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Chapter 8

🎓 Class 12📖 Shaswati📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
Chapter 7अध्याय 8 / 11Chapter 9

Chapter 8अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

व्याख्या

कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्

यह पाठ संस्कृत के प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यास 'शिवराजविजयम्' के प्रथम विराम के चतुर्थ निःश्वास से संकलित है, जिसका रचयिता अभिकादत्तव्यास हैं। अभिकादत्तव्यास संस्कृत एवं हिन्दी दोनों भाषाओं में शताधिक ग्रंथों के रचयिता थे। उनकी कृतियों में कल्पनाशक्ति और पात्रों के चरित्रों में उच्च आदर्शों का समावेश विद्वानों को आकर्षित करता है। इस पाठ में वीर, विश्वासपात्र, कर्मठ और दृढ़संकल्प वाले व्यक्ति की छवि प्रस्तुत की गई है, जो मानवीय और प्राकृतिक बाधाओं के बावजूद अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संकल्पित रहता है। शिवाजी के विश्वासपात्र गुप्तचर की यात्रा का वर्णन है, जो सिंहदुर्ग से पत्र लेकर तोरणदुर्ग जाता है। रास्ते में अनेक भीषण प्राकृतिक बाधाएँ आती हैं जैसे झंझावात, पाषाण-पात, प्रपात और अंधकार, परन्तु वह विचलित नहीं होता। उसका निश्चय है कि या तो कार्य सिद्ध होगा या देह त्याग दी जाएगी। इस दृढ़संकल्पिता का भाव 'कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्' में संक्षेपित है। पाठ की शुरुआत आषाढ़ मास के सायंकाल से होती है, जब सूर्य अस्ताचलगमन के लिए जा रहा होता है। वातावरण में सिन्दूर के रंग के बादल होते हैं जो वरुण (पश्चिम दिशा के देवता) के दिगवलम्बी हैं। पक्षी अपने घोंसलों में लौट रहे हैं। वन श्यामिमा से भर रहे हैं। अचानक मेघमाला पर्वतश्रेणी के ऊपर प्रकट होती है, जो भयानक आकृतियों से युक्त है। ऐसे वातावरण में एक लगभग षोडशवर्षीय युवा, सुघटित और दृढ़ शरीर वाला, घोड़े पर सवार होकर पर्वतश्रेणी के ऊपर से यात्रा कर रहा है। उसका शरीर पसीने की बूँदों से भीगा हुआ है, उसके गाल सुंदर हैं, माथा, नाक और ओंठ पसीने से भीगे हुए हैं। वह राजतसूत्र से बनी हरी पगड़ी पहने हुए है। यह युवक शिवाजी का विश्वासपात्र है जो अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पित है। यात्रा के दौरान तेज झंझावात उठता है, धूल, सूखे पत्ते और पराग उड़ते हैं, गहरे अंधकार में घिरा वातावरण भयावह हो जाता है। पर्वतश्रेणियों के बीच रास्ते कठिन और खतरनाक हैं। घोड़े के खुर पत्थरों पर फिसलते हैं, वृक्ष शाखाएँ रास्ते में आती हैं, परन्तु युवक अपने दृढ़संकल्प से विचलित नहीं होता। वह बार-बार कहता है, 'कार्यं वा साधयेयम्, देहं वा पातयेयम्' अर्थात् कार्य सिद्ध करूँगा या प्राण त्याग दूँगा। इस प्रकार पाठ में नायक की वीरता, दृढ़संकल्प और कर्मठता का चित्रण किया गया है, जो प्राकृतिक बाधाओं को भी परास्त कर अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहता है। यह पाठ विद्यार्थियों को जीवन में कठिनाइयों के सामने हार न मानने और अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है।

  • पाठ 'शिवराजविजयम्' के प्रथम विराम के चतुर्थ निःश्वास से संकलित है।
  • रचयिता अभिकादत्तव्यास संस्कृत एवं हिन्दी के प्रख्यात लेखक हैं।
  • पाठ में वीरता, दृढ़संकल्प और कर्मठता का महत्त्व दर्शाया गया है।
  • युवा गुप्तचर सिंहदुर्ग से तोरणदुर्ग पत्र लेकर जाता है।
  • प्राकृतिक बाधाएँ जैसे झंझावात, पाषाण-पात, प्रपात आदि आते हैं।
  • नायक का निश्चय है: कार्य सिद्ध करूँगा या देह त्याग दूँगा।
  • 📌 अभिकादत्तव्यास: संस्कृत एवं हिन्दी के प्रख्यात लेखक, 'शिवराजविजयम्' के रचयिता।
  • 📌 गुप्तचर: विश्वासपात्र दूत जो गुप्त सूचना या पत्रवाहक होता है।
  • 📌 झंझावात: तेज हवा या तूफान।

मासोऽयमाषाढः, अस्ति च सायं समयः

व्याख्या

मासोऽयमाषाढः, अस्ति च सायं समयः

इस अनुभाग में आषाढ़ मास के सायंकाल का विस्तृत वर्णन है। आषाढ़ मास भारतीय पंचांग के अनुसार वर्षा ऋतु का प्रारंभिक महीना होता है, जो प्रकृति में परिवर्तन का संकेत देता है। सूर्य अस्ताचलगमन के लिए जा रहा है, अर्थात् दिन समाप्त हो रहा है और शाम का समय है। आसमान में सिन्दूर के रंग के बादल हैं, जो वरुण देवता के दिगवलम्बी हैं। वरुण देवता पश्चिम दिशा के अधिपति माने जाते हैं, इसलिए बादलों का रंग और उनका फैलाव पश्चिम दिशा की ओर है। यह वर्णन वातावरण की रंगत और दिशा का सूक्ष्म चित्रण करता है। कलविङ्क (गौरैया के बच्चे) चाटक (छोटे पक्षी) अपने घोंसलों में लौट रहे हैं। यह पक्षियों के जीवन चक्र और प्राकृतिक नियमों का संकेत है। वन प्रतिक्षण अधिकाधिक श्यामिमा (अंधकार) से भर रहे हैं, जो दिन के समाप्त होने का प्रतीक है। अचानक मेघमाला पर्वतश्रेणी के ऊपर प्रकट होती है। यह मेघमाला लम्बी सूंडों जैसी आकृतियों से युक्त है, जो दिगन्त-दन्तावल के समान भयानक दिखती है। यह बादलों की भीषणता और वातावरण की गंभीरता को दर्शाता है। मेघमाला ने पूरे गगनतल को घेर लिया है, जिससे वातावरण और भी भयावह हो गया है। यह प्राकृतिक वातावरण नायक की यात्रा के लिए चुनौतीपूर्ण है। पाठ में यह सूक्ष्म प्राकृतिक चित्रण नायक के साहस और दृढ़संकल्प को और भी प्रभावशाली बनाता है।

  • आषाढ़ मास के सायंकाल का वर्णन है, जब सूर्य अस्ताचलगमन कर रहा है।
  • सिन्दूर के रंग के बादल वरुण देवता के दिगवलम्बी हैं।
  • पक्षी अपने घोंसलों में लौट रहे हैं।
  • वन श्यामिमा से भर रहे हैं, दिन समाप्त हो रहा है।
  • मेघमाला पर्वतश्रेणी के ऊपर प्रकट होती है, जो भयानक आकृतियों से युक्त है।
  • मेघमाला ने पूरे गगनतल को घेर लिया है।
  • 📌 आषाढ़: वर्षा ऋतु का महीना।
  • 📌 सिन्दूरद्रवस्नातानाम्: सिन्दूर के रंग से रंगे हुए बादल।
  • 📌 वरुणदिगवलम्बिनाम्: पश्चिम दिशा के देवता वरुण के दिगवलम्बी बादल।

नायक का परिचय एवं उसकी दृढ़संकल्पिता

व्याख्या

नायक का परिचय एवं उसकी दृढ़संकल्पिता

इस भाग में नायक का विस्तृत परिचय दिया गया है। नायक लगभग षोडशवर्षीय युवा है, जिसका शरीर सुघटित और दृढ़ है। उसके बाल श्याम-श्याम हैं, जो गुच्छों में कुञ्चित हैं। उसके गाल सुंदर और आकर्षक हैं। ललाट, कपोल, नासिका का अग्रभाग तथा ओंठ पसीने की बूँदों से भीग

अभ्यास प्रश्नChapter 8

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. संस्कृतेन उत्तरं दीयताम् । - (क) सायं समये भगवान् भास्कर: कुत्र जिगमिषु: भवति? - (ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्ण: कीदृश: भवति? - (ग) नीडेषु के प्रतिनिवर्तन्ते? - (घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं किं स्थानं प्रयाति स्म? - (ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिकां श्यामतां कानि कलयन्ति? - (च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषं कीदृशमासीत्? - (छ) मेघमाला कथं शोभते?

उत्तर:

उत्तर: (क) सायं समये भगवान् भास्कर: नीडेषु जिगमिषु: भवति। (ख) अस्ताचलगमनकाले भास्करस्य वर्ण: लालवर्ण: भवति। (ग) नीडेषु पक्षिणः प्रतिनिवर्तन्ते। (घ) शिववीरस्य विश्वासपात्रं तोरणदुर्गं प्रयाति स्म। (ङ) प्रतिक्षणमधिकाधिकां श्यामतां मेघमाला कलयन्ति। (च) शिववीरविश्वासपात्रस्य उष्णीषं हरितोष्णीषशोभितम् आसीत्। (छ) मेघमाला आकाशे झन्झावातेन सह शोभते।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का संस्कृत पाठ्यांश के अनुसार उत्तर दिया गया है। जैसे कि सायं समये भगवान् भास्कर: नीडेषु जिगमिषु: होते हैं, जो पाठ में वर्णित है। इसी प्रकार अन्य प्रश्नों के उत्तर भी पाठ के अनुसार दिए गए हैं।

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Q2.2. समीचीनोत्तरसङ्ख्यां कोष्ठके लिखत । अ. शिवराजविजयस्य रचयिता क: अस्ति? ( ) (क) बाणभट्टः (ख) श्रीहर्षः (ग) अम्बिकादत्तव्यासः (घ) माघः आ. कतिवर्षदेशीयो युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म । ( ) (क) चतुर्दशवर्षदेशीयः (ख) द्वादशवर्षदेशीयः (ग) पञ्चदशवर्षदेशीयः (घ) षोडशवर्षदेशीयः इ. शिववीरस्य विश्वासपात्रं किम् आदाय तोरणदुर्गं प्रयाति ?( ) (क) संवादम् आदाय (ख) पत्रम् आदाय (ग) पुष्पगुच्छम् आदाय (घ) अश्वम् आदाय
A.(क) बाणभट्टः
B.(ख) श्रीहर्षः
C.(ग) अम्बिकादत्तव्यासः
D.(घ) माघः

उत्तर:

उत्तर: अ. शिवराजविजयस्य रचयिता बाणभट्टः अस्ति। अतः विकल्प (क) सही है। आ. युवा हयेन पर्वतश्रेणीरुपर्युपरि गच्छति स्म द्वादशवर्षदेशीयः। अतः विकल्प (ख) सही है। इ. शिववीरस्य विश्वासपात्रं पत्रम् आदाय तोरणदुर्गं प्रयाति। अतः विकल्प (ख) सही है।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न के लिए पाठ्यांश के अनुसार सही विकल्प चुना गया है। शिवराजविजय के रचयिता के रूप में बाणभट्टः प्रसिद्ध हैं। युवा की आयु द्वादश वर्षदेशीय बताई गई है। विश्वासपात्रं पत्रम् आदाय तोरणदुर्गं प्रयाण करता है।

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Q3.3. रिक्तस्थानानि पूर्यत । (क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला ... प्रादुरभूत्। (ख) क्षणे क्षणे ... खुराशिचक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्थलन्ति। (ग) पदे पदे ... वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति। (घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ ... निजकार्यात्र विरमति।

उत्तर:

उत्तर: (क) अथाकस्मात् परितो मेघमाला प्रादुरभूत्। (ख) क्षणे क्षणे झन्झावातः खुराशिचक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्थलन्ति। (ग) पदे पदे पक्षिणः वृक्षशाखाः सम्मुखमाघ्नन्ति। (घ) कृतप्रतिज्ञोऽसौ वीरः निजकार्यात्र विरमति।

व्याख्या:

रिक्तस्थानों में पाठ के अनुसार उपयुक्त शब्द भरे गए हैं। जैसे (ख) में 'झन्झावातः' उपयुक्त है क्योंकि वह खुराशिचक्कणपाषाणखण्डेषु प्रस्थलन्ति। इसी प्रकार अन्य रिक्त स्थानों को भी पाठ के अनुसार पूरा किया गया है।

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Q4.4. अधोलिखितानां पदानाम् अर्थान् विलिख्य वाक्येषु प्रयुञ्जत । भास्करः, मेघमाला, वनानि, मार्गः, वीरः, गगनतलम्, झन्झावातः, मासः, सायम्।

उत्तर:

उत्तर: 1. भास्करः - सूर्यः। 2. मेघमाला - बादल की माला। 3. वनानि - जंगल। 4. मार्गः - रास्ता। 5. वीरः - बहादुर पुरुष। 6. गगनतलम् - आकाश की सतह। 7. झन्झावातः - तेज़ हवा या तूफ़ान। 8. मासः - महीना। 9. सायम् - शाम। वाक्य उदाहरण: - भास्करः आकाशे तेजस्वी प्रकाशं ददाति। - मेघमाला आकाशे घनघोर रूपेण शोभते। - वनानि अनेकप्रकारस्य जीवजंतूनां निवासस्थानम्। - मार्गः पर्वतश्रेणीनां मध्ये अस्ति। - वीरः युद्धे साहसं दर्शयति। - गगनतलम् नीलवर्णेन आच्छादितम् अस्ति। - झन्झावातः वृक्षान् कम्पयति। - मासः वर्षस्य एकः भागः। - सायम् दिनस्य अन्त्यकालः अस्ति।

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द का अर्थ स्पष्ट किया गया और उसके आधार पर वाक्य बनाए गए हैं ताकि शब्दों का प्रयोग स्पष्ट हो सके।

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Q5.5. अधोलिखितानां पदानां सन्धिविच्छेदं कृत्वा सन्धिनिर्देशं कुरुत । तस्यैव, शिखराच्छिखराणि, कोऽपि, प्रादुरभूत्, अथाकस्मात्, कार्यात्र।

उत्तर:

उत्तर: 1. तस्यैव = तस्य + एव (समास) 2. शिखराच्छिखराणि = शिखरात् + शिखराणि (समास) 3. कोऽपि = कः + अपि (समास) 4. प्रादुरभूत् = प्र + उद् + भू (धातु + उपसर्ग + धातु) 5. अथाकस्मात् = अथ + अकस्मात् (समास) 6. कार्यात्र = कार्य + त्र (समास) सन्धिनिर्देश: - तस्यैव में 'एव' उपसर्ग है जो 'तस्य' से जुड़ा है। - शिखराच्छिखराणि में 'आच्छ' सन्धि से बना है। - कोऽपि में 'ऽ' अवग्रह चिह्न है जो 'कः' और 'अपि' को जोड़ता है। - प्रादुरभूत् में 'प्र' उपसर्ग है और 'उद्' धातु का भाग है। - अथाकस्मात् में 'अकस्मात्' एक शब्द है जो 'अकस्मात्' से बना है। - कार्यात्र में 'त्र' उपसर्ग है जो 'कार्य' से जुड़ा है।

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द का सन्धिविच्छेद किया गया और सन्धि के प्रकार को समझाया गया। अवग्रह चिह्न और उपसर्गों की पहचान की गई।

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Q6.6. अधोलिखितानां पदानां प्रकृतिप्रत्ययविभागं प्रदर्शयत । प्रयुक्त:, उत्थित:, उत्प्लुत्य, रुतै:, उपत्यकात:, उत्थित:, ग्रस्यमान:।

उत्तर:

उत्तर: 1. प्रयुक्त: = प्र + युज् + क्त (धातु + प्रत्यय) 2. उत्थित: = उत् + स्था + इत् (उपसर्ग + धातु + प्रत्यय) 3. उत्प्लुत्य = उत् + प्लु + त्य (उपसर्ग + धातु + प्रत्यय) 4. रुतै: = रु + तै: (धातु + प्रत्यय) 5. उपत्यकात: = उप + त्यक + आत् (उपसर्ग + धातु + प्रत्यय) 6. उत्थित: = उत् + स्था + इत् (उपसर्ग + धातु + प्रत्यय) 7. ग्रस्यमान: = ग्रस् + य + मान (धातु + प्रत्यय + वर्तमान काल)

व्याख्या:

प्रत्येक पद को उसके मूल धातु और प्रत्ययों में विभाजित किया गया है। उपसर्गों की पहचान की गई है और प्रत्ययों के प्रकार बताए गए हैं।

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Q7.7. अलङ्कारनिर्देशं कुरुत । (1) वदनाम्भोजेन (2) दिगन्तदन्तावल: (3) सिन्दूरद्रवस्नातानामिव वरुणदिगवलम्बिनाम्

उत्तर:

उत्तर: (1) वदनाम्भोजेन - यह उपमा अलंकार है क्योंकि इसमें वदनम् (मुख) की तुलना अम्भोज (कमल) से की गई है। अतः यह उपमा अलंकार है। (2) दिगन्तदन्तावल: - यह यमक अलंकार है क्योंकि 'दन्तावल:' शब्द में दो बार 'दन्त' शब्द का प्रयोग हुआ है। (3) सिन्दूरद्रवस्नातानामिव वरुणदिगवलम्बिनाम् - यह उपमा अलंकार है क्योंकि 'सिन्दूरद्रवस्नातानामिव' में 'सिन्दूर' के समान 'वरुण' की तुलना की गई है।

व्याख्या:

प्रत्येक वाक्य में प्रयुक्त अलंकार की पहचान की गई है। उपमा अलंकार में तुलना होती है, यमक अलंकार में शब्दों का पुनरावृत्ति।

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Q8.8. विग्रहवाक्यं विलिख्य समासनामानि निर्दिशत । मेघमाला, महाभ्कार:, पर्वतश्रेणी:, महोत्साह:, विश्वासपात्रम्, हरितोष्णीषशोभित:।

उत्तर:

उत्तर: 1. मेघमाला - मेघानामालिका (मेघ + माला) 2. महाभ्कार: - महा + भ्कार: (महान् भास्कर) 3. पर्वतश्रेणी: - पर्वत + श्रेणी 4. महोत्साह: - महा + उत्साह 5. विश्वासपात्रम् - विश्वास + पात्रम् 6. हरितोष्णीषशोभित: - हरित + उष्णीष + शोभित विग्रहवाक्य: - मेघमाला आकाशे शोभते। - महाभ्कार: तेजस्वी सूर्यः अस्ति। - पर्वतश्रेणी पर्वतों की श्रृंखला है। - महोत्साह: वीर का गुण है। - विश्वासपात्रम् वह व्यक्ति है जिस पर भरोसा किया जाता है। - हरितोष्णीषशोभित: वस्त्र हरित रंग के और उष्णीष से शोभित हैं।

व्याख्या:

प्रत्येक समास को उसके घटकों में विभाजित किया गया और उसके अर्थ सहित वाक्य बनाए गए।

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