Chapter 6
Chapter 6 — अध्ययन नोट्स
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6.1 प्रस्तावना
व्याख्या6.1 प्रस्तावना
इस अनुभाग में कणों के निकाय तथा उनकी घूर्णी गति की आवश्यकता और महत्त्व को समझाया गया है। भौतिकी में अब तक आपने बिंदु कण (Point Particle) की संकल्पना का उपयोग किया है, जिसमें वस्तु का आकार और विस्तार नगण्य माना जाता है। लेकिन वास्तविक जीवन में अधिकांश वस्तुएं आकार और विस्तार वाली होती हैं, जिन्हें कणों के निकाय (System of Particles) के रूप में समझना आवश्यक होता है। कणों के निकाय में प्रत्येक कण का अपना द्रव्यमान और स्थिति होती है, और ये कण आपस में जुड़े होते हैं। इस प्रकार के निकाय की गति को समझने के लिए हमें उनकी घूर्णी गति (Rotational Motion) का अध्ययन करना पड़ता है। घूर्णी गति से तात्पर्य है किसी वस्तु का किसी अक्ष के चारों ओर घूमना। यह गति दैनिक जीवन में बहुत सामान्य है, जैसे पहिये का घूमना, पंखे का घूमना, पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना आदि। इस अध्याय में हम कणों के निकाय की गति के सिद्धांतों को विस्तार से समझेंगे, जिसमें द्रव्यमान केंद्र, संवेग, टॉर्क, जड़त्व आघूर्ण, घूर्णी गति के समीकरण, घूर्णी संवेग, ऊर्जा और संरक्षण के नियम शामिल हैं। यह अध्याय भौतिकी के गतिशास्त्र (Mechanics) के महत्वपूर्ण भागों में से एक है और इसके ज्ञान से हम विभिन्न यांत्रिक प्रणालियों की जटिल गतियों को समझ सकते हैं।
- कणों के निकाय में वस्तु के सभी कण शामिल होते हैं जिनका द्रव्यमान और स्थान होता है।
- बिंदु कण की संकल्पना वस्तु के आकार को नजरअंदाज करती है, जबकि कणों के निकाय में आकार और विस्तार महत्वपूर्ण होते हैं।
- घूर्णी गति किसी वस्तु का किसी अक्ष के चारों ओर घूमना होता है।
- दैनिक जीवन में घूर्णी गति के उदाहरण जैसे पहिया, पंखा, पृथ्वी का घूमना।
- इस अध्याय में द्रव्यमान केंद्र, संवेग, टॉर्क, जड़त्व आघूर्ण, घूर्णी गति के समीकरण आदि विषय शामिल हैं।
- घूर्णी गति का अध्ययन यांत्रिकी में वस्तुओं की जटिल गतियों को समझने के लिए आवश्यक है।
- 📌 कणों का निकाय: वस्तु के सभी कणों का समूह जिसमें प्रत्येक कण का द्रव्यमान और स्थान होता है।
- 📌 घूर्णी गति: किसी वस्तु का किसी अक्ष के चारों ओर घूमना।
- 📌 बिंदु कण: ऐसा कण जिसका आकार और विस्तार नगण्य माना जाता है।
6.2 कणों के निकाय का द्रव्यमान केंद्र
व्याख्या6.2 कणों के निकाय का द्रव्यमान केंद्र
कणों के निकाय का द्रव्यमान केंद्र (Center of Mass) वह काल्पनिक बिंदु होता है जहाँ सम्पूर्ण द्रव्यमान एकत्रित माना जा सकता है। किसी भी निकाय के सभी कणों के द्रव्यमान और उनके स्थान के आधार पर द्रव्यमान केंद्र का निर्धारण किया जाता है। यदि निकाय में n कण हैं जिनका द्रव्यमान क्रमशः m₁, m₂, ..., mₙ है और उनके स्थान सदिश क्रमशः r₁, r₂, ..., rₙ हैं, तो द्रव्यमान केंद्र का स्थान सदिश R निम्नलिखित सूत्र से दिया जाता है: R = (Σ mᵢ rᵢ) / (Σ mᵢ) यहाँ Σ का अर्थ है सभी कणों के लिए योग। द्रव्यमान केंद्र की विशेषता यह है कि यदि निकाय पर कोई बाहरी बल कार्य करता है, तो निकाय की गति को द्रव्यमान केंद्र के गति के रूप में देखा जा सकता है। द्रव्यमान केंद्र की गति और संवेग का अध्ययन करके हम पूरे निकाय की गति को सरलता से समझ सकते हैं। द्रव्यमान केंद्र की स्थिति निकाय के आकार और द्रव्यमानों के वितरण पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, यदि निकाय सममित है और सभी कणों का द्रव्यमान समान है, तो द्रव्यमान केंद्र ज्यामितीय केंद्र के समान होगा। द्रव्यमान केंद्र का प्रयोग यांत्रिकी में वस्तुओं की गति और संतुलन का अध्ययन करने के लिए किया जाता है।
- द्रव्यमान केंद्र वह बिंदु है जहाँ सम्पूर्ण द्रव्यमान एकत्रित माना जाता है।
- द्रव्यमान केंद्र का स्थान सदिश R = (Σ mᵢ rᵢ) / (Σ mᵢ) से निर्धारित होता है।
- द्रव्यमान केंद्र की गति से निकाय की कुल गति का अध्ययन किया जा सकता है।
- यदि निकाय सममित और द्रव्यमान समान हो तो द्रव्यमान केंद्र ज्यामितीय केंद्र के समान होता है।
- द्रव्यमान केंद्र का ज्ञान वस्तुओं के संतुलन और गति के विश्लेषण में आवश्यक है।
- द्रव्यमान केंद्र पर कार्यरत बाहरी बल निकाय की गति को नियंत्रित करता है।
- 📌 द्रव्यमान केंद्र: निकाय का वह बिंदु जहाँ सम्पूर्ण द्रव्यमान एकत्रित माना जाता है।
- 📌 स्थान सदिश: किसी कण की स्थिति को दर्शाने वाला वेक्टर।
- 📌 सममित निकाय: ऐसा निकाय जिसका ज्यामितीय आकार समान होता है।
6.3 कणों के निकाय का रैखिक संवेग
व्याख्या6.3 कणों के निकाय का रैखिक संवेग
कणों के निकाय का रैखिक संवेग (Linear Momentum) निकाय के सभी कणों के संवेग का योग होता है। किसी कण का रैखिक संवेग उसके द्रव्यमान और वेग के गुणनफल के बराबर होता है। यदि निकाय के कणों के द्रव्यमान mᵢ और वेग vᵢ हैं, तो उस कण का संवेग pᵢ = mᵢ × vᵢ होगा। प
अभ्यास प्रश्न — Chapter 6
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. कठोर निकाय किसे कहते हैं? उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कठोर निकाय वह निकाय होता है जिसका आकार और आयतन किसी बाहरी बल के प्रभाव में भी नहीं बदलता। उदाहरण के लिए, एक स्टील की छड़ या लकड़ी की छड़ी को यदि आप दोनों सिरों से पकड़कर मोड़ने का प्रयास करें, तो वह अपने आकार को नहीं बदलती (जब तक बल उसकी लोच सीमा के भीतर है)। अतः यह कठोर निकाय का उदाहरण है।
व्याख्या:
कठोर निकाय की परिभाषा के अनुसार, इसमें सभी कण एक-दूसरे के सापेक्ष स्थिर रहते हैं और उनके बीच की दूरी अपरिवर्तित रहती है। उदाहरण के लिए, एक ठोस गेंद, छड़ आदि।
Q2.2. घूर्णी गति क्या है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
घूर्णी गति वह गति है जिसमें कोई कठोर निकाय अपने किसी अक्ष के चारों ओर घूमता है। उदाहरण के लिए, पंखे का घूमना, पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूमना आदि। इन सभी में निकाय के प्रत्येक कण की गति वृत्ताकार पथ पर होती है, जिसका केंद्र वह अक्ष होता है जिसके चारों ओर घूर्णन हो रहा है।
व्याख्या:
घूर्णी गति में निकाय के सभी कण वृत्ताकार पथ पर चलते हैं और उनका केंद्र घूर्णन अक्ष पर होता है। उदाहरण के लिए, घूमता हुआ पहिया।
Q3.3. कोणीय वेग और कोणीय त्वरण में क्या अंतर है?
उत्तर:
कोणीय वेग (ω) किसी कठोर निकाय के घूर्णन की तीव्रता को दर्शाता है, अर्थात निकाय कितनी तेजी से अपने अक्ष के चारों ओर घूम रहा है। इसकी इकाई रेडियन प्रति सेकंड होती है। कोणीय त्वरण (α) कोणीय वेग में प्रति सेकंड होने वाले परिवर्तन की दर है। इसकी इकाई रेडियन प्रति सेकंड² होती है। अंतर: - कोणीय वेग: घूर्णन की दर - कोणीय त्वरण: घूर्णन की दर में परिवर्तन
व्याख्या:
कोणीय वेग घूर्णन की दर है जबकि कोणीय त्वरण कोणीय वेग में परिवर्तन की दर है। ω = dθ/dt α = dω/dt
Q4.4. घूर्णी गति के समीकरण लिखिए और समझाइए।
उत्तर:
घूर्णी गति के समीकरण रैखिक गति के समीकरणों के समान होते हैं, परंतु यहाँ स्थान की जगह कोणीय विस्थापन (θ), वेग की जगह कोणीय वेग (ω), और त्वरण की जगह कोणीय त्वरण (α) लेते हैं। यदि कोणीय त्वरण स्थिर हो, तो समीकरण: 1) θ = ω₀t + (1/2)αt² 2) ω = ω₀ + αt 3) ω² = ω₀² + 2αθ जहाँ ω₀ = प्रारंभिक कोणीय वेग, ω = अंतिम कोणीय वेग, α = कोणीय त्वरण, t = समय, θ = कोणीय विस्थापन।
व्याख्या:
ये समीकरण रैखिक गति के समीकरणों के अनुरूप हैं: s = ut + (1/2)at² v = u + at v² = u² + 2as यहाँ s की जगह θ, u की जगह ω₀, v की जगह ω, a की जगह α।
Q5.5. टॉर्क क्या है? इसका सूत्र लिखिए।
उत्तर:
टॉर्क वह बल है जो किसी कठोर निकाय को उसके अक्ष के चारों ओर घुमाने का कारण बनता है। इसे घूर्णी बल भी कहते हैं। टॉर्क (τ) का परिमाण: τ = r × F जहाँ r = बल के लगने की दूरी (बलाघात), F = बल। यदि θ कोण पर बल लगाया जाए, तो: τ = rF sinθ
व्याख्या:
टॉर्क वह बल है जो घूर्णन उत्पन्न करता है। au = r \times F यदि बल और स्थिति सदिश के बीच कोण θ हो, तो τ = rF sinθ।
Q6.6. जड़त्वाघूर्ण किसे कहते हैं? यह किन-किन बातों पर निर्भर करता है?
उत्तर:
जड़त्वाघूर्ण (Moment of Inertia) किसी कठोर निकाय की वह भौतिक राशि है जो उसकी घूर्णी गति के प्रति प्रतिरोध को दर्शाती है। यह निकाय के कणों के द्रव्यमान और अक्ष से उनकी दूरी के वर्ग पर निर्भर करता है। सूत्र: I = Σ mᵢ rᵢ² यह निर्भर करता है: 1. द्रव्यमान का वितरण 2. द्रव्यमान और अक्ष के बीच की दूरी
व्याख्या:
जड़त्वाघूर्ण = Σ mᵢ rᵢ² यह द्रव्यमान और उसकी दूरी के वर्ग पर निर्भर करता है।
Q7.7. घूर्णी गति की गतिज ऊर्जा का सूत्र लिखिए एवं समझाइए।
उत्तर:
घूर्णी गति की गतिज ऊर्जा (Rotational Kinetic Energy) का सूत्र है: E = (1/2) I ω² जहाँ I = जड़त्वाघूर्ण, ω = कोणीय वेग। यह ऊर्जा निकाय के जड़त्वाघूर्ण और कोणीय वेग के वर्ग पर निर्भर करती है।
व्याख्या:
घूर्णी गतिज ऊर्जा = (1/2) × जड़त्वाघूर्ण × (कोणीय वेग)² E = (1/2) I ω²
Q8.8. घूर्णी गति के संरक्षण का नियम क्या है? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
घूर्णी गति के संरक्षण का नियम कहता है कि यदि किसी निकाय पर बाहरी टॉर्क शून्य हो, तो उसका कोणीय संवेग (L) स्थिर रहता है। L = Iω = स्थिर उदाहरण: आइस स्केटर जब अपने हाथों को सिकोड़ती है, तो उसका कोणीय वेग बढ़ जाता है ताकि कोणीय संवेग स्थिर रहे।
व्याख्या:
बिना बाहरी टॉर्क के कोणीय संवेग अपरिवर्तित रहता है। I₁ω₁ = I₂ω₂ आइस स्केटर का उदाहरण उपयुक्त है।
Bhautiki-I के सभी 7 अध्याय
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