुरुआत नहीं हुई, बल्कि उसका विकास और विस्तार हुआ।
व्याख्या:
मौर्य काल से पहले भी मूर्तिकला की परंपरा थी, जैसे सिंधु घाटी सभ्यता की मूर्तियाँ। मौर्य काल में मूर्तिकला को शासकीय संरक्षण मिला और अशोक स्तंभ, शिलालेख आदि विकसित हुए। इसलिए यह कहना उचित है कि मौर्य काल में मूर्तिकला की शुरुआत नहीं, बल्कि उसका विकास हुआ।
Q2.2. स्तूप का क्या महत्व था और स्तूप वास्तुकला का विकास कैसे हुआ?
उत्तर:
स्तूप बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्मारक है, जो बुद्ध के अवशेषों या उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को समर्पित होता है। इसका महत्व धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य दृष्टि से अत्यधिक है। स्तूप वास्तुकला का विकास प्रारंभ में छोटे गुम्बदाकार संरचनाओं से हुआ, जो बाद में बड़े और जटिल रूपों में विकसित हुए। प्रारंभिक स्तूपों में मौर्य काल के अशोक स्तूप प्रमुख हैं। बाद में गुप्त और बाद के कालों में स्तूपों की सजावट और आकार में विविधता आई, जैसे कि सांची स्तूप।
व्याख्या:
स्तूप बौद्ध धर्म में पवित्रता और ध्यान का केंद्र होते हैं। मौर्य काल में अशोक ने स्तूपों का निर्माण कराया। समय के साथ स्तूपों की वास्तुकला में विकास हुआ, जिसमें गुम्बदाकार संरचना, परिक्रमा पथ, और सजावटी शिल्प शामिल हुए। यह विकास बौद्ध धर्म के प्रसार के साथ हुआ।
Q3.3. बुद्ध के जीवन की वे चार घटनाएं कौन-सी थीं जिन्हें बौद्ध कला के भिन्न-भिन्न रूपों में चित्रित किया गया है, ये घटनाएं किस बात का प्रतीक थीं?
उत्तर:
बुद्ध के जीवन की चार प्रमुख घटनाएं हैं: जन्म, बोधि प्राप्ति (ज्ञान प्राप्ति), पहला उपदेश और महापरिनिर्वाण। बौद्ध कला में इन घटनाओं को विभिन्न रूपों में चित्रित किया गया है, जैसे जन्म की घटना में लुम्बिनी उद्यान का चित्रण, बोधि प्राप्ति में पेड़ के नीचे ध्यान करते हुए बुद्ध, पहला उपदेश में धर्मचक्र प्रवर्तन और महापरिनिर्वाण में शांति की मुद्रा। ये घटनाएं बौद्ध धर्म के मुख्य सिद्धांतों और आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक हैं।
व्याख्या:
बौद्ध कला ने इन चार घटनाओं को प्रतीकात्मक रूपों में दर्शाया है, जो बुद्ध के जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ हैं। ये घटनाएं बौद्ध धर्म के आध्यात्मिक संदेश और शिक्षाओं को दर्शाती हैं।
Q4.4. जातक क्या है? जातकों का बौद्ध धर्म से क्या संबंध है? पता लगाइए।
उत्तर:
जातक कथाएँ बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं, जिनमें उनके जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक गुणों का वर्णन होता है। ये कथाएँ बौद्ध धर्म के शिक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं क्योंकि वे करुणा, त्याग, और धर्म के सिद्धांतों को समझाने में मदद करती हैं। जातक कथाएँ बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में सहायक रहीं और इन्हें कला और साहित्य में भी चित्रित किया गया है।
व्याख्या:
जातक कथाएँ बौद्ध धर्म के नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षाओं को सरल और प्रभावी रूप में प्रस्तुत करती हैं। ये कथाएँ बुद्ध के आदर्श चरित्र और गुणों को दर्शाती हैं, जो अनुयायियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
Q5.मौर्य कालीन कला के संदर्भ में, मौर्य साम्राज्य ने किस शताब्दी तक भारत के अधिकांश भाग पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था?
उत्तर:
ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी
व्याख्या:
मौर्य साम्राज्य ने ईसा पूर्व चौथी शताब्दी तक अपना प्रभुत्व जमाना शुरू किया और तीसरी शताब्दी तक भारत के अधिकांश भाग पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था।
Q6.मौर्य कालीन स्तंभों और एकेमिनियन स्तंभों में मुख्य अंतर क्या था?
उत्तर:
मौर्य स्तंभ एक विशाल पत्थर से कटे होते थे, जबकि एकेमिनियन स्तंभ कई टुकड़ों को जोड़कर बने होते थे।
व्याख्या:
मौर्य कालीन स्तंभ एक विशाल पत्थर से काटे गए होते थे, जिनमें कलाकार का कौशल स्पष्ट दिखता है, जबकि एकेमिनियन स्तंभ कई टुकड़ों को जोड़कर बनाए जाते थे।
Q7.सारनाथ के मौर्य कालीन स्तंभ शीर्ष में किन जानवरों की आकृतियाँ उकेरी गई हैं?
उत्तर:
शेर, साँड़, हाथी, घोड़ा
व्याख्या:
सारनाथ के सिंह शीर्ष पर चार शेरों की आकृतियाँ हैं, और निचले भाग में गतिमान मुद्रा में घोड़ा, साँड़ और हाथी उकेरे गए हैं।
Q8.मौर्य कालीन मूर्तिकला में यक्षिणी की मूर्ति के प्रमुख लक्षण क्या हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
मौर्य कालीन यक्षिणी की मूर्ति लंबी, ऊंची और सुगठित होती है। इसकी सतह चिकनी पॉलिश की हुई होती है। मूर्ति का अंगविन्यास संतुलित और समानुपातिक होता है। उदाहरण के लिए, दीदारगंज, पटना में मिली यक्षिणी मूर्ति में दाहिने हाथ में चामर पकड़े हुए दिखाया गया है और पोशाक तथा आभूषणों का चित्रण सावधानी से किया गया है।
व्याख्या:
यक्षिणी की मूर्ति में प्राकृतिक आकृति चित्रण, चिकनी सतह, संतुलित अंगविन्यास और सूक्ष्म विवरण जैसे पोशाक के मोड़ और आभूषण स्पष्ट होते हैं। दीदारगंज की मूर्ति इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
Bhartiya Kala ka parichay के सभी 8 अध्याय
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