उपसहसंयोजन यौगिक | Class 12 Chemistry Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 4 मिनट का पठन

उपसहसंयोजन यौगिक – this guide gives you a concise, exam-ready overview of उपसहसंयोजन यौगिक from Class 12 Chemistry, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
5.5 उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन
उपसहसंयोजन यौगिकों में आबंधन की प्रकृति को समझाने के लिए संयोजकता आबंध सिद्धांत (VBT) और क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) का उपयोग किया जाता है।
संयोजकता आबंध सिद्धांत के अनुसार, धातु आयन अपने (n-1)d, ns, np कक्षकों का उपयोग संकरण के लिए करते हैं जिससे विभिन्न ज्यामितियों जैसे अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय, वर्ग समतली आदि के समकक्ष कक्षक बनते हैं। उदाहरण स्वरूप, [Co(NH₃)₆]³⁺ में Co³⁺ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d⁶ होता है और यह d²sp³ संकरण करता है जिससे अष्टफलकीय ज्यामिति बनती है।
चतुष्फलकीय संकुलों में sp³ संकरण होता है, जैसे [NiCl₄]²⁻, जो उच्च प्रचक्रण संकुल होता है और इसमें अयुगलित इलेक्ट्रॉन होते हैं। वर्ग समतली संकुलों में dsp² संकरण होता है, जैसे [Ni(CN)₄]²⁻, जो निम्न प्रचक्रण संकुल होता है और इसमें अयुगलित इलेक्ट्रॉन नहीं होते।
संयोजकता आबंध सिद्धांत उपसहसंयोजन यौगिकों के चुंबकीय गुणों और ज्यामिति की व्याख्या करता है, परंतु इसकी कुछ सीमाएं भी हैं जैसे रंगों की व्याख्या न कर पाना और मात्रात्मक चुंबकीय व्याख्या में असमर्थता।
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत के अनुसार, लिगन्डों के स्थिर वैद्युत क्षेत्र के कारण धातु के d कक्षकों की ऊर्जा में विभाजन (splitting) होता है। अष्टफलकीय संकुलों में d कक्षक t₂g और e_g समूहों में विभाजित होते हैं, जिनके बीच ऊर्जा अंतर Δ₀ होता है। यह Δ₀ लिगन्ड के प्रकार और धातु के आवेश पर निर्भर करता है।
स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी के अनुसार, लिगन्डों को उनकी क्षेत्र प्रबलता के आधार पर क्रमबद्ध किया जाता है, जैसे I⁻ < Br⁻ < Cl⁻ < H₂O < NH₃ < CN⁻ < CO।
इस सिद्धांत से उपसहसंयोजन यौगिकों के रंग, चुंबकीय गुण और स्थायित्व को समझा जा सकता है।
📊 Diagram: Table on page 12 (6×3) showing coordination numbers, hybridisation types and geometries; Figures 23-25 showing Co³⁺ d²sp³ hybrid orbitals and [Co(NH₃)₆]³⁺ complex structure; Table on page 18 (7×4) showing absorption wavelengths and colors of various complexes.
🧪 Activity: विभिन्न उपसहसंयोजन यौगिकों के चुंबकीय आघूर्ण मापन द्वारा उनकी ज्यामिति का अनुमान लगाना।
🔗 Connection: यह अनुभाग धातु कार्बोनिलो में आबंधन की प्रकृति की ओर अग्रसर होता है।
Table on page 12 (6×3)
| समन्वय संख्या | संकरण का प्रकार | संकरित कक्षकों का आकाशीय वितरण |
|---|---|---|
| 4 | sp³ | चतुष्फलकीय |
| 4 | dsp² | वर्ग समतली |
| 5 | sp³d | त्रिकोणीय द्विपिरैमिडी |
| 6 | sp³d² | अष्टफलकीय |
| 6 | d²sp³ | अष्टफलकीय |
Table on page 18 (7×4)
| उपसहसंयोजक समूह | अवशोषित प्रकाश का तरंगदैर्घ्य (nm) | अवशोषित प्रकाश का रंग | उपसहसंयोजक समूह का रंग |
|---|---|---|---|
| [Co(NH₃)₅Cl²⁺] | 535 | नीला | बैंगनी |
| [Co(NH₃)₅(H₂O)]³⁺ | 500 | नीला-हरा | लाल |
| [Co(NH₃)₆]³⁺ | 475 | नीला | पीला-नारंगी |
| [Co(CN)₆]³⁻ | 310 | पराबैंगनी | हल्का पीला |
| [Cu(H₂O)₄]²⁺ | 600 | लाल | नीला |
| [Ti(H₂O)₆]³⁺ | 498 | नीला-हरा | नील लोहित |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
5.21 $\left[\mathrm{Fe}(\mathrm{CN})_{6}\right]^{4-}$ तथा $\left[\mathrm{Fe}\left(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}\right)_{6}\right]^{2+}$ के तनु विलयनों के रंग भिन्न होते हैं। क्यों?
इन दोनों संकुलों में लिगैंड भिन्न हैं, जिससे क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Δ₀) में अंतर होता है। $\mathrm{CN}^-$ एक प्रबल लिगैंड है जो अधिक क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन करता है, जिससे d इलेक्ट्रॉन युगलित हो जाते हैं और संकुल का रंग भिन्न होता है। दूसरी ओर, $\mathrm{H}_2\mathrm{O}$ एक दुर्बल लिगैंड है, जिससे कम क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन होता है और इलेक्ट्रॉन युगलित नहीं होते। अतः दोनों संकुलों के रंग भिन्न होते हैं।
5.22 धातु काबौनिलों में आबंध की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
धातु काबौनिलों में धातु और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) के बीच आबंध मुख्यतः σ-दान और π-प्रत्यावर्तन (π-back bonding) द्वारा होता है। CO का कार्बन परमाणु धातु को σ-दान करता है, जबकि धातु के d-ऑर्बिटल से CO के π* एंटीबॉन्डिंग ऑर्बिटल में π-प्रत्यावर्तन होता है। यह द्विदिश आबंध धातु-काबौनिल यौगिकों को स्थिर बनाता है।
5.23 निम्न संकुलों में केंद्रीय धातु आयन की ऑक्सीकरण अवस्था, d कक्षकों का अधिग्रहण एवं उपसहसंयोजन संख्या बतलाइए— (i) $\mathrm{K}_{3}[\mathrm{Co}(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4})_{3}]$ (ii) $\mathrm{ciS}\cdot[\mathrm{CrCl}_{2}(\mathrm{en})_{2}]\mathrm{Cl}$ (iii) $\left[\mathrm{NH}_{4}\right)_{2}[\mathrm{CoF}_{4}]$ (iv) $\left[\mathrm{Mn}\left(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}\right)_{6}\right]\mathrm{SO}_{4}$
(i) $\mathrm{K}_{3}[\mathrm{Co}(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4})_{3}]$:
- केंद्रीय धातु: Co
- ऑक्सीकरण अवस्था: +3 (Co के 3 K⁺ के साथ)
- d कक्षकों का अधिग्रहण: Co³⁺ का इलेक्ट्रॉन विन्यास d⁶
- उपसहसंयोजन संख्या: 6 (तीन ऑक्सालेट लिगैंड, प्रत्येक द्विकेंद्रित)
(ii) $\mathrm{ciS}\cdot[\mathrm{CrCl}_{2}(\mathrm{en})_{2}]\mathrm{Cl}$:
- केंद्रीय धातु: Cr
- ऑक्सीकरण अवस्था: +3 (Cl⁻ आयन के संतुलन से)
- d कक्षकों का अधिग्रहण: Cr³⁺ d³
- उपसहसंयोजन संख्या: 6 (2 Cl⁻ + 2 en (दो-दंत लिगैंड))
(iii) $\left[\math
5.24 निम्न संकुलों के IUPAC नाम लिखिए तथा ऑक्सीकरण अवस्था, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और उपसहसंयोजन संख्या दर्शाइए। संकुल का त्रिविम रसायन तथा चुंबकीय आघूर्ण भी बतलाइए: (i) $\mathrm{K}[\mathrm{Cr}(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O})_{2}(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4})_{2}]\cdot 3 \mathrm{H}_{2} \mathrm{O}$ (ii) $\left[\mathrm{Co}\left(\mathrm{NH}_{3}\right)_{5} \mathrm{Cl}\right]\mathrm{Cl}_{2}$ (iii) $\left[\mathrm{CrCl}_{3}(\mathrm{py})_{3}\right]$ (iv) $\mathrm{K}_{4}[\mathrm{Mn}(\mathrm{CN})_{6}]$ (iv) $\mathrm{Cs}[\mathrm{FeCl}_{4}]$
(i) $\mathrm{K}[\mathrm{Cr}(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O})_{2}(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4})_{2}]\cdot 3 \mathrm{H}_{2} \mathrm{O}$:
- IUPAC नाम: पोटैशियम डाइऑक्सालेटडायहाइड्रेटोक्रोमेट(III) ट्राइहाइड्रेट
- ऑक्सीकरण अवस्था: Cr = +3
- इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: d³
- उपसहसंयोजन संख्या: 6
- त्रिविम रसायन: ऑक्सालेट द्विकेंद्रित लिगैंड के कारण
- चुंबकीय आघूर्ण: प्रबल अनुचुंबकीय (3 अयुगलित इलेक्ट्रॉन)
(ii) $\left[\mathrm{Co}\left(\mathrm{NH}_{3}\right)_{5} \mathrm{Cl}\right]\mathrm{Cl}_{2}$:
- IUPAC नाम: पें
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