Chapter 10
Chapter 10 — अध्ययन नोट्स
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योगस्य वैशिष्ट्यम् - परिचयः
व्याख्यायोगस्य वैशिष्ट्यम् - परिचयः
यह पाठ पतञ्जलि द्वारा रचित योगसूत्रों पर आधारित है, जिसमें योगाभ्यास के माध्यम से जीवन को संयमित, स्वस्थ और समृद्ध बनाने के उपाय बताए गए हैं। पाठ में योग के विभिन्न स्वरूपों का संवादात्मक रूप में वर्णन किया गया है, जिससे छात्र-छात्राएँ विषय को रोचक एवं सरलता से समझ सकें। कक्षा में योगविषयक चित्रों द्वारा वातावरण को सज्जित किया गया है, जिससे विषय की महत्ता और उपयोगिता स्पष्ट होती है। योग का उद्देश्य शरीर, मन और बुद्धि के समन्वय से जीवन को श्रेष्ठ बनाना है। इस संवाद में छात्र-छात्राएँ योग के महत्व, योगशास्त्र के मूलभूत सिद्धांतों, तथा योग के अंगों के विषय में जिज्ञासा प्रकट करते हैं। योगशिक्षक द्वारा योगशास्त्र के शारीरिक और मानसिक नियंत्रण के सिद्धांतों को समझाया जाता है, जो स्वाध्याय और अभ्यास से एकाग्रता को बढ़ाने में सहायक होते हैं। इस परिचयात्मक खंड में योग के व्यापक प्रभाव और विश्व में योग दिवस के महत्व का भी उल्लेख है।
- पतञ्जलि के योगसूत्रों पर आधारित पाठ
- योगाभ्यास से जीवन को संयमित, स्वस्थ और समृद्ध बनाना
- संवादात्मक रूप में योग के विभिन्न स्वरूपों का वर्णन
- योगशास्त्र में शरीर और मन के नियंत्रण का महत्व
- विश्व में योग दिवस का उत्साहपूर्वक आयोजन
- योगशिक्षक द्वारा योग के मूल सिद्धांतों की व्याख्या
- 📌 योगसूत्रः - पतञ्जलि द्वारा रचित योग के सूत्र
- 📌 योगाभ्यासः - योग के अभ्यास की प्रक्रिया
- 📌 संयमः - नियंत्रण और अनुशासन
चित्तवृत्तिनिरोधः एवं प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः
अवधारणाचित्तवृत्तिनिरोधः एवं प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः
योगशास्त्र में 'चित्तवृत्तिनिरोधः' का अर्थ है मन की चंचलताओं, विक्षेपों और विचारों का निरोध करना। पतञ्जलि के अनुसार योग का मुख्य उद्देश्य चित्त की वृत्तियों को नियंत्रित कर मन को एकाग्र और शांत बनाना है। चित्त में विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ होती हैं जिन्हें योगसूत्रों में पाँच प्रकारों में वर्गीकृत किया गया है: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति। प्रमाण का अर्थ है प्रत्यक्ष, अनुमान और शाब्दिक प्रमाण, जो सत्य ज्ञान प्रदान करते हैं। विपर्यय मिथ्या या गलत ज्ञान है, जो वास्तविकता के विपरीत होता है। विकल्प शब्दज्ञान पर आधारित होता है, जिसमें वस्तु का अभाव होता है। निद्रा वह स्थिति है जिसमें चित्त निष्क्रिय होकर शून्य सा हो जाता है, परन्तु यह जागरूकता का अभाव है। स्मृति वह है जिसमें अनुभूत विषयों का स्मरण होता है। योगाभ्यास का लक्ष्य इन वृत्तियों के निरोध से चित्त को स्थिर करना है, जिससे व्यक्ति को आत्मज्ञान और शांति प्राप्त होती है। इस खंड में योगशिक्षक द्वारा इन वृत्तियों के भेद और उनके निरोध के महत्व को विस्तार से समझाया गया है।
- चित्तवृत्तिनिरोधः का अर्थ मन की चंचलताओं का नियंत्रण
- पाँच प्रकार की चित्त वृत्तियाँ: प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति
- प्रमाण: प्रत्यक्ष, अनुमान, शाब्दिक ज्ञान
- विपर्यय: मिथ्या या गलत ज्ञान
- विकल्प: शब्दज्ञान पर आधारित वस्तुहीन ज्ञान
- निद्रा: चित्त की निष्क्रिय अवस्था
- स्मृति: अनुभूत विषयों का स्मरण
- 📌 चित्तवृत्तिनिरोधः - मन की वृत्तियों का निरोध
- 📌 प्रमाणम् - सत्य ज्ञान के स्रोत
- 📌 विपर्ययः - मिथ्या ज्ञान
योगाङ्गानि - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि
अवधारणायोगाङ्गानि - यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि
पतञ्जलि योगसूत्रों के अनुसार योग के आठ अंग होते हैं जिन्हें अष्टांग योग कहा जाता है। ये आठ अंग योगाभ्यास के विभिन्न पहलुओं को दर्शाते हैं जो शरीर, मन और आत्मा के समन्वय के लिए आवश्यक हैं। अष्टांग योग के अंग हैं: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार,
अभ्यास प्रश्न — Chapter 10
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. अधोलिखितप्रश्नानां उत्तराणि संस्कृतेन लिखत । (क) योगः कः कथ्यते? (ख) मातुः मुखाद् योगशिक्षाया: विषये का श्रुतवती? (ग) छात्राः कस्मिन् विषये ज्ञातुम् उत्सुकाः सन्ति? (घ) प्रमाणानि कानि? (ङ) स्मृतिः का कथ्यते? (च) निद्रा का भवति? (छ) योगाङ्गानि कानि? (ज) अहिंसा का कथ्यते? (झ) अपरिग्रहः कः भवति? (ञ) के नियमाः?
उत्तर:
1. (क) योगः चित्तवृत्तिनिरोधः इति कथ्यते। (ख) मातुः मुखात् योगशिक्षाया: विषयं श्रुतवती। (ग) छात्राः योगस्य महत्त्वं, योगाङ्गानि, नियमाः इत्यादिषु विषयेषु ज्ञातुम् उत्सुकाः सन्ति। (घ) प्रमाणानि प्रत्यक्षं, अनुमानं, शब्दं च सन्ति। (ङ) स्मृतिः पूर्वानुभवानां चित्ते सञ्चितं ज्ञानं कथ्यते। (च) निद्रा चित्तस्य विश्रामः भवति। (छ) योगाङ्गानि यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि इति अष्टाङ्गानि सन्ति। (ज) अहिंसा सर्वप्राणिनां प्रति हिंसा न कर्तव्येति कथ्यते। (झ) अपरिग्रहः वस्तूनां आसक्तिं त्यागः भवति। (ञ) नियमाः अहिंसा, सत्यं, अस्तेयम्, ब्रह्मचर्यम्, अपरिग्रहः इति सन्ति।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्नस्य संस्कृतभाषायाम् संक्षिप्तं स्पष्टं च उत्तरं दत्तम्। योगस्य परिभाषा, प्रमाणानि, योगाङ्गानि, नियमाः इत्यादीनि विषयाणि स्पष्टीकृतानि।
Q2.2. वाक्यांशानाम् आशयं स्पष्टीकुरुत । (क) स्थिरसुखमासनम्। (ख) देशबन्धशिचत्स्य धारणा। (ग) ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः। (घ) सन्तोषादनुतमः सुखलाभः। (ङ) स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः।
उत्तर:
2. (क) स्थिरसुखमासनम् — ऐसा आसन जो स्थिर और सुखद हो। (ख) देशबन्धशिचत्स्य धारणा — मन को किसी निश्चित स्थान पर स्थिर रखना। (ग) ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः — ब्रह्मचर्य के पालन से शक्ति की प्राप्ति। (घ) सन्तोषादनुतमः सुखलाभः — संतोष से उत्तम सुख की प्राप्ति। (ङ) स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः — स्वाध्याय द्वारा अपनी इच्छित देवता के साथ संपर्क।
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्यांश का आशय स्पष्ट किया गया है जिससे अर्थ की समझ हो।
Q3.3. ‘अ’स्तम्भस्य वाक्यांशैः सह ‘ब’ स्तम्भस्य वाक्यांशान् मेलयत । (अ) (ब) (क) शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्य: धारणा (ख) स्थिरसुखम् वीर्यलाभः (ग) देशबन्धचित्तस्य सर्वरत्नोपस्थानम् (घ) अस्तेयप्रतिष्ठायाम् विकल्पः (ङ) ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायाम् ध्यानम् (च) प्रत्ययैकतानता आसनम्
उत्तर:
3. मिलान: (क) शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्य: — विकल्पः (ख) स्थिरसुखम् — आसनम् (ग) देशबन्धचित्तस्य — धारणा (घ) अस्तेयप्रतिष्ठायाम् — सर्वरत्नोपस्थानम् (ङ) ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायाम् — वीर्यलाभः (च) प्रत्ययैकतानता — ध्यानम्
व्याख्या:
प्रत्येक वाक्यांश को तदनुरूप अर्थ के अनुसार जोड़ा गया है।
Q4.4. रिक्तस्थानानां पूर्ति कुरुत । (क) योगशास्त्रे शरीरस्य मनसः:……………………………प्रतिपादनं वर्तते। (ख) अन्ताराष्ट्रिययोगदिवसः: जूनमासस्य……………………………मान्यते। (ग) शौचसन्तोषतपः……………………………प्रणिधानानि नियमाः। (घ) ………………………………क्रियाफलाश्रयत्वम्। (ङ) ………………………………मिथ्याज्ञानमतदूपप्रतिष्ठम्।
उत्तर:
4. (क) योगशास्त्रे शरीरस्य मनसः: संयोजनं प्रतिपादनं वर्तते। (ख) अन्ताराष्ट्रिययोगदिवसः: जूनमासस्य 21 तमे दिनं मान्यते। (ग) शौचसन्तोषतपः संयमः प्रणिधानानि नियमाः। (घ) अभ्यासः क्रियाफलाश्रयत्वम्। (ङ) अविद्या मिथ्याज्ञानमतदूपप्रतिष्ठम्।
व्याख्या:
रिक्त स्थानों में योग से संबंधित उपयुक्त शब्दों की पूर्ति की गई है।
Q5.5. अधोलिखितपदानां सन्धिं विच्छेदं वा कुरुत । (क) स्वागतम् ………………………………+………………………… (ख) कालांशः ………………………………+………………………… (ग) अति+इव ………………………………+………………………… (घ) विद्याध्ययनेऽपि ………………………………+………………………… (ङ) स+उत्साहम् ………………………………+………………………… (च) सम्यग्रूपेण ………………………………+………………………… (छ) सन्निधिः ………………………………+…………………………
उत्तर:
5. (क) स्वागतम् = स्व + आगतम् (ख) कालांशः = काल + अंशः (ग) अति+इव = अति + इव (समास) (घ) विद्याध्ययनेऽपि = विद्या + अध्ययन + अपि (ङ) स+उत्साहम् = स + उत्साहम् (च) सम्यग्रूपेण = सम्यक् + रूपेण (छ) सन्निधिः = सम् + निधिः
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द की संधि विच्छेद करके उसके घटक शब्द बताए गए हैं।
Q6.6. अधोलिखितपदानां मूलशब्दं विभक्तिं वचनं लिङ्गम् च लिखत । पदानि मूलशब्दः विभक्तिः वचनम् लिङ्गम् (क) अस्माकम् ……………………………… ……………………………… ……………………………… (ख) मनसः ……………………………… ……………………………… ……………………………… (ग) चिन्तया ……………………………… ……………………………… ……………………………… (घ) अङ्गानि ……………………………… ……………………………… ……………………………… (ङ) तस्मिन् ……………………………… ……………………………… ……………………………… (च) महती ……………………………… ……………………………… ……………………………… (छ) प्रतिष्ठायाम् ……………………………… ……………………………… ………………………………
उत्तर:
6. (क) अस्माकम् — मूलशब्दः अस्मद्, विभक्तिः सप्तमी, वचनम् बहुवचनम्, लिङ्गम् पुल्लिङ्गम्। (ख) मनसः — मूलशब्दः मनस्, विभक्तिः सप्तमी, वचनम् एकवचनम्, लिङ्गम् नपुंसकलिङ्गम्। (ग) चिन्तया — मूलशब्दः चिन्ता, विभक्तिः तृतीया, वचनम् एकवचनम्, लिङ्गम् स्त्रीलिङ्गम्। (घ) अङ्गानि — मूलशब्दः अङ्ग, विभक्तिः प्रथमा, वचनम् बहुवचनम्, लिङ्गम् नपुंसकलिङ्गम्। (ङ) तस्मिन् — मूलशब्दः तत्, विभक्तिः सप्तमी, वचनम् एकवचनम्, लिङ्गम् नपुंसकलिङ्गम्। (च) महती — मूलशब्दः महत्, विभक्तिः प्रथमा, वचनम् एकवचनम्, लिङ्गम् स्त्रीलिङ्गम्। (छ) प्रतिष्ठायाम् — मूलशब्दः प्रतिष्ठा, विभक्तिः सप्तमी, वचनम् एकवचनम्, लिङ्गम् स्त्रीलिङ्गम्।
व्याख्या:
प्रत्येक पद का मूलशब्द, विभक्ति, वचन और लिंग संस्कृत व्याकरण के अनुसार निर्धारित किया गया है।
Q7.7. पाठमाधृत्य योगस्य महत्तां स्वशब्देषु वर्णयत ।
उत्तर:
7. योगस्य महत्त्वं वर्णयत: योगः शरीरं मनसः च संयोजयति। योगेन चित्तवृत्तयः निरोध्यन्ते, अतः मनः शान्तः भवति। योगशिक्षया जीवनस्य समत्वं, संयमः, धैर्यं च लभ्यते। योगस्य अभ्यासेन स्वास्थ्यं, मानसिकशान्ति, आत्मज्ञानं च प्राप्ति संभवति। अतः योगः जीवनस्य सर्वाङ्गीणं विकासं साधयति।
व्याख्या:
पाठ्यांशानुसार योग के महत्त्व को स्पष्ट करते हुए उसके लाभों का वर्णन किया गया है।
Q8.योगशास्त्रे 'चित्तवृत्तिनिरोधः' का क्या अर्थ है?
उत्तर:
मन की चंचलताओं और विक्षेपों का निरोध करना
व्याख्या:
चित्तवृत्तिनिरोधः का अर्थ है मन की चंचलताओं, विक्षेपों और विचारों को नियंत्रित कर उन्हें शांत करना, जो योग का मुख्य उद्देश्य है।