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Chapter 7

🎓 Class 11📖 Bhautiki-I📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट
Chapter 6अध्याय 7 / 7

Chapter 7अध्ययन नोट्स

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7.1 भूमिका

व्याख्या

7.1 भूमिका

गुरुत्वाकर्षण का अध्ययन भौतिकी के अत्यंत महत्वपूर्ण विषयों में से एक है। हमारे दैनिक जीवन में हम देखते हैं कि कोई भी वस्तु ऊपर फेंकी जाती है तो वह पृथ्वी की ओर गिरती है। पहाड़ पर चढ़ना नीचे उतरने की तुलना में अधिक कठिन होता है, वर्षा की बूंदें बादलों से पृथ्वी की ओर गिरती हैं। ये सभी घटनाएँ गुरुत्वाकर्षण की उपस्थिति को दर्शाती हैं। इतिहास में गैलीलियो ने यह सिद्ध किया कि सभी पिण्ड, चाहे उनका द्रव्यमान कुछ भी हो, समान त्वरण से पृथ्वी की ओर गिरते हैं। आदिम काल से ही आकाशीय पिंडों, ग्रहों और तारों की गति का अध्ययन किया गया। टॉलमी ने लगभग 2000 वर्ष पूर्व भूकेन्द्रित मॉडल प्रस्तुत किया जिसमें सभी आकाशीय पिंड पृथ्वी की परिक्रमा करते थे। इसके बाद आर्यभट्ट ने सूर्य केन्द्रित मॉडल दिया। कोपरनिकस ने इसे और परिष्कृत करते हुए सूर्य केन्द्रित मॉडल को प्रस्तुत किया। गैलीलियो ने इस सिद्धांत का समर्थन किया। टायको ब्रेह ने ग्रहों के प्रेक्षण किए और उनके सहायक केप्लर ने ग्रहों की गति के तीन नियम प्रतिपादित किए जो गुरुत्वाकर्षण के अध्ययन के लिए आधार बने। **Table on page 1 (13×1)** | 7.1 भूमिका | | --- | | 7.2 केप्लर के नियम | | 7.3 गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम | | 7.4 गुरुत्वीय नियतांक | | 7.5 पृथ्वी का गुरुत्वीय त्वरण | | 7.6 पृथ्वी के पृष्ठ के नीचे तथा ऊपर गुरुत्वीय त्वरण | | 7.7 गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा | | 7.8 पलायन चाल | | 7.9 भू उपग्रह | | 7.10 कक्षा में गतिशील उपग्रह की ऊर्जा | | सारांश | | विचारणीय विषय | | अभ्यास | **Table on page 16 (5×5)** | भौतिक राशि | प्रतीक | विमाएं | मात्रक | टिप्पणी | | --- | --- | --- | --- | --- | | गुरुत्वीय स्थिरांक | G | [M⁻¹ L³T⁻³] | N m² kg⁻² | 6.67×10⁻¹¹ | | गुरुत्वीय स्थितिज ऊर्जा | V(r) | [M L⁻³T⁻³] | J | $\frac{GMm}{r}$ (अदिश) | | गुरुत्वीय विभव | U(r) | [L⁻³T⁻³] | J kg⁻¹ | $\frac{GM}{r}$ (अदिश) | | गुरुत्वीय तीव्रता | E

  • गुरुत्वाकर्षण वह बल है जो सभी वस्तुओं को पृथ्वी की ओर आकर्षित करता है।
  • गैलीलियो ने सभी पिण्डों के समान त्वरण से गिरने का सिद्धांत दिया।
  • प्राचीन काल में आकाशीय पिंडों की गति पर विभिन्न मॉडल प्रस्तावित किए गए।
  • टॉलमी का भूकेन्द्रित मॉडल था, आर्यभट्ट और कोपरनिकस ने सूर्य केन्द्रित मॉडल दिया।
  • टायको ब्रेह के प्रेक्षणों के आधार पर केप्लर ने ग्रहों के तीन नियम प्रतिपादित किए।
  • 📌 गुरुत्वाकर्षण: वह बल जो सभी वस्तुओं को पृथ्वी की ओर आकर्षित करता है।
  • 📌 गुरुत्वीय त्वरण: वह त्वरण जिससे वस्तुएं पृथ्वी की ओर गिरती हैं।
  • 📌 भूकेन्द्रित मॉडल: आकाशीय पिंडों की गति का मॉडल जिसमें पृथ्वी केंद्र होती है।

7.2 केप्लर के नियम

व्याख्या

7.2 केप्लर के नियम

केप्लर ने ग्रहों की गति के तीन महत्वपूर्ण नियम प्रतिपादित किए जो ग्रहों की कक्षाओं, उनकी चाल और सूर्य से उनकी दूरी के संबंध को स्पष्ट करते हैं। 1. कक्षाओं का नियम: सभी ग्रह दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में गति करते हैं और सूर्य इन कक्षाओं की एक नाभि पर स्थित होता है। दीर्घवृत्त एक बन्द वक्र है जिसमें दो नाभियाँ होती हैं। ग्रह सूर्य के निकटतम बिन्दु को उपसौर और दूरस्थ बिन्दु को अपसौर कहते हैं। 2. क्षेत्रफलों का नियम: सूर्य से ग्रह को मिलाने वाली रेखा समान समय अंतरालों में समान क्षेत्रफल प्रसर्प करती है। इसका अर्थ है कि ग्रह सूर्य के निकट अधिक तीव्र गति से और दूर अधिक धीमी गति से चलता है। यह नियम कोणीय संवेग संरक्षण का परिणाम है। 3. आवर्त कालों का नियम: किसी ग्रह के परिक्रमण काल का वर्ग उसकी दीर्घवृत्तीय कक्षा के अर्ध-दीर्घ अक्ष के घन के अनुपात में होता है। इसका अर्थ है कि दूर के ग्रहों का परिक्रमण काल अधिक होता है। यह नियम केप्लर के ग्रहों की गति के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। **Table on page 3 (10×4)** | ग्रह | a | T | Q | | --- | --- | --- | --- | | बुध | 5.79 | 0.24 | 2.95 | | शुक्र | 10.8 | 0.615 | 3.00 | | पृथ्वी | 15.0 | 1 | 2.96 | | मंगल | 22.8 | 1.88 | 2.98 | | बृहस्पति | 77.8 | 11.9 | 3.01 | | शनि | 143 | 29.5 | 2.98 | | यूरेनस | 287 | 84 | 2.98 | | नेप्ट्यून | 450 | 165 | 2.99 | | प्लूटो* | 590 | 248 | 2.99 |

  • ग्रह दीर्घवृत्तीय कक्षाओं में सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते हैं।
  • सूर्य कक्षा की एक नाभि पर स्थित होता है।
  • सूर्य से ग्रह को मिलाने वाली रेखा समान समय में समान क्षेत्रफल बनाती है।
  • ग्रह की गति सूर्य के निकट तेज और दूर धीमी होती है।
  • ग्रह के परिक्रमण काल का वर्ग उसके अर्ध-दीर्घ अक्ष के घन के समानुपाती होता है।
  • 📌 दीर्घवृत्त: एक बन्द वक्र जिसमें दो नाभियाँ होती हैं।
  • 📌 उपसौर: ग्रह का सूर्य के सबसे निकट बिन्दु।
  • 📌 अपसौर: ग्रह का सूर्य से सबसे दूर बिन्दु।

7.3 गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम

व्याख्या

7.3 गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम

न्यूटन ने यह प्रतिपादित किया कि ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। यह आकर्षण बल उनके द्रव्यमान के गुणनफल के समानुपाती और उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमानुपाती होता है। इस नियम को गुरुत्वाकर्षण का सार्वत्रिक नियम कहते हैं।

अभ्यास प्रश्नChapter 7

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.मंगल ग्रह के फोबोस तथा डेल्मोस नामक दो चन्द्रमा हैं। (i) यदि फोबोस का आवर्तकाल 7 घंटे 39 मिनट तथा कक्षीय त्रिज्या $9.4 \times 10^3 \, \text{km}$ है तो मंगल का द्रव्यमान परिकलित कीजिए। (ii) यह मानते हुए कि पृथ्वी तथा मंगल सूर्य के परित: वृत्तीय कक्षाओं में परिक्रमण कर रहे हैं तथा मंगल की कक्षा की त्रिज्या पृथ्वी की कक्षा की त्रिज्या की 1.52 गुनी है तो मंगल-वर्ष की अवधि दिनों में क्या है?

उत्तर:

(i) यहाँ पर समीकरण (7.38) का उपयोग पृथ्वी के द्रव्यमान $M_E$ को मंगल के द्रव्यमान $M_m$ से प्रतिस्थापित करके करते हैं $$ T^2 = \frac{4\pi^2}{GM_m} R^3 $$ इससे, $$ \begin{aligned} M_m &= \frac{4\pi^2}{G} \frac{R^3}{T^2} \\ &= \frac{4 \times (3.14)^2 \times (9.4)^3 \times 10^{18}}{6.67 \times 10^{-11} \times (459 \times 60)^2} \\ &= \frac{4 \times (3.14)^2 \times (9.4)^3 \times 10^{18}}{6.67 \times (4.59 \times 6)^2 \times 10^{-5}} \\ &= 6.48 \times 10^{23} \, \text{kg} \end{aligned} $$ (ii) केप्लर के आवर्तकालों के नियम का उपयोग करते हुए, $$ \frac{T_M^2}{T_E^2} = \frac{R_{MS}^3}{R_{ES}^3} $$ जहाँ $R_{MS}$ एवं $R_{ES}$ क्रमशः मंगल-सूर्य तथा पृथ्वी-सूर्य के बीच की दूरियां हैं। $$ T_M = (1.52)^{3/2} \times 365 = 684 \text{ दिन} $$

व्याख्या:

प्रश्न (i) में, मंगल के द्रव्यमान $M_m$ ज्ञात करने के लिए केप्लर के नियम का उपयोग किया गया है। आवर्तकाल $T$ और कक्षीय त्रिज्या $R$ ज्ञात हैं। समीकरण (7.38) से, $T^2 = \frac{4\pi^2}{GM_m} R^3$, जिससे $M_m$ निकाला गया। प्रश्न (ii) में, मंगल और पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर के आवर्तकालों और कक्षीय त्रिज्याओं के अनुपात का उपयोग किया गया है। केप्लर के नियम के अनुसार, $\frac{T_M^2}{T_E^2} = \frac{R_{MS}^3}{R_{ES}^3}$, यहाँ $R_{MS} = 1.52 R_{ES}$ दिया गया है, जिससे $T_M$ निकाला गया।

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Q2.पृथ्वी को तोलना : आपको निम्नलिखित आंकड़े दिए गए हैं: $g = 9.81 \, \text{m s}^{-2}$, $R_E = 6.37 \times 10^6 \, \text{m}$, पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी $R = 3.84 \times 10^8 \, \text{m}$ पृथ्वी के परित: चन्द्रमा के परिक्रमण का आवर्त काल = 27.3 दिन। दो भिन्न विधियों द्वारा पृथ्वी का द्रव्यमान प्राप्त कीजिए।

उत्तर:

(i) पहली विधि : समीकरण (7.12) से $$ M_E = \frac{g R_E^2}{G} $$ $$ = \frac{9.81 \times (6.37 \times 10^6)^2}{6.67 \times 10^{-11}} = 5.97 \times 10^{24} \, \text{kg} $$ (ii) दूसरी विधि : चन्द्रमा पृथ्वी का उपग्रह है। कैप्लर के आवर्तकालों के नियम की व्युत्पत्ति में (समीकरण (7.38) देखिए) $$ T^2 = \frac{4\pi^2 R^3}{G M_E} $$ $$ M_E = \frac{4\pi^2 R^3}{G T^2} $$ $$ = \frac{4 \times 3.14 \times 3.14 \times (3.84)^3 \times 10^{24}}{6.67 \times 10^{-11} \times (27.3 \times 24 \times 60 \times 60)^2} = 6.02 \times 10^{24} \, \text{kg} $$ दोनों विधियों द्वारा लगभग समान उत्तर प्राप्त होते हैं, जिनमें 1% से भी कम का अंतर है।

व्याख्या:

पहली विधि में, गुरुत्वाकर्षण त्वरण $g$ और पृथ्वी की त्रिज्या $R_E$ से पृथ्वी का द्रव्यमान $M_E$ निकाला गया है। दूसरी विधि में, चन्द्रमा के पृथ्वी के चारों ओर परिक्रमण काल और दूरी का उपयोग करते हुए केप्लर के नियम से $M_E$ निकाला गया। दोनों विधियों से प्राप्त मान लगभग समान हैं, जो विधियों की सटीकता दर्शाता है।

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Q3.समीकरण (7.38) में स्थिरांक $k$ को दिनों तथा किलोमीटरों में व्यक्त कीजिए। $k = 10^{-13} \, \text{s}^2 \, \text{m}^{-3}$ है। चन्द्रमा पृथ्वी से $3.84 \times 10^5 \, \text{km}$ दूर है। चन्द्रमा के परिक्रमण के आवर्तकाल को दिनों में प्राप्त कीजिए।

उत्तर:

हम जानते हैं कि $$ k = 10^{-13} \, \text{s}^2 \, \text{m}^{-3} $$ इसे दिनों और किलोमीटर में बदलते हैं: $$ k = 10^{-13} \left[ \frac{1}{(24 \times 60 \times 60)^2} \, \text{d}^2 \right] \left[ \frac{1}{(1/1000)^3 \, \text{km}^3} \right] $$ $$ = 1.33 \times 10^{-14} \, \text{d}^2 \, \text{km}^{-3} $$ समीकरण (7.38) के अनुसार, $$ T^2 = k (R)^3 = (1.33 \times 10^{-14})(3.84 \times 10^5)^3 $$ इससे, $$ T = 27.3 \, \text{d} $$

व्याख्या:

प्रश्न में दिया गया है कि स्थिरांक $k$ को सेकंड और मीटर के बजाय दिनों और किलोमीटर में व्यक्त करना है। इसके लिए समय को सेकंड से दिन में और दूरी को मीटर से किलोमीटर में बदला गया। फिर केप्लर के नियम के अनुसार $T^2 = k R^3$ में $k$ और $R$ के नए मानों को प्रतिस्थापित कर $T$ निकाला गया।

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Q4.7.1 निम्नलिखित के उत्तर दीजिए: (a) आप किसी आवेश का वैद्युत बलों से परिरक्षण उस आवेश को किसी खोखले चालक के भीतर रखकर कर सकते हैं। क्या आप किसी पिण्ड का परिरक्षण, निकट में रखे पदार्थ के गुरुत्वीय प्रभाव से, उसे खोखले गोले में रखकर अथवा किसी अन्य साधनों द्वारा कर सकते हैं? (b) पृथ्वी के परित: परिक्रमण करने वाले छोटे अन्तरिक्षयान में बैठा कोई अन्तरिक्ष यात्री गुरुत्व बल का संसूचन नहीं कर सकता। यदि पृथ्वी के परित: परिक्रमण करने वाला अन्तरिक्ष स्टेशन आकार में बढ़ा है, तब क्या वह गुरुत्व बल के संसूचन की आशा कर सकता है? (c) यदि आप पृथ्वी पर सूर्य के कारण गुरुत्वीय बल की तुलना पृथ्वी पर चन्द्रमा के कारण गुरुत्व बल से करें, तो आप यह पाएंगे कि सूर्य का खिंचाव चन्द्रमा के खिंचाव की तुलना में अधिक है (इसकी जाँच आप स्वयं आगामी अध्याय में करेंगे)। फिर भी, पृथ्वी पर समुद्र की ज्वार-भाटा चन्द्रमा के कारण अधिक होती है। ऐसा क्यों?

उत्तर:

उत्तर: (a) नहीं, किसी पिण्ड का गुरुत्वीय परिरक्षण वैद्युत आवेश के परिरक्षण की तरह नहीं किया जा सकता। वैद्युत आवेश को खोखले चालक के भीतर रखा जाता है क्योंकि चालक के भीतर विद्युत क्षेत्र शून्य होता है, जिससे आवेश बाहरी विद्युत क्षेत्र से सुरक्षित रहता है। परंतु गुरुत्वीय क्षेत्र को इस प्रकार परिरक्षित नहीं किया जा सकता क्योंकि गुरुत्वीय क्षेत्र हमेशा आकर्षक होता है और इसे किसी खोखले गोले या अन्य साधनों द्वारा पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता। (b) पृथ्वी के परित: परिक्रमण करने वाले छोटे अन्तरिक्षयान में बैठा कोई अन्तरिक्ष यात्री गुरुत्व बल का अनुभव नहीं करता क्योंकि वह मुक्त पतन की स्थिति में होता है। यदि अन्तरिक्ष स्टेशन आकार में बढ़ा है, तो वह गुरुत्वीय क्षेत्र में असमानता (ग्रेडिएंट) महसूस कर सकता है, जिससे गुरुत्व बल का संसूचन संभव हो सकता है। इसलिए बड़े आकार के अन्तरिक्ष स्टेशन में गुरुत्व बल के प्रभाव का पता चल सकता है। (c) सूर्य पृथ्वी से बहुत दूर है, इसलिए उसका गुरुत्वीय बल पृथ्वी पर कम होता है, जबकि चन्द्रमा पृथ्वी के निकट है और उसका गुरुत्वीय बल अधिक प्रभावी होता है। ज्वार-भाटा चन्द्रमा के गुरुत्वीय खिंचाव के कारण अधिक होती है क्योंकि ज्वार-भाटा गुरुत्वीय बल के अंतर (ग्रेडिएंट) पर निर्भर करता है, जो चन्द्रमा के कारण अधिक होता है। इसलिए, यद्यपि सूर्य का गुरुत्वीय बल अधिक है, परंतु चन्द्रमा के कारण ज्वार-भाटा अधिक होती है।

व्याख्या:

गुरुत्वीय परिरक्षण वैद्युत परिरक्षण से भिन्न है क्योंकि गुरुत्वीय क्षेत्र को पूरी तरह से रोका नहीं जा सकता। अन्तरिक्षयान में मुक्त पतन की स्थिति में गुरुत्व बल का अनुभव नहीं होता, लेकिन बड़े अन्तरिक्ष स्टेशन में गुरुत्वीय क्षेत्र में असमानता महसूस की जा सकती है। ज्वार-भाटा गुरुत्वीय बल के अंतर पर निर्भर करता है, इसलिए चन्द्रमा का प्रभाव सूर्य से अधिक होता है।

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Q5.7.2 सही विकल्प का चयन कीजिए : (a) बढ़ती तुगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है। (b) बढ़ती गहराई के साथ (पृथ्वी को एकसमान घनत्व को गोला मानकर) गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता/घटता है। (c) गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान/पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता। (d) पृथ्वी के केन्द्र से $r_2$ तथा $r_1$ दूरियों के दो बिन्दुओं के बीच स्थितिज ऊर्जा-अन्तर के लिए सूत्र $-G M m (1/r_2 - 1/r_1)$ सूत्र $mg(r_2 - r_1)$ से अधिक/कम यथार्थ है।
A.A) बढ़ती तुगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता है
B.B) बढ़ती तुगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण घटता है
C.C) बढ़ती गहराई के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता है
D.D) बढ़ती गहराई के साथ गुरुत्वीय त्वरण घटता है
E.E) गुरुत्वीय त्वरण पृथ्वी के द्रव्यमान पर निर्भर करता है
F.F) गुरुत्वीय त्वरण पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता
G.G) स्थितिज ऊर्जा-अन्तर के लिए सूत्र $-G M m (1/r_2 - 1/r_1)$ अधिक यथार्थ है
H.H) स्थितिज ऊर्जा-अन्तर के लिए सूत्र $mg(r_2 - r_1)$ अधिक यथार्थ है

उत्तर:

उत्तर: (a) बढ़ती तुगता के साथ गुरुत्वीय त्वरण घटता है। क्योंकि गुरुत्वीय त्वरण गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता है, जो दूरी बढ़ने पर घटती है। (b) पृथ्वी को एकसमान घनत्व वाला गोला मानने पर, बढ़ती गहराई के साथ गुरुत्वीय त्वरण बढ़ता नहीं बल्कि घटता है क्योंकि पृथ्वी के अंदर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता दूरी के साथ घटती है। (c) गुरुत्वीय त्वरण पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता, यह केवल पृथ्वी के द्रव्यमान और दूरी पर निर्भर करता है। (d) स्थितिज ऊर्जा-अन्तर के लिए सूत्र $-G M m (1/r_2 - 1/r_1)$ अधिक यथार्थ है, क्योंकि $mg(r_2 - r_1)$ केवल सतह के निकट छोटे ऊंचाई के लिए उपयुक्त है।

व्याख्या:

गुरुत्वीय त्वरण $g = GM/r^2$ से ज्ञात होता है, जहाँ $M$ पृथ्वी का द्रव्यमान है और $r$ दूरी है। अतः दूरी बढ़ने पर $g$ घटता है। पृथ्वी के अंदर गुरुत्वीय क्षेत्र की तीव्रता $g' = g (r/R)$ होती है, जहाँ $R$ पृथ्वी की त्रिज्या है, अतः गहराई बढ़ने पर $g$ घटता है। गुरुत्वीय त्वरण पिण्ड के द्रव्यमान पर निर्भर नहीं करता क्योंकि गुरुत्वीय बल $F = mg$ होता है। स्थितिज ऊर्जा का सही सूत्र गुरुत्वीय क्षेत्र में $U = -GMm/r$ है, अतः दो बिन्दुओं के बीच अंतर $-GMm(1/r_2 - 1/r_1)$ होगा। सतह के निकट छोटे ऊंचाई के लिए $mg imes ext{ऊंचाई}$ समीकरण उपयुक्त है।

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Q6.7.3 मान लीजिए एक ऐसा ग्रह है जो सूर्य के परित: पृथ्वी की तुलना में दो गुनी चाल से गति करता है, तब पृथ्वी की कक्षा की तुलना में इसका कक्षीय आमाप क्या है?

उत्तर:

उत्तर: सूर्य के परित: ग्रह की कक्षीय अवधि $T$ और कक्षा का आमाप $r$ के बीच के सम्बन्ध के अनुसार, केप्लर का तीसरा नियम: $T^2 \\propto r^3$ यदि ग्रह की चाल पृथ्वी की चाल का दो गुना है, तो इसका अर्थ है कि कक्षा की अवधि $T$ पृथ्वी की अवधि का आधा है (चाल $v = \frac{2\pi r}{T}$, यदि $v$ दोगुना है और $r$ ज्ञात नहीं है, तो $T$ कम होगा)। चाल $v = \frac{2\pi r}{T}$ से, यदि $v$ दोगुना है और $T$ ज्ञात है, तो $2v = \frac{2\pi r'}{T'}$ और $v = \frac{2\pi r}{T}$ अर्थात्, $2 \times \frac{2\pi r}{T} = \frac{2\pi r'}{T'}$ $\Rightarrow \frac{r'}{T'} = 2 \times \frac{r}{T}$ केप्लर के नियम से, $T^2 \propto r^3$ या $T = k r^{3/2}$ तो, $T' = k r'^{3/2}$ इसलिए, $\frac{r'}{T'} = \frac{r'}{k r'^{3/2}} = \frac{1}{k} r'^{-1/2}$ और $\frac{r}{T} = \frac{1}{k} r^{-1/2}$ तो, $\frac{r'}{T'} = 2 \times \frac{r}{T}$ $\Rightarrow \frac{1}{k} r'^{-1/2} = 2 \times \frac{1}{k} r^{-1/2}$ $\Rightarrow r'^{-1/2} = 2 r^{-1/2}$ $\Rightarrow \frac{1}{\sqrt{r'}} = 2 \times \frac{1}{\sqrt{r}}$ $\Rightarrow \sqrt{r'} = \frac{\sqrt{r}}{2}$ $\Rightarrow r' = \frac{r}{4}$ अतः ग्रह की कक्षा का आमाप पृथ्वी की कक्षा के एक चौथे भाग के बराबर होगा।

व्याख्या:

केप्लर के तीसरे नियम के अनुसार, कक्षीय अवधि $T$ और कक्षा का आमाप $r$ के बीच $T^2 \propto r^3$ संबंध होता है। चाल $v = \frac{2\pi r}{T}$ होती है। यदि चाल दोगुनी है, तो $v' = 2v$। इन समीकरणों से $r'$ का मान निकालने पर $r' = r/4$ प्राप्त होता है।

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Q7.7.4 बृहस्पति के एक उपग्रह, आयो (Io), की कक्षीय अवधि 1.769 दिन तथा कक्षा की त्रिज्या $4.22 \times 10^8$ m है। यह दर्शाइए कि बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 गुना है।

उत्तर:

उत्तर: केप्लर के तीसरे नियम के अनुसार, $T^2 = \frac{4 \pi^2 r^3}{G M}$ जहाँ, $T$ = कक्षीय अवधि, $r$ = कक्षा की त्रिज्या, $G$ = गुरुत्वीय स्थिरांक, $M$ = ग्रह का द्रव्यमान (यहाँ बृहस्पति)। दिया है, $T = 1.769$ दिन = $1.769 \times 24 \times 3600 = 152,793.6$ सेकंड, $r = 4.22 \times 10^8$ m, $G = 6.67 \times 10^{-11}$ N m²/kg²। $M = \frac{4 \pi^2 r^3}{G T^2}$ अब, $r^3 = (4.22 \times 10^8)^3 = 7.52 \times 10^{25} m^3$ $T^2 = (152,793.6)^2 = 2.33 \times 10^{10} s^2$ तो, $M = \frac{4 \pi^2 \times 7.52 \times 10^{25}}{6.67 \times 10^{-11} \times 2.33 \times 10^{10}}$ $= \frac{39.48 \times 7.52 \times 10^{25}}{1.55 \times 10^{0}} = \frac{2.97 \times 10^{27}}{1.55} = 1.92 \times 10^{27} kg$ सूर्य का द्रव्यमान $M_{sun} = 2 \times 10^{30} kg$ तो, $\frac{M}{M_{sun}} = \frac{1.92 \times 10^{27}}{2 \times 10^{30}} = 9.6 \times 10^{-4} \approx \frac{1}{1000}$ अतः बृहस्पति का द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 है।

व्याख्या:

केप्लर के तीसरे नियम से ग्रह के द्रव्यमान का मान कक्षा की त्रिज्या और कक्षीय अवधि से निकाला जाता है। उपग्रह आयो के कक्षा के आंकड़ों से बृहस्पति का द्रव्यमान लगभग $1.92 \times 10^{27}$ kg पाया गया जो सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1/1000 है।

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Q8.7.6 सही विकल्प का चयन कीजिए : (a) यदि स्थितिज ऊर्जा का शून्य अनन्त पर है, तो कक्षा में परिक्रमा करते किसी उपग्रह की कुल ऊर्जा इसकी गतिज/स्थितिज ऊर्जा का ऋणात्मक है। (b) कक्षा में परिक्रमा करने वाले किसी उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा समान ऊंचाई (जितनी उपग्रह की है) के किसी स्थिर पिण्ड को पृथ्वी के प्रभाव से बाहर प्रक्षेपित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा से अधिक/कम होती है।
A.A) कुल ऊर्जा गतिज ऊर्जा का ऋणात्मक है
B.B) कुल ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा का ऋणात्मक है
C.C) आवश्यक ऊर्जा अधिक होती है
D.D) आवश्यक ऊर्जा कम होती है

उत्तर:

उत्तर: (a) कक्षा में परिक्रमा करते उपग्रह की कुल ऊर्जा उसकी गतिज ऊर्जा का ऋणात्मक होती है क्योंकि कुल ऊर्जा $E = K + U$ होती है, जहाँ $K$ गतिज ऊर्जा और $U$ स्थितिज ऊर्जा है। स्थितिज ऊर्जा ऋणात्मक होती है और $|U| = 2K$ होता है, अतः कुल ऊर्जा $E = -K$ होती है। (b) उपग्रह को पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव से बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा उस स्थिर पिण्ड को बाहर निकालने के लिए आवश्यक ऊर्जा से कम होती है क्योंकि उपग्रह की गतिज ऊर्जा पहले से होती है।

व्याख्या:

गुरुत्वीय बंधन में उपग्रह की कुल ऊर्जा ऋणात्मक होती है। उपग्रह की गतिज ऊर्जा $K = \frac{GMm}{2r}$ और स्थितिज ऊर्जा $U = -\frac{GMm}{r}$ होती है। अतः कुल ऊर्जा $E = K + U = -\frac{GMm}{2r} = -K$ होती है। पृथ्वी से बाहर निकालने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है जो कुल ऊर्जा के बराबर होती है। स्थिर पिण्ड को बाहर निकालने के लिए पूरी ऊर्जा चाहिए, जबकि उपग्रह के पास पहले से गतिज ऊर्जा होती है, इसलिए आवश्यक ऊर्जा कम होती है।

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