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Chapter 11

🎓 Class 12📖 Shaswati📖 9 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~14 मिनट
Chapter 10अध्याय 11 / 11

Chapter 11अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम्

व्याख्या

कथं शब्दानुशासनं कर्तव्यम्

यह पाठ महर्षि पतञ्जलि के महाभाष्य से लिया गया है, जिसमें शब्दों के अनुशासन का वर्णन है। यहाँ प्रश्न उठता है कि शब्दोपदेश अर्थात् शब्दों का उपदेश किस प्रकार किया जाना चाहिए? केवल शब्दों का उपदेश करना चाहिए या अपशब्दों का भी? अथवा दोनों का? पाठ में इस प्रश्न का समाधान पौराणिक आख्यान के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। शब्दानुशासन का तात्पर्य है शब्दों का नियमबद्ध और अनुशासित रूप से अध्ययन और उपदेश। महाभाष्य में कहा गया है कि शब्दोपदेश केवल शब्दों का होना चाहिए, अपशब्दोपदेश न किया जाए। उदाहरण स्वरूप, 'पञ्च पञ्चनखा भक्ष्या:' कहने पर यह समझ आता है कि ये पाँच प्रकार के खाद्य पदार्थ हैं, अतः अन्य वस्तुएं अभक्ष्या (खाद्य नहीं) मानी जाती हैं। इसी प्रकार अभक्ष्यप्रतिषेध से भक्ष्यनियम स्थापित होता है। यदि अपशब्दोपदेश किया जाए तो अपशब्दों को भी समझाना होगा, जैसे गौरित्य शब्द के अपभ्रंश गावी, गोणी आदि। अतः शब्दोपदेश में लघुत्व (संक्षिप्तता) और गरीयता (उच्चता) दोनों का ध्यान रखा जाना चाहिए। प्रत्येक शब्द के अनेक अपभ्रंश हो सकते हैं, जिन्हें भी समझाना आवश्यक है। इस प्रकार शब्दानुशासन में शब्दों के सही अर्थ, उनके अपभ्रंश, और उनके उपयोग का स्पष्ट विवेचन होता है।

  • शब्दानुशासन का अर्थ है शब्दों का अनुशासित अध्ययन और उपदेश।
  • महाभाष्य में शब्दोपदेश के प्रकारों पर विचार किया गया है।
  • शब्दोपदेश में केवल शब्दों का उपदेश या अपशब्दों का भी उपदेश किया जा सकता है।
  • अभक्ष्यप्रतिषेध से भक्ष्यनियम स्थापित होता है।
  • शब्दों के अपभ्रंशों का भी अध्ययन आवश्यक है।
  • शब्दोपदेश में लघुत्व और गरीयता का ध्यान रखा जाता है।
  • 📌 शब्दानुशासन: शब्दों का अनुशासित अध्ययन।
  • 📌 शब्दोपदेशः: शब्दों का उपदेश।
  • 📌 अपशब्दः: विकृत या गलत शब्द।

शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः कर्तव्यः

व्याख्या

शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठः कर्तव्यः

इस अनुभाग में यह चर्चा की गई है कि शब्दों की सही समझ के लिए क्या प्रत्येक शब्द को अलग-अलग पढ़ना (प्रतिपदपाठ) आवश्यक है? उदाहरण स्वरूप, पुरुषः, हस्ती, शकुनिः, मृगः, ब्राह्मण इत्यादि शब्दों को अलग-अलग पढ़ना चाहिए या नहीं। पाठ में स्पष्ट किया गया है कि केवल शब्दों को अलग-अलग पढ़ना पर्याप्त नहीं है। शब्दों की गहन समझ के लिए प्रतिपदपाठ आवश्यक है, परन्तु यह भी कहा गया है कि यह एकमात्र उपाय नहीं है। बृहस्पति ने इन्द्र को दिव्य वर्षसहस्रकाल तक प्रतिपदशब्दों का पारायण (पढ़ना) कराया, जिससे शब्दों की गहन समझ हुई। इसके अतिरिक्त, जो व्यक्ति दीर्घायु होता है, वह चार प्रकार के भिक्ष (अधिग्रहण) से विद्या प्राप्त करता है - आगमकाल, स्वाध्यायकाल, प्रवचनकाल, और व्यवहारकाल। इनमें से आगमकाल का अध्ययन सबसे उपयुक्त माना गया है। अतः शब्दों की समझ के लिए प्रतिपदपाठ के साथ-साथ अन्य विधियों का भी सहारा लेना चाहिए। शब्दों की प्रतिपत्ति के लिए सामान्य और विशेष लक्षणों का अध्ययन आवश्यक है, जिससे शब्दों के विशाल समूहों को कम से कम शब्दों में समझा जा सके। **Table on page 2 (8×3)** | इदानीम् | - | अधुना, अब। | | --- | --- | --- | | कर्तव्यम् | - | कुर्यात्, करना चाहिए। | | शब्दोपदेशः | - | शब्दकथनम्, शब्द कथन। | | अपशब्द | - | अपकथनम्, अपशब्द कथन। | | अन्यतरः | - | एकतरः, एक | | भक्ष्यम् | - | खादनीयम्, खाने योग्य। | | उक्ते | - | कथिते, कहने पर। | | आरण्यः | - | वन्यः, वन के। |

  • शब्दों की गहन समझ के लिए प्रतिपदपाठ आवश्यक है।
  • बृहस्पति ने इन्द्र को वर्षों तक शब्दों का पारायण कराया।
  • विद्या प्राप्ति के चार प्रकार हैं: आगमकाल, स्वाध्यायकाल, प्रवचनकाल, व्यवहारकाल।
  • आगमकाल का अध्ययन सबसे उपयुक्त माना गया है।
  • शब्दों की प्रतिपत्ति के लिए सामान्य और विशेष लक्षणों का अध्ययन आवश्यक है।
  • 📌 प्रतिपदपाठः: प्रत्येक शब्द को अलग-अलग पढ़ना।
  • 📌 विद्या: ज्ञान।
  • 📌 आगमकाल: ज्ञान प्राप्ति का समय।

शब्दानां अपभ्रंशः तथा अपशब्दोपदेशः

व्याख्या

शब्दानां अपभ्रंशः तथा अपशब्दोपदेशः

इस भाग में शब्दों के अपभ्रंशों का विवेचन किया गया है। अपभ्रंश का अर्थ है शब्दों का विकृत या परिवर्तित रूप, जो सामान्य बोलचाल में उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए 'गौरित्य' शब्द के अनेक अपभ्रंश हैं जैसे- गावी, गोणी, गोता, गोपोतलिका आदि। यदि केवल शब्दोप

अभ्यास प्रश्नChapter 11

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.1. संस्कृतभाषायाम् उत्तरत । (क) मनुष्यस्य आयु: कति वर्षाणि मन्यते? (ख) कस्य नियमेन अभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते? (ग) गाम्यकुक्कुट: भक्ष्य: अभक्ष्य: वा? (घ) क: ज्याय: अस्ति? (ङ) क: गरीयान् अस्ति?

उत्तर:

उत्तर: (क) मनुष्यस्य आयु: शतवर्षाणि मन्यते। (ख) नियमेन अभक्ष्यप्रतिषेधो गम्यते। अर्थात् नियम के अनुसार अभक्ष्य (जो न खाया जाना चाहिए) का प्रतिबंध होता है। (ग) गाम्यकुक्कुट: भक्ष्य: न अभक्ष्य:। अर्थात् गाम्यकुक्कुट भक्ष्य (खाने योग्य) है, अभक्ष्य (न खाने योग्य) नहीं। (घ) ज्याय: वह है जो अधिक है। (ङ) गरीयान् वह है जो अधिक नीच या खराब है।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का संस्कृत भाषा के नियमों और अर्थ के अनुसार उत्तर दिया गया है। आयु का सामान्य मान शतवर्ष है। अभक्ष्यप्रतिषेध नियम के अनुसार होता है। गाम्यकुक्कुट भक्ष्य है क्योंकि वह खाने योग्य है। ज्याय: और गरीयान् शब्दों का अर्थ क्रमश: अधिक और नीच होता है।

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Q2.2. रेखाद्भितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत । (क) एकैकस्य शब्दस्य बहव: अपभ्रंश: सन्ति। (ख) शब्दानां प्रतिपत्तौ प्रतिपदपाठ: कर्तव्य:। (ग) बृहस्पति: इन्द्राय प्रतिपदशब्दान् उक्तवान्। (घ) चतुर्भिश्च प्रकारैविंद्योपयुक्ता भवति। (ङ) सामान्येन उत्सर्ग: कर्तव्य:।

उत्तर:

प्रश्ननिर्माण: (क) एकैकस्य शब्दस्य बहव: अपभ्रंश: किमस्ति? (ख) शब्दानां प्रतिपत्तौ किम् कर्तव्यं? (ग) बृहस्पति: कस्य प्रति प्रतिपदशब्दान् उक्तवान्? (घ) चतुर्भिश्च प्रकारैविंद्योपयुक्ता कथम् भवति? (ङ) सामान्येन उत्सर्ग: कथम् कर्तव्य:?

व्याख्या:

प्रत्येक वाक्य से प्रश्न बनाना है, जो विषय की समझ को बढ़ाता है। उदाहरण स्वरूप, (क) में अपभ्रंश के विषय में पूछा गया है।

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Q3.3 विपरीतार्थ: सह मेलनं कुरुत । (क) भक्ष्यम् - तदानीम् (ख) लघीयान् - अनिष्टान् (ग) एक: - अभक्ष्यम् (घ) इष्टान् - गरीयान् (ङ) इदानीम् - बहव:

उत्तर:

उत्तर: (क) भक्ष्यम् - अभक्ष्यम् (ख) लघीयान् - गरीयान् (ग) एक: - बहव: (घ) इष्टान् - अनिष्टान् (ङ) इदानीम् - तदानीम् व्याख्या: विपरीतार्थ शब्दों को मेल करना है। जैसे भक्ष्यम् (खाने योग्य) का विपरीत अभक्ष्यम् (न खाने योग्य) है।

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द का विपरीतार्थ ज्ञात कर मेल किया गया है। यह अभ्यास शब्दार्थ की समझ को बढ़ाता है।

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Q4.4. अधोलिखितवाक्यानि पठित्वा शुद्धं अशुद्धं वा समक्षं लिखत । (क) अन्यतरोपदेशेन कृतं स्यात्। (ख) इष्टान्वाख्यानं खल्वपि भवति। (ग) य: सर्वथा चिरं जीवति वर्षशतं न जीवति। (घ) चतुर्भिश्च प्रकारैविंद्योपयुक्ता न भवति। (ङ) आगमकालेनैवायु: कृत्स्नं पर्युपयुक्तं स्यात्।
A.शुद्ध
B.अशुद्ध

उत्तर:

उत्तर: (क) अशुद्ध (ख) शुद्ध (ग) अशुद्ध (घ) अशुद्ध (ङ) शुद्ध व्याख्या: प्रत्येक वाक्य का व्याकरण और अर्थ के अनुसार परीक्षण कर शुद्ध अथवा अशुद्ध लिखा गया है।

व्याख्या:

प्रत्येक वाक्य के व्याकरण और तर्क के आधार पर शुद्धता या अशुद्धता निर्धारित की गई है।

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Q5.5. शब्दानाम् अर्थं लिखित्वा वाक्येषु प्रयोगं कुरुत । (क) शब्दानुशासनम् - (ख) भक्ष्यम् - (ग) इदानीम् - (घ) चिरम् - (ङ) प्रवक्ता - (च) कृत्स्नम् -

उत्तर:

उत्तर: (क) शब्दानुशासनम् - शब्दों का अनुशासन या नियम। उदाहरण: व्याकरणं शब्दानुशासनं नाम। (ख) भक्ष्यम् - खाने योग्य। उदाहरण: गाम्यकुक्कुट: भक्ष्यम् अस्ति। (ग) इदानीम् - अभी, इस समय। उदाहरण: इदानीम् पाठः आरभते। (घ) चिरम् - दीर्घकाल तक। उदाहरण: सः चिरं जीवति। (ङ) प्रवक्ता - जो बोलता है। उदाहरण: शिक्षकः प्रवक्ता अस्ति। (च) कृत्स्नम् - सम्पूर्ण, पूरा। उदाहरण: कृत्स्नं ग्रन्थं पठ।

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द का अर्थ स्पष्ट कर वाक्य में प्रयोग किया गया है जिससे अर्थ और प्रयोग दोनों स्पष्ट हों।

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Q6.6. रिक्तस्थानानि पूर्यत । प्रतिपदपाठ: कर्तव्य:, शब्दोपदेश:, अपभ्रंश:, अपशब्दोपदेश:, अभक्ष्यप्रतिषेध:, शब्दानुशासनम् (क) इदानोँ कर्तव्यम्। (ख) भक्ष्यनियमेन गम्यते। (ग) गरीयान् (घ) एकैकस्य शब्दस्य बहव: भवन्ति। (ङ) लघुत्वात् (च) शब्दोपदेशे सति शब्दानां प्रतिपत्तै

उत्तर:

उत्तर: (क) प्रतिपदपाठ: कर्तव्यम्। (ख) अभक्ष्यप्रतिषेध: नियमेन गम्यते। (ग) गरीयान् अपशब्दोपदेश:। (घ) एकैकस्य शब्दस्य बहव: अपभ्रंश: भवन्ति। (ङ) लघुत्वात् शब्दानुशासनम्। (च) शब्दोपदेशे सति शब्दानां प्रतिपत्तिः कर्तव्य:।

व्याख्या:

रिक्त स्थानों में उपयुक्त शब्दों को भरकर वाक्य पूर्ण किए गए हैं, जो व्याकरण के नियमों के अनुसार सही हैं।

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Q7.7. उदाहरणानुसारं लिखत । यथा कर्तव्य: कृ+तव्यत् (क) भक्ष्य: - ______________________ (ख) उक्त: - ______________________ (ग) कृतम् - ______________________ (घ) उपयुक्ता - ______________________ (ङ) उपदिष्ट: - ______________________

उत्तर:

उत्तर: (क) भक्ष्य: - भक्ष्यतव्यः (ख) उक्त: - उक्तव्यः (ग) कृतम् - कृतव्यं (घ) उपयुक्ता - उपयुक्तव्याः (ङ) उपदिष्ट: - उपदिष्टव्यः व्याख्या: उदाहरणानुसार कृ + तव्यत् = कर्तव्य: के समान रूप में क्रियापदों के कर्तव्य रूप लिखे गए हैं।

व्याख्या:

प्रत्येक शब्द में 'तव्य' प्रत्यय लगाकर कर्तव्य रूप बनाए गए हैं, जो संस्कृत व्याकरण के नियमों के अनुसार हैं।

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Q8.8. सन्धिविच्छेदं कुरुत । (क) शब्दोपदेश: - ______________________. (ख) अन्येऽभक्ष्या: - ______________________. (ग) गाव्यादिषूपदिष्टेषु - ______________________. (घ) गौरिति - ______________________. (ङ) लघुत्वाच्छब्दोपदेश: - ______________________. (च) इष्टान्वाख्यानम् - ______________________. (छ) पुनरत्र - ______________________. (ज) अधैतस्मिन् - ______________________. (झ) इत्येवम् - ______________________. (ञ) प्रतिपदोक्तानाम् - ______________________.

उत्तर:

उत्तर: (क) शब्दोपदेश: = शब्द + उपदेश: (ख) अन्येऽभक्ष्या: = अन्ये + अभक्ष्या: (ग) गाव्यादिषूपदिष्टेषु = गाव्या + आदि + उपदिष्टेषु (घ) गौरिति = गौ + इरिति (ङ) लघुत्वाच्छब्दोपदेश: = लघुत्वात् + शब्द + उपदेश: (च) इष्टान्वाख्यानम् = इष्टान् + वाख्यानम् (छ) पुनरत्र = पुनर् + अत्र (ज) अधैतस्मिन् = अध + एतस्मिन् (झ) इत्येवम् = इति + एवम् (ञ) प्रतिपदोक्तानाम् = प्रति + पद + उक्तानाम् व्याख्या: प्रत्येक शब्द को उसके मूल भागों में विभाजित किया गया है।

व्याख्या:

सन्धि विच्छेद के नियमों के अनुसार शब्दों को उनके मूल अवयवों में विभाजित किया गया है।

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