Chapter 7
Chapter 7 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
परिचयः - सिंहासनद्वात्रिंशिका तथा विक्रमस्यौदार्यम्
व्याख्यापरिचयः - सिंहासनद्वात्रिंशिका तथा विक्रमस्यौदार्यम्
इस पाठ का शीर्षक 'विक्रमस्यौदार्यम्' है, जो 'सिंहासनद्वात्रिंशिका' नामक ग्रन्थ से उद्धृत है। सिंहासनद्वात्रिंशिका बत्तीस मनोरंजक कथाओं का संग्रह है, जिसमें केवल गद्य, केवल पद्य तथा गद्य-पद्य मिश्रित तीन प्रकार के पाठ पाए जाते हैं। यह संग्रह धारा नगरी के राजा भोज को सुनाई गई कथाओं का संकलन है, अतः इसका समय राजा भोज (1018–1063) के पश्चात माना जाता है। सिंहासनद्वात्रिंशिका की कथा के अनुसार, राजा भोज को एक टीले की खुदाई के दौरान राजा विक्रमादित्य का सिंहासन प्राप्त होता है। जब राजा भोज उस सिंहासन पर बैठना चाहते हैं, तो सिंहासन में बनी 32 पुत्तलिकाएँ (छोटे मूर्तिकाएँ) उन्हें रोकती हैं और प्रत्येक पुत्तलिका विक्रमादित्य के गुणों तथा पराक्रम की एक कथा सुनाती है। वे राजा भोज से प्रश्न करती हैं कि क्या उनमें विक्रमादित्य जैसा गुण है, यदि हाँ तो ही सिंहासन पर बैठने की अनुमति है। प्रस्तुत पाठ इसी संग्रह से लिया गया है, जिसमें राजा विक्रम की उदारता, संसार की असारता का विचार, सम्पूर्ण धन दान करने की इच्छा और 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' का आयोजन वर्णित है। इस यज्ञ में राजा विक्रम ने अपनी सम्पत्ति का त्याग कर दिया और समुद्र से प्राप्त चार अद्वितीय रत्न भी दान कर दिए। इस प्रकार विक्रम की अत्यंत उदारता का परिचय मिलता है।
- सिंहासनद्वात्रिंशिका में 32 मनोरंजक कथाएँ हैं।
- राजा भोज को सिंहासन मिला जो राजा विक्रमादित्य का था।
- सिंहासन में 32 पुत्तलिकाएँ थीं जो विक्रम के गुणों की कथाएँ सुनाती थीं।
- राजा भोज को विक्रम के समान गुण होने पर ही सिंहासन पर बैठने दिया जाता है।
- पाठ में विक्रम की उदारता और संसार की असारता पर विचार प्रस्तुत हैं।
- विक्रम ने सम्पूर्ण धन दान करने के लिए सर्वस्वदक्षिणयज्ञ का आयोजन किया।
- 📌 सिंहासनद्वात्रिंशिका: बत्तीस कथाओं का संग्रह।
- 📌 पुत्तलिका: छोटी मूर्ति या प्रतिमा।
- 📌 सर्वस्वदक्षिणयज्ञ: सम्पूर्ण धन दान करने वाला यज्ञ।
विक्रमस्य उदारता का कारण एवं संसार की असारता
व्याख्याविक्रमस्य उदारता का कारण एवं संसार की असारता
इस भाग में राजा विक्रम की मनोस्थिति और उनके उदार स्वभाव का वर्णन है। राजा विक्रम एक दिन अपने मन में विचार करते हैं कि संसार असार है क्योंकि भविष्य का ज्ञान किसी को नहीं है। वे सोचते हैं कि जो धन अर्जित किया जाता है, वह दान और भोग के बिना सफल नहीं होता। इसलिए उन्होंने उपार्जित धन का त्याग करना उचित समझा। विक्रम के विचारों में यह भी है कि संसार में सब कुछ क्षणभंगुर है और स्थायी नहीं। उन्होंने कहा है कि उपार्जित धन का त्याग ही उसका संरक्षण है, जैसे तालाब की गहराई में स्थित जल का निकास। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि धन का दान और भोग करना चाहिए, परंतु धन के विषय में मोह नहीं रखना चाहिए। इस प्रकार विक्रम ने संसार की असारता को समझते हुए उदारता का मार्ग अपनाया और सम्पूर्ण धन दान करने का निर्णय लिया। यह विचार उनकी उदारता का मूल कारण है।
- विक्रम ने संसार को असार और क्षणभंगुर माना।
- भविष्य का ज्ञान किसी को नहीं होता, इसलिए धन का मोह व्यर्थ है।
- उपार्जित धन का त्याग ही उसका संरक्षण है।
- धन का दान और भोग करना चाहिए, पर मोह नहीं।
- विक्रम की उदारता का कारण उनकी गहरी सोच और संसार की असारता की समझ है।
- 📌 असारता: अनित्य और क्षणभंगुर होना।
- 📌 उदारता: दानशीलता और स्वार्थहीनता।
- 📌 त्याग: किसी वस्तु को छोड़ देना।
सर्वस्वदक्षिणयज्ञ का आयोजन एवं समुद्र से ब्राह्मण का प्रेषण
व्याख्यासर्वस्वदक्षिणयज्ञ का आयोजन एवं समुद्र से ब्राह्मण का प्रेषण
राजा विक्रम ने अपने उदार स्वभाव के अनुसार सम्पूर्ण धन दान करने के लिए 'सर्वस्वदक्षिणयज्ञ' का आयोजन किया। इस यज्ञ के लिए अत्यंत मनोहर मण्डप का निर्माण शिल्पियों द्वारा कराया गया। यज्ञ की सभी सामग्री एकत्र की गई और देव, मुनि, गन्धर्व, यक्ष, सिद्ध आदि स
अभ्यास प्रश्न — Chapter 7
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. संस्कृतभाषया उत्तरत । (क) विक्रमस्यौदार्यम् पाठ: कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलित:? (ख) उपार्जितानां वितानां रक्षणं कथं भवति? (ग) धनविषये कौद्दश: व्यवहार: कर्तव्य:? (घ) जलमध्ये पुष्पाञ्जलि दत्वा क्षणं क: स्थित:? (ङ) समुद्र: राज्ञ किमर्थं रत्नचतुष्टयं दत्तवान्? (च) द्वितीयरत्तेन किम् उत्पद्यते? (छ) प्रीतिलक्षणं कतिविधं भवति?
उत्तर:
उत्तर: (क) विक्रमस्यौदार्यम् पाठ: प्राचीनभारतीयसाहित्ये प्रसिद्धः विक्रमौवशीयम् इत्यस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः। (ख) उपार्जितानां वितानां रक्षणं त्यागेन एव भवति। अर्थात्, जो धन उपार्जितः तस्य संरक्षणं त्याग एव मुख्यं साधनम् अस्ति। (ग) धनविषये व्यवहारः सादरः, विवेकपूर्णः च कर्तव्यः। धनं व्यर्थं न व्ययेत, न च अनर्थं दातव्यं। (घ) जलमध्ये पुष्पाञ्जलि दत्वा क्षणं समुद्रः स्थितः। (ङ) समुद्र: राज्ञ रत्नचतुष्टयं दत्तवान् कारणं तस्य राज्ञः यज्ञसमाप्त्यर्थम्। (च) द्वितीयरत्तेन उत्पद्यते यज्ञसमाप्तिः, यज्ञसमाप्त्यर्थं द्वितीयरत्नं प्रयुज्यते। (छ) प्रीतिलक्षणं षड्विधं भवति, यथा ददाति, प्रतिगृह्णाति, गुह्यमाख्याति, पृच्छति, भुङ्कते, भोजयते च।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्नस्य संस्कृतपाठ्यपुस्तकानुसारं उत्तरं संस्कृतसाहित्ये वर्णितानुसारं विस्तृतं दत्तम्।
Q2.2. रिक्तस्थानानि पूर्यत । (क) उपार्जितानां वितानां ... हि रक्षणम्। (ख) दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये ... न कर्तव्य:। (ग) तत: शिल्पिभिरतीव ... मण्डप: कारित:। (घ) भो समुद्र! ... यज्ञं करोति। (ङ) तस्मै राज्ञ व्ययार्थ ... दास्यामि। (च) यद्रत्नं चतुरङ्गबलं ... तद् ग्रहीष्याम:। (छ) सर्वेषां प्राणिनामनेनैव ... भवति।
उत्तर:
उत्तर: (क) उपार्जितानां वितानां त्याग एव हि रक्षणम्। (ख) दातव्यं भोक्तव्यं धनविषये व्यर्थं न कर्तव्य:। (ग) तत: शिल्पिभिरतीव कुशलैः मण्डप: कारित:। (घ) भो समुद्र! यज्ञं करोति तव सहाय्यं। (ङ) तस्मै राज्ञ व्ययार्थ रत्नचतुष्टयं दास्यामि। (च) यद्रत्नं चतुरङ्गबलं तद् ग्रहीष्याम:। (छ) सर्वेषां प्राणिनामनेनैव प्रीतिलक्षणं भवति।
व्याख्या:
रिक्तस्थानानि पाठ्यपुस्तकस्य सन्दर्भेण पूरितानि। प्रत्येक रिक्तस्थानस्य सन्दर्भानुसारं सम्यक् शब्दः योजितः।
Q3.3. अधोलिखितानां पदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत । वितानाम्, शिल्पिभिः, गिरो, एतेषाम्, दातव्यम् रोचते।
उत्तर:
उत्तर: (1) वितानाम् रक्षणं आवश्यकम्। (2) शिल्पिभिः मण्डपः निर्मितः। (3) एतेषाम् व्यवहारः सदाचारः। (4) दातव्यम् धनं विवेकपूर्वकं। (5) रोचते गिरो हि सत्यवचनम्।
व्याख्या:
प्रत्येकं पदं वाक्येषु सम्यक् प्रकारेण योजितम्।
Q4.4. प्रकृतिप्रत्ययविभागः क्रियताम् । उपक्रान्तवान्, विधाय, गत्वा, गृहीत्वा, स्थितः, व्यतिक्रम्य, दातव्यम्।
उत्तर:
उत्तर: (1) उपक्रान्तवान् = उप + क्रान्त + वान् (पूर्वप्रत्यय) (2) विधाय = विधा + य (कृदन्त) (3) गत्वा = गम् + त्वा (कृदन्त) (4) गृहीत्वा = गृह् + ईत्वा (कृदन्त) (5) स्थितः = स्था + तः (कृदन्त) (6) व्यतिक्रम्य = व्यति + क्रम् + य (कृदन्त) (7) दातव्यम् = दा + त्व्यम् (कृदन्त)
व्याख्या:
प्रत्येकं शब्दं प्रकृतिप्रत्ययविभागेण विश्लेषितम्।
Q5.5. सन्धिविच्छेदं कुरुत । तेनैव, यच्चोक्तम्, तस्येप्सितम्, चैव, यच्च, तदपि, सर्वापि, सोऽपि, प्राप्तैव, चेदस्मिन्, तच्छुत्वा, त्वय्येवम्।
उत्तर:
उत्तर: (1) तेन + एव = तेनैव (2) यत् + च + उक्तम् = यच्चोक्तम् (3) तस्य + इप्सितम् = तस्येप्सितम् (4) च + एव = चैव (5) यत् + च = यच्च (6) तत् + अपि = तदपि (7) सर्व + अपि = सर्वापि (8) सः + अपि = सोऽपि (9) प्राप्त + एव = प्राप्तैव (10) चेद् + अस्मिन् = चेदस्मिन् (11) तत् + शुत्वा = तच्छुत्वा (12) त्वया + एवम् = त्वय्येवम्
व्याख्या:
प्रत्येकं समासितं पदं सन्धिविच्छेदेन पृथक् कृतम्।
Q6.6. सप्रसङ्गं हिन्दीभाषया व्याख्या कार्याः । (क) उपार्जितानां वितानां त्याग एव हि रक्षणम्। तटाकोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्।। (ख) ददाति प्रतिगृह्णाति गुह्यमाख्याति पृच्छति। भुङ्कते भोजयते चैव षड्विधं प्रीतिलक्षणम्।।
उत्तर:
उत्तर: (क) उपार्जित धन का संरक्षण त्याग के द्वारा ही संभव है। जैसे तट के किनारे बहने वाले जल का प्रवाह होता है, वैसे ही धन का भी प्रवाह आवश्यक है। यदि धन को केवल संचित किया जाए और उपयोग न किया जाए तो वह व्यर्थ है। इसलिए धन का त्याग करना ही उसका सही संरक्षण है। (ख) दान, ग्रहण, रहस्य बताना, पूछना, खाना, खिलाना ये षड्विध प्रकार के प्रेम के लक्षण हैं। प्रेम का अर्थ केवल देना नहीं, बल्कि लेना, साझा करना, पूछना और खाना-खिलाना भी प्रेम के रूप हैं।
व्याख्या:
प्रत्येक श्लोक का हिन्दी में अर्थ एवं भावार्थ स्पष्ट किया गया है।
Q7.7. अधोलिखितानां समस्तपदानां विग्रहं कुरुत । विक्रमतुल्यम्, क्रियाविधिज्ञम्, सकलगुणनिवासः, यज्ञसामग्री, समुद्रतीरम्, जलमध्ये, पुष्पाञ्जलिम्, देदीप्यमानशरीरः, ययार्थम्, यज्ञसमाप्ति; गुणकथनम्, ब्राह्मणसमूहः, प्राणधारणम्, राजसमीपम्।
उत्तर:
उत्तर: (1) विक्रमतुल्यम् = विक्रमतुल्य + अम् (2) क्रियाविधिज्ञम् = क्रिया + विधि + ज्ञम् (3) सकलगुणनिवासः = सकल + गुण + निवासः (4) यज्ञसामग्री = यज्ञ + सामग्री (5) समुद्रतीरम् = समुद्र + तीरम् (6) जलमध्ये = जल + मध्ये (7) पुष्पाञ्जलिम् = पुष्प + अञ्जलिम् (8) देदीप्यमानशरीरः = दे + दीप्यमान + शरीरः (9) ययार्थम् = यय + अर्थम् (10) यज्ञसमाप्ति = यज्ञ + समाप्ति (11) गुणकथनम् = गुण + कथनम् (12) ब्राह्मणसमूहः = ब्राह्मण + समूहः (13) प्राणधारणम् = प्राण + धारणम् (14) राजसमीपम् = राज + समीपम्
व्याख्या:
प्रत्येकं समासितं पदं तत्समासविच्छेदेन विग्रहीतं।
Q8.विक्रमस्यौदार्यम् पाठ: कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः?
उत्तर:
सिंहासनद्वात्रिंशिका
व्याख्या:
विक्रमस्यौदार्यम् पाठः सिंहासनद्वात्रिंशिका नामक ग्रन्थात् सङ्कलितः अस्ति। एषः बत्तीस मनोरञ्जक कथानां संग्रहः अस्ति यः राजा भोजाय कथितः आसीत्।