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Chapter 7

🎓 Vardhman Mahaveer Open University📖 SLM - History of India (Earliest Time to 1200 AD) (Hindi)📖 9 नोट्स⏱️ ~14 मिनट
Chapter 6अध्याय 7 / 19Chapter 8

Chapter 7अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

परिचय

व्याख्या

परिचय

इस खंड में जैन धर्म एवं बौद्ध धर्म के उद्भव की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का वर्णन किया गया है। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का भारत धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। वैदिक धर्म में जटिल कर्मकांड, यज्ञों की अधिकता, सामाजिक असमानता, तथा जातिवाद के कारण समाज में असंतोष व्याप्त था। इसी समय उत्तर भारत के गंगा के मैदानों में अनेक धार्मिक आंदोलन उभरे, जिनमें जैन धर्म और बौद्ध धर्म सबसे अधिक प्रभावशाली रहे। इन दोनों धर्मों ने सरल, नैतिक और तर्कसंगत जीवन जीने पर बल दिया। इस खंड में यह भी बताया गया है कि किस प्रकार वैदिक धर्म के विरोध में श्रमण परंपरा का विकास हुआ, जिसमें तप, संयम, अहिंसा, और आत्म-शुद्धि पर बल दिया गया। जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर और बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध ने अपने-अपने उपदेशों के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों का विरोध किया और समानता, करुणा, तथा अहिंसा का संदेश दिया। इस प्रकार, यह खंड जैन और बौद्ध धर्म के उद्भव के ऐतिहासिक कारणों, उनकी आवश्यकता, और उनके महत्व को स्पष्ट करता है।

  • छठी शताब्दी ईसा पूर्व में धार्मिक आंदोलन का आरंभ हुआ।
  • वैदिक धर्म की जटिलता और असमानता के विरोध में नए धर्मों का उदय हुआ।
  • श्रमण परंपरा ने तप, संयम और अहिंसा को महत्व दिया।
  • महावीर और बुद्ध ने समाज सुधार के लिए नए मार्ग सुझाए।
  • इन धर्मों ने सामाजिक समानता और नैतिकता पर बल दिया।
  • 📌 श्रमण परंपरा: एक धार्मिक आंदोलन जिसमें तप, संयम, और अहिंसा को महत्व दिया गया।
  • 📌 कर्मकांड: धार्मिक अनुष्ठानों की जटिल प्रक्रिया।

जैन धर्म का उद्भव एवं विकास

व्याख्या

जैन धर्म का उद्भव एवं विकास

इस खंड में जैन धर्म के उद्भव, विकास और उसके प्रमुख सिद्धांतों का विस्तार से वर्णन किया गया है। जैन धर्म का वास्तविक प्रवर्तक वर्धमान महावीर (599-527 ई.पू.) माने जाते हैं, जो जैन परंपरा के 24वें तीर्थंकर थे। महावीर का जन्म वैशाली के निकट कुंडग्राम में हुआ था। उन्होंने 30 वर्ष की आयु में गृहत्याग कर 12 वर्षों तक कठोर तप किया और केवल्य (कैवल्य) ज्ञान प्राप्त किया। महावीर ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य के पंच महाव्रतों का प्रचार किया। जैन धर्म के अनुसार, आत्मा और कर्म का संबंध अनादिकाल से है। कर्म के बंधन से मुक्ति ही मोक्ष है। जैन धर्म में अहिंसा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। महावीर ने पाली भाषा के स्थान पर प्राकृत भाषा में उपदेश दिए, जिससे आम जनता तक उनके विचार पहुँचे। जैन धर्म के अनुयायी दो भागों में बँट गए: श्वेतांबर (सफेद वस्त्रधारी) और दिगंबर (निर्वस्त्र साधु)। जैन धर्म का प्रचार मुख्यतः पश्चिमी और दक्षिणी भारत में हुआ। व्यापारियों और शिल्पकारों ने इसे विशेष रूप से अपनाया। जैन धर्म ने मूर्तिपूजा, तप, और अहिंसा के माध्यम से समाज में नैतिकता और सहिष्णुता का विकास किया।

  • महावीर जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर थे।
  • पंच महाव्रत: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य।
  • आत्मा और कर्म के सिद्धांत पर बल।
  • श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों का विकास।
  • व्यापारियों और शिल्पकारों में लोकप्रिय।
  • 📌 तीर्थंकर: जैन धर्म के महान गुरु, जिन्होंने धर्म का प्रचार किया।
  • 📌 कैवल्य: पूर्ण ज्ञान की अवस्था, मोक्ष।

जैन धर्म के सिद्धांत एवं शिक्षाएँ

अवधारणा

जैन धर्म के सिद्धांत एवं शिक्षाएँ

इस खंड में जैन धर्म के मुख्य सिद्धांतों और शिक्षाओं का विस्तार से वर्णन किया गया है। जैन धर्म का मूल आधार अहिंसा है, जिसका अर्थ है - विचार, वचन और कर्म से किसी भी जीव को हानि न पहुँचाना। अन्य चार व्रत हैं: सत्य (सच्चाई बोलना), अस्तेय (चोरी न करना), अ