Chapter 1
Chapter 1 — अध्ययन नोट्स
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प्रागैतिहासिक शैल-चित्र
व्याख्याप्रागैतिहासिक शैल-चित्र
प्रागैतिहासिक शैल-चित्रों का अध्ययन मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल की समझ के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रागैतिहासिक काल वह समय है जब मानव ने न तो कोई लिखित भाषा विकसित की थी और न ही कोई पुस्तकें थीं। इसलिए इस काल के बारे में जानकारी प्राप्त करना कठिन था, जब तक कि वैज्ञानिकों ने उन स्थलों को खोजा जहाँ प्रागैतिहासिक मानव रहते थे। इन स्थलों की खुदाई से प्राप्त औजार, मिट्टी के बर्तन, आवास के अवशेष और मानव तथा पशु हड्डियाँ हमें उस समय के जीवन के बारे में जानकारी देती हैं। प्रागैतिहासिक मानव ने अपने विचारों और भावनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाए। ये चित्र उनके दैनिक जीवन, शिकार, धार्मिक अनुष्ठान, नृत्य, संगीत आदि को दर्शाते हैं। इन चित्रों को देखकर हम उस समय के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जीवन की झलक पा सकते हैं। प्रागैतिहासिक काल को पुरापाषाण युग (Paleolithic Age) भी कहा जाता है, जो पत्थर के औजारों के उपयोग के लिए प्रसिद्ध है। विश्व के विभिन्न हिस्सों में उत्तर पुरापाषाण काल के शैल-चित्र पाए गए हैं, जिनमें जानवरों और मानव गतिविधियों के चित्र शामिल हैं। भारत में भी मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, बिहार, उत्तराखण्ड आदि राज्यों में प्रागैतिहासिक शैल-चित्रों के कई स्थल मिले हैं। भारत में शैल-चित्रों की खोज सबसे पहले 1867-68 में हुई थी, जो आल्तामीरा (स्पेन) की खोज से भी पहले थी। ये चित्र सफेद, लाल और काले रंगों में बनाए गए थे। इनमें मानव आकृतियाँ छड़ी जैसी सरल रेखाओं से बनी होती हैं और पशु चित्रों में विभिन्न जानवरों को दर्शाया गया है। इन चित्रों में नृत्य, शिकार, धार्मिक अनुष्ठान आदि के दृश्य भी मिलते हैं। शैल-चित्रों के अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि प्रागैतिहासिक मानव ने रंग बनाने के लिए प्राकृतिक खनिजों का उपयोग किया, जैसे लाल रंग के लिए हिरमच (गेरू), हरे रंग के लिए कैल्सेडोनी पत्थर, और सफेद रंग के लिए चूना पत्थर। रंग बनाने के लिए खनिजों को पीसकर उसमें पानी और चिपचिपे पदार्थ जैसे जानवरों की चर्बी या पेड़ का गोंद मिलाया जाता था। भीमबेटका की गुफाएँ प्रागैतिहासिक शैल-चित्रों के सबसे महत्वपूर्ण स्थलों में से एक हैं, जहाँ हजारों चित्र मिले हैं। ये चित्र विभिन्न कालों के हैं और इनमें शिकार, नृत्य, युद्ध, धार्मिक अनुष्ठान, दैनिक जीवन की गतिविधियाँ आदि दर्शाए गए हैं। इन चित्रों से हमें तत्कालीन मानव की जीवनशैली, सामाजिक संरचना और कलात्मक अभिव्यक्ति की गहरी समझ मिलती है।
- प्रागैतिहासिक काल में लिखित भाषा का अभाव था, इसलिए चित्रों से इतिहास जाना जाता है।
- शैल-चित्रों में मानव के दैनिक जीवन, शिकार, नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान दर्शाए गए हैं।
- भारत में भीमबेटका, लखुडियार, कुपगल्लू जैसे कई प्रागैतिहासिक स्थल हैं।
- रंग बनाने के लिए प्राकृतिक खनिजों का उपयोग किया गया था।
- भीमबेटका की गुफाओं में हजारों चित्र विभिन्न रंगों और विषयों में पाए गए हैं।
- प्रागैतिहासिक चित्रकला मानव की कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रारंभिक रूप है।
- 📌 प्रागैतिहासिक काल: वह काल जब मानव ने लेखन विकसित नहीं किया था।
- 📌 पुरापाषाण युग: प्रागैतिहासिक काल का वह भाग जिसमें पत्थर के औजारों का उपयोग हुआ।
- 📌 शैल-चित्र: चट्टानों या गुफाओं की दीवारों पर बनाए गए चित्र।
उत्तर पुरापाषाण युग (अपर पैलिओलिथिक पीरियड)
व्याख्याउत्तर पुरापाषाण युग (अपर पैलिओलिथिक पीरियड)
उत्तर पुरापाषाण युग प्रागैतिहासिक काल का वह चरण है जिसमें शैल-चित्रों की शुरुआत हुई। इस काल के चित्र मुख्यतः हरे और गहरे लाल रंगों में बनाए गए थे। इन चित्रों में मानव आकृतियाँ छड़ी जैसी पतली और सरल रेखाओं से बनी होती हैं, जबकि जानवरों के चित्र बड़े और विस्तृत होते हैं। प्रमुख जानवरों में भैंसे, हाथी, बाघ, गैंडे और सूअर शामिल हैं। उत्तर पुरापाषाण युग के चित्रों में शिकार के दृश्य कम मिलते हैं और ज्यामितीय आकृतियाँ भी देखी जाती हैं। हरे रंग के चित्र नर्तकों के होते हैं जबकि लाल रंग के चित्र शिकारियों के। यह काल मानव के कलात्मक विकास की शुरुआत का प्रतीक है। चित्रों में जानवरों को प्राकृतिक रूप में दिखाया गया है, जो उस समय के पर्यावरण और जीव-जंतुओं की जानकारी देते हैं। इस काल के चित्रों में रंगों के प्रयोग की तकनीक विकसित हो रही थी, और चित्रों की रचना में सजगता दिखाई देती है। ये चित्र गुफाओं की दीवारों और छतों पर बनाए गए थे, जो आज भी अपनी चमक और स्पष्टता बनाए हुए हैं। यह काल मानव के सामाजिक और सांस्कृतिक विकास की नींव रखता है।
- उत्तर पुरापाषाण युग के चित्र हरे और लाल रंगों में बनाए गए।
- मानव आकृतियाँ छड़ी जैसी पतली रेखाओं से बनी होती हैं।
- जानवरों के चित्र बड़े और विस्तृत होते हैं।
- शिकार के दृश्य कम मिलते हैं, ज्यामितीय आकृतियाँ भी पाई जाती हैं।
- हरे रंग के चित्र नर्तकों के और लाल रंग के शिकारियों के होते हैं।
- चित्रों में प्राकृतिक रंगों और तकनीकों का प्रयोग हुआ।
- 📌 उत्तर पुरापाषाण युग: प्रागैतिहासिक काल का वह भाग जिसमें शैल-चित्रों का प्रारंभ हुआ।
- 📌 धवन चित्र (wash paintings): रंगों को पतला कर चित्र बनाने की तकनीक।
मध्यपाषाण युग (मेसोलिथिक पीरियड)
व्याख्यामध्यपाषाण युग (मेसोलिथिक पीरियड)
मध्यपाषाण युग प्रागैतिहासिक काल का वह चरण है जिसमें शैल-चित्रों की संख्या और विषयों की विविधता में वृद्धि हुई। इस काल के चित्रों में शिकार के दृश्य प्रमुखता से मिलते हैं। चित्रों का आकार छोटा हो गया है, लेकिन उनमें जीवन की गतिशीलता और सामाजिक गतिविधि
अभ्यास प्रश्न — Chapter 1
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. आपके विचार से प्रागैतिहासिक काल के लोग अपने चित्रों के लिए विषयों का चयन/चुनाव किस प्रकार करते थे?
उत्तर:
प्रागैतिहासिक काल के लोग अपने चित्रों के लिए मुख्यतः अपने दैनिक जीवन, पर्यावरण, और आवश्यकताओं के आधार पर विषयों का चयन करते थे। वे अपने आस-पास के जीव-जंतुओं, शिकार, प्राकृतिक घटनाओं और सामाजिक गतिविधियों को चित्रित करते थे। यह चयन उनके जीवन के अनुभवों, धार्मिक आस्थाओं और सामाजिक आवश्यकताओं से प्रेरित था। चित्रों के माध्यम से वे अपने अनुभवों को संजोते और आने वाली पीढ़ियों को जानकारी देते थे।
व्याख्या:
प्रागैतिहासिक लोगों के चित्रों में जानवरों, शिकार, और दैनिक जीवन के दृश्य अधिक होते हैं क्योंकि ये उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा थे। वे अपने आस-पास की वस्तुओं और घटनाओं को चित्रित करते थे जो उनके लिए महत्वपूर्ण थीं। इसलिए विषयों का चयन उनके जीवन के आधार पर होता था।
Q2.2. गुफा चित्रों में मानव आकृतियों की अपेक्षा जानवरों की आकृतियाँ अधिक होने के क्या कारण रहे होंगे?
उत्तर:
गुफा चित्रों में जानवरों की आकृतियाँ अधिक होने के कई कारण हो सकते हैं। पहला, प्रागैतिहासिक लोग मुख्यतः शिकारी थे और जानवर उनके जीवन का मुख्य हिस्सा थे। वे जानवरों को शिकार के लिए पहचानना और उनका अध्ययन करना चाहते थे। दूसरा, जानवरों की आकृतियाँ धार्मिक या सांस्कृतिक महत्व रखती थीं, जैसे कि उन्हें पूजा या सम्मान देना। तीसरा, जानवरों के चित्रों के माध्यम से वे अपने अनुभवों और ज्ञान को संजोते थे। इसलिए मानव आकृतियों की तुलना में जानवरों की आकृतियाँ अधिक पाई जाती हैं।
व्याख्या:
जानवरों का चित्रण उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका को दर्शाता है। मानव आकृतियाँ कम होने का कारण यह भी हो सकता है कि वे अपनी पहचान छुपाना चाहते थे या मानव आकृतियों को चित्रित करना कठिन था।
Q3.3. इस अध्याय में प्रागैतिहासिक काल के अनेक गुफा चित्र दिए गए हैं। इनमें कौन सा चित्र आपको सबसे अधिक पसंद है और क्यों? उस चित्र का समालोचनात्मक विवेचन कीजिए।
उत्तर:
इस प्रश्न का उत्तर व्यक्तिगत पसंद पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी छात्र को भीमबेटका की गुफा चित्र सबसे अधिक पसंद हैं, तो वह कह सकता है कि ये चित्र जीवंत और विस्तृत हैं, जिनमें जानवरों और मानवों के जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाया गया है। समालोचनात्मक विवेचन में चित्र की शैली, रंगों का प्रयोग, विषय वस्तु, और चित्रों के माध्यम से प्रागैतिहासिक जीवन की झलक पर चर्चा की जा सकती है। चित्रों की तकनीक, उनकी सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता पर भी विचार किया जा सकता है।
व्याख्या:
यह प्रश्न रचनात्मक सोच और विश्लेषण की क्षमता को परखता है। छात्र को चित्रों का अवलोकन कर उनकी विशेषताओं को समझना और अपने विचार प्रस्तुत करना होता है।
Q4.4. भीमबेटका के अलावा और कौन-से प्रमुख स्थल हैं जहाँ से प्रागैतिहासिक चित्र पाए गए हैं? इन चित्रों के भिन्न-भिन्न पहलुओं पर इनकी तस्वीरों या रेखाचित्रों के साथ, एक रिपोर्ट तैयार करें।
उत्तर:
भीमबेटका के अलावा भारत में कई अन्य प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थल हैं जहाँ गुफा चित्र पाए गए हैं, जैसे भिमाशंकर (महाराष्ट्र), अजन्ता और एलोरा (महाराष्ट्र), मढ़िया (मध्य प्रदेश), और कर्नाटक के कुछ स्थल। इन चित्रों में जानवरों, मानव आकृतियों, शिकार के दृश्य, और धार्मिक प्रतीक शामिल हैं। रिपोर्ट में इन चित्रों के विषय, रंगों का प्रयोग, चित्रण की तकनीक, और उनकी सामाजिक-धार्मिक महत्ता पर चर्चा की जा सकती है। तस्वीरों या रेखाचित्रों के माध्यम से इन चित्रों की विशेषताओं को समझाया जा सकता है।
व्याख्या:
यह प्रश्न शोध और प्रस्तुति कौशल को बढ़ावा देता है। छात्र को विभिन्न स्थलों के चित्रों का अध्ययन कर उनकी तुलना करनी होती है और एक व्यवस्थित रिपोर्ट बनानी होती है।
Q5.5. आज के समय में चित्र, ग्राफिक आदि बनाने के लिए दीवारों का सतह के रूप में किस प्रकार उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
आज के समय में दीवारों का उपयोग चित्र, ग्राफिक, और अन्य कलात्मक अभिव्यक्तियों के लिए व्यापक रूप से किया जाता है। दीवारों पर भित्ति चित्र (म्यूरल), ग्रैफिटी, और डिजिटल प्रोजेक्शन के माध्यम से कला प्रस्तुत की जाती है। ये चित्र सामाजिक संदेश, सजावट, और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए बनाए जाते हैं। तकनीकी उन्नति के कारण दीवारों पर स्थायी और अस्थायी दोनों प्रकार के चित्र बनाए जा सकते हैं, जो सार्वजनिक स्थानों को सजाने और लोगों को जागरूक करने में सहायक होते हैं।
व्याख्या:
दीवारों का सतह के रूप में उपयोग कला के विभिन्न रूपों को प्रदर्शित करने का एक प्रभावी माध्यम है। यह सार्वजनिक कला और सांस्कृतिक संवाद का हिस्सा बन चुका है।
Q6.प्रागैतिहासिक काल (Pre-history) को किस प्रकार परिभाषित किया जाता है?
उत्तर:
वह काल जिसमें न तो कोई पुस्तक थी और न कोई लिखित भाषा
व्याख्या:
प्रागैतिहासिक काल वह समय है जब मनुष्यों के पास न तो कोई लिखित भाषा थी और न कोई पुस्तकें उपलब्ध थीं। इसलिए इस काल के बारे में जानकारी मुख्यतः गुफाओं की दीवारों पर बने चित्रों और अन्य अवशेषों से प्राप्त होती है।
Q7.प्रागैतिहासिक मानव ने गुफाओं की दीवारों पर चित्र क्यों बनाए? निम्नलिखित में से सबसे उपयुक्त कारण क्या हो सकता है?
उत्तर:
अपने रोजमर्रा के जीवन का दृश्य-अभिलेख रखने के लिए
व्याख्या:
प्रागैतिहासिक मानव ने गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाकर अपने भावों, विचारों और दैनिक जीवन के दृश्यों को अभिव्यक्त किया। ये चित्र उनके जीवन, शिकार, नृत्य, धार्मिक अनुष्ठान आदि का अभिलेख थे।
Q8.भारत में प्रागैतिहासिक शैल-चित्रों की सर्वप्रथम खोज कब हुई थी?
उत्तर:
1867-68
व्याख्या:
भारत में प्रागैतिहासिक शैल-चित्रों की सर्वप्रथम खोज वर्ष 1867-68 में हुई थी, जो स्पेन में आल्तामीरा की खोज से 12 वर्ष पहले की थी।
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