Chapter 5
Chapter 5 — अध्ययन नोट्स
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5.1 उपसहसंयोजन यौगिकों का वर्नर का सिद्धांत
व्याख्या5.1 उपसहसंयोजन यौगिकों का वर्नर का सिद्धांत
उपसहसंयोजन यौगिक आधुनिक अकार्बनिक और जैव अकार्बनिक रसायन तथा रासायनिक उद्योगों के आधार स्तंभ हैं। संक्रमण धातुएं अनेक ऋणायनों अथवा उदासीन अणुओं से इलेक्ट्रॉनों का सहसंयोजन कर संकुल यौगिक बनाती हैं। वर्नर ने उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचनाओं के संबंध में अपने विचार प्रतिपादित किए। उन्होंने धातु आयन के लिए प्राथमिक संयोजकता (primary valence) तथा द्वितीयक संयोजकता (secondary valence) की धारणा दी। प्राथमिक संयोजकता सामान्यतः आयननीय होती है और द्वितीयक संयोजकता अनायनीकृत होती है। वर्नर ने यह भी बताया कि धातु से द्वितीयक संयोजकता से आबंधित आयन समूह विशिष्ट ज्यामितीय व्यवस्था में व्यवस्थित रहते हैं, जिन्हें समन्वय बहुफलक (coordination polyhedron) कहा जाता है। उदाहरण के लिए, कोबाल्ट (III) क्लोराइड-अमोनिया संकुलों में विभिन्न रंगों के यौगिकों का अध्ययन करके वर्नर ने यह सिद्ध किया कि धातु से जुड़े क्लोराइड आयनों की संख्या (द्वितीयक संयोजकता) विभिन्न होती है, जबकि कुल संयोजकता समान रहती है। इससे उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचना और गुणधर्मों की समझ मिली। **Table on page 2 (5×3)** | रंग | सूत्र | विलयन चालकता संबंध | | --- | --- | --- | | पीला | [Co(NH₃)₆]³⁺3Cl⁻ | 1:3 विद्युत अपघट्य | | नीललोहित | [CoCl(NH₃)₅]²⁺2Cl⁻ | 1:2 विद्युत अपघट्य | | हरा | [CoCl₂(NH₃)₄]⁺Cl⁻ | 1:1 विद्युत अपघट्य | | बैंगनी | [CoCl₂(NH₃)₄]⁺Cl⁻ | 1:1 विद्युत अपघट्य | **Table on page 3 (6×2)** | सूत्र | आधिक्य में AgNO₃ मिलाने पर एक मोल यौगिक से अवक्षेपित AgCl के मोलों की संख्या | | --- | --- | | (i) PdCl₂·4NH₃ | 2 | | (ii) NiCl₂·6H₂O | 2 | | (iii) PtCl₄·2HCl | 0 | | (iv) CoCl₃·4NH₃ | 1 | | (v) PtCl₂·2NH₃ | 0 |
- उपसहसंयोजन यौगिकों में धातु दो प्रकार की संयोजकताएं दर्शाती है: प्राथमिक और द्वितीयक।
- प्राथमिक संयोजकता आयननीय होती है, द्वितीयक संयोजकता अनायनीकृत होती है।
- धातु से द्वितीयक संयोजकता से जुड़े लिगन्ड विशिष्ट ज्यामितीय व्यवस्था में होते हैं।
- वर्नर ने उपसहसंयोजन यौगिकों की संरचना और गुणधर्मों का अध्ययन किया।
- धातु की द्वितीयक संयोजकता को समन्वय संख्या कहा जाता है।
- वर्नर का सिद्धांत उपसहसंयोजन यौगिकों के अध्ययन का आधार है।
- 📌 उपसहसंयोजन यौगिक: धातु आयन और उससे जुड़े लिगन्डों का संकुल।
- 📌 प्राथमिक संयोजकता: धातु की आयननीय संयोजकता।
- 📌 द्वितीयक संयोजकता: धातु की अनायनीकृत संयोजकता, जिसे समन्वय संख्या भी कहते हैं।
5.2 उपसहसंयोजन यौगिकों से संबंधित कुछ प्रमुख पारिभाषिक शब्द व उनकी परिभाषाएं
परिभाषा5.2 उपसहसंयोजन यौगिकों से संबंधित कुछ प्रमुख पारिभाषिक शब्द व उनकी परिभाषाएं
उपसहसंयोजन यौगिकों के अध्ययन में कुछ महत्वपूर्ण शब्दावली और उनकी परिभाषाएं आवश्यक हैं। (क) उपसहसंयोजन सत्ता (Coordination Entity): केंद्रीय धातु परमाणु/आयन और उससे जुड़े लिगन्डों का समूह। उदाहरण: [CoCl₃(NH₃)₃], [Ni(CO)₄]। (ख) केंद्रीय परमाणु/आयन: वह परमाणु या आयन जो लिगन्डों से जुड़ा होता है और जिसके चारों ओर लिगन्ड व्यवस्थित होते हैं। उदाहरण: Ni²⁺, Co³⁺। (ग) लिगन्ड: वे आयन या अणु जो केंद्रीय धातु से आबंधित होते हैं। ये एकदंतुर (एक दाता परमाणु), द्विदंतुर (दो दाता परमाणु), या बहुदंतुर (अनेक दाता परमाणु) हो सकते हैं। उदाहरण: Cl⁻ (एकदंतुर), en (द्विदंतुर), EDTA⁴⁻ (षट्दंतुर)। (घ) उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number): केंद्रीय धातु से जुड़े लिगन्डों के दाता परमाणुओं की संख्या। उदाहरण: [PtCl₆]²⁻ में CN=6, [Ni(NH₃)₄]²⁺ में CN=4। (च) समन्वय मंडल (Coordination Sphere): गुरूकोष्ठक में लिखी गई केंद्रीय धातु और उसके लिगन्डों का समूह। (छ) समन्वय बहुफलक (Coordination Polyhedron): केंद्रीय धातु के चारों ओर लिगन्डों की ज्यामितीय व्यवस्था, जैसे अष्टफलकीय, चतुष्फलकीय, वर्ग समतली। (ज) केंद्रीय परमाणु की ऑक्सीकरण संख्या: केंद्रीय धातु पर उपस्थित आवेश, जो लिगन्डों को हटाने पर बचता है। (डा) होमोलेप्टिक और हेट्रोलैप्टिक संकुल: होमोलेप्टिक में सभी लिगन्ड एक समान प्रकार के, हेट्रोलैप्टिक में विभिन्न प्रकार के होते हैं।
- उपसहसंयोजन सत्ता में केंद्रीय धातु और लिगन्ड शामिल होते हैं।
- लिगन्ड एकदंतुर, द्विदंतुर या बहुदंतुर हो सकते हैं।
- उपसहसंयोजन संख्या लिगन्डों के दाता परमाणुओं की संख्या होती है।
- समन्वय मंडल गुरूकोष्ठक में लिखा जाता है, प्रतिआयन बाहर।
- समन्वय बहुफलक लिगन्डों की ज्यामितीय व्यवस्था को दर्शाता है।
- होमोलेप्टिक संकुल में एक प्रकार के लिगन्ड, हेट्रोलैप्टिक में विभिन्न प्रकार के लिगन्ड होते हैं।
- 📌 उपसहसंयोजन सत्ता: केंद्रीय धातु और उसके लिगन्डों का समूह।
- 📌 लिगन्ड: केंद्रीय धातु से जुड़े आयन या अणु।
- 📌 उपसहसंयोजन संख्या: केंद्रीय धातु से जुड़े दाता परमाणुओं की संख्या।
5.3 उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण
व्याख्या5.3 उपसहसंयोजन यौगिकों का नामकरण
उपसहसंयोजन यौगिकों के नामकरण के लिए IUPAC के नियमों का पालन किया जाता है ताकि नाम स्पष्ट और असंदिग्ध हों। 5.3.1 एककेंद्रकीय उपसहसंयोजन यौगिकों के सूत्र लिखने के नियम: (i) सर्वप्रथम केंद्रीय धातु लिखा जाता है। (ii) लिगन्डों को अंग्रेजी वर्णमाला के क्
अभ्यास प्रश्न — Chapter 5
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.5.21 $\left[\mathrm{Fe}(\mathrm{CN})_{6}\right]^{4-}$ तथा $\left[\mathrm{Fe}\left(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}\right)_{6}\right]^{2+}$ के तनु विलयनों के रंग भिन्न होते हैं। क्यों?
उत्तर:
इन दोनों संकुलों में लिगैंड भिन्न हैं, जिससे क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Δ₀) में अंतर होता है। $\mathrm{CN}^-$ एक प्रबल लिगैंड है जो अधिक क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन करता है, जिससे d इलेक्ट्रॉन युगलित हो जाते हैं और संकुल का रंग भिन्न होता है। दूसरी ओर, $\mathrm{H}_2\mathrm{O}$ एक दुर्बल लिगैंड है, जिससे कम क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन होता है और इलेक्ट्रॉन युगलित नहीं होते। अतः दोनों संकुलों के रंग भिन्न होते हैं।
व्याख्या:
प्रबल लिगैंड $\mathrm{CN}^-$ के कारण $\left[\mathrm{Fe}(\mathrm{CN})_{6}\right]^{4-}$ में उच्च क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन होता है, जिससे इलेक्ट्रॉन युगलित होकर कम ऊर्जा स्तर पर रहते हैं। $\left[\mathrm{Fe}\left(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}\right)_{6}\right]^{2+}$ में कम क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन के कारण अधिक अयुगलित इलेक्ट्रॉन होते हैं। इससे दोनों के d-d संक्रमण की ऊर्जा भिन्न होती है, जो रंग में अंतर उत्पन्न करता है।
Q2.5.22 धातु काबौनिलों में आबंध की प्रकृति की विवेचना कीजिए।
उत्तर:
धातु काबौनिलों में धातु और कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) के बीच आबंध मुख्यतः σ-दान और π-प्रत्यावर्तन (π-back bonding) द्वारा होता है। CO का कार्बन परमाणु धातु को σ-दान करता है, जबकि धातु के d-ऑर्बिटल से CO के π* एंटीबॉन्डिंग ऑर्बिटल में π-प्रत्यावर्तन होता है। यह द्विदिश आबंध धातु-काबौनिल यौगिकों को स्थिर बनाता है।
व्याख्या:
CO लिगैंड σ-दानकर्ता और π-अस्वीकारक होता है। धातु से CO को π-प्रत्यावर्तन से इलेक्ट्रॉन घनत्व CO के π* ऑर्बिटल में भेजा जाता है, जिससे धातु-CO आबंध मजबूत होता है। इस कारण धातु काबौनिलों में आबंध की प्रकृति विशेष होती है, जो उनके रासायनिक और भौतिक गुणों को प्रभावित करती है।
Q3.5.23 निम्न संकुलों में केंद्रीय धातु आयन की ऑक्सीकरण अवस्था, d कक्षकों का अधिग्रहण एवं उपसहसंयोजन संख्या बतलाइए— (i) $\mathrm{K}_{3}[\mathrm{Co}(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4})_{3}]$ (ii) $\mathrm{ciS}\cdot[\mathrm{CrCl}_{2}(\mathrm{en})_{2}]\mathrm{Cl}$ (iii) $\left[\mathrm{NH}_{4}\right)_{2}[\mathrm{CoF}_{4}]$ (iv) $\left[\mathrm{Mn}\left(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}\right)_{6}\right]\mathrm{SO}_{4}$
उत्तर:
(i) $\mathrm{K}_{3}[\mathrm{Co}(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4})_{3}]$: - केंद्रीय धातु: Co - ऑक्सीकरण अवस्था: +3 (Co के 3 K⁺ के साथ) - d कक्षकों का अधिग्रहण: Co³⁺ का इलेक्ट्रॉन विन्यास d⁶ - उपसहसंयोजन संख्या: 6 (तीन ऑक्सालेट लिगैंड, प्रत्येक द्विकेंद्रित) (ii) $\mathrm{ciS}\cdot[\mathrm{CrCl}_{2}(\mathrm{en})_{2}]\mathrm{Cl}$: - केंद्रीय धातु: Cr - ऑक्सीकरण अवस्था: +3 (Cl⁻ आयन के संतुलन से) - d कक्षकों का अधिग्रहण: Cr³⁺ d³ - उपसहसंयोजन संख्या: 6 (2 Cl⁻ + 2 en (दो-दंत लिगैंड)) (iii) $\left[\mathrm{NH}_{4}\right)_{2}[\mathrm{CoF}_{4}]$: - केंद्रीय धातु: Co - ऑक्सीकरण अवस्था: +2 - d कक्षकों का अधिग्रहण: Co²⁺ d⁷ - उपसहसंयोजन संख्या: 4 (चार F⁻ लिगैंड) (iv) $\left[\mathrm{Mn}\left(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}\right)_{6}\right]\mathrm{SO}_{4}$: - केंद्रीय धातु: Mn - ऑक्सीकरण अवस्था: +2 - d कक्षकों का अधिग्रहण: Mn²⁺ d⁵ - उपसहसंयोजन संख्या: 6 (6 H₂O लिगैंड)
व्याख्या:
प्रत्येक संकुल में केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था संतुलन के आधार पर निर्धारित की जाती है। d कक्षकों की संख्या केंद्रीय धातु के इलेक्ट्रॉन विन्यास से ज्ञात होती है। उपसहसंयोजन संख्या लिगैंड की संख्या और प्रकार से निर्धारित होती है।
Q4.5.24 निम्न संकुलों के IUPAC नाम लिखिए तथा ऑक्सीकरण अवस्था, इलेक्ट्रॉनिक विन्यास और उपसहसंयोजन संख्या दर्शाइए। संकुल का त्रिविम रसायन तथा चुंबकीय आघूर्ण भी बतलाइए: (i) $\mathrm{K}[\mathrm{Cr}(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O})_{2}(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4})_{2}]\cdot 3 \mathrm{H}_{2} \mathrm{O}$ (ii) $\left[\mathrm{Co}\left(\mathrm{NH}_{3}\right)_{5} \mathrm{Cl}\right]\mathrm{Cl}_{2}$ (iii) $\left[\mathrm{CrCl}_{3}(\mathrm{py})_{3}\right]$ (iv) $\mathrm{K}_{4}[\mathrm{Mn}(\mathrm{CN})_{6}]$ (iv) $\mathrm{Cs}[\mathrm{FeCl}_{4}]$
उत्तर:
(i) $\mathrm{K}[\mathrm{Cr}(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O})_{2}(\mathrm{C}_{2} \mathrm{O}_{4})_{2}]\cdot 3 \mathrm{H}_{2} \mathrm{O}$: - IUPAC नाम: पोटैशियम डाइऑक्सालेटडायहाइड्रेटोक्रोमेट(III) ट्राइहाइड्रेट - ऑक्सीकरण अवस्था: Cr = +3 - इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: d³ - उपसहसंयोजन संख्या: 6 - त्रिविम रसायन: ऑक्सालेट द्विकेंद्रित लिगैंड के कारण - चुंबकीय आघूर्ण: प्रबल अनुचुंबकीय (3 अयुगलित इलेक्ट्रॉन) (ii) $\left[\mathrm{Co}\left(\mathrm{NH}_{3}\right)_{5} \mathrm{Cl}\right]\mathrm{Cl}_{2}$: - IUPAC नाम: पेंटाअमीनक्लोरिडोकोबाल्ट(III) क्लोराइड - ऑक्सीकरण अवस्था: Co = +3 - इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: d⁶ - उपसहसंयोजन संख्या: 6 - त्रिविम रसायन: ऑक्टाहेड्रल - चुंबकीय आघूर्ण: प्रबल अनुचुंबकीय (0 अयुगलित इलेक्ट्रॉन) (iii) $\left[\mathrm{CrCl}_{3}(\mathrm{py})_{3}\right]$: - IUPAC नाम: ट्राइक्लोरिडोट्रिपाइरिडिनक्रोमियम(III) - ऑक्सीकरण अवस्था: Cr = +3 - इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: d³ - उपसहसंयोजन संख्या: 6 - त्रिविम रसायन: ऑक्टाहेड्रल - चुंबकीय आघूर्ण: प्रबल अनुचुंबकीय (iv) $\mathrm{K}_{4}[\mathrm{Mn}(\mathrm{CN})_{6}]$: - IUPAC नाम: पोटैशियम हेक्सासायनोडोमांगनेट(II) - ऑक्सीकरण अवस्था: Mn = +2 - इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: d⁵ - उपसहसंयोजन संख्या: 6 - त्रिविम रसायन: ऑक्टाहेड्रल - चुंबकीय आघूर्ण: प्रबल अनुचुंबकीय या प्रबल अनुचुंबकीय (CN⁻ प्रबल लिगैंड) (v) $\mathrm{Cs}[\mathrm{FeCl}_{4}]$: - IUPAC नाम: सेसियम टेट्राक्लोरिडोफेर्रेट(III) - ऑक्सीकरण अवस्था: Fe = +3 - इलेक्ट्रॉनिक विन्यास: d⁵ - उपसहसंयोजन संख्या: 4 - त्रिविम रसायन: टेट्राहेड्रल - चुंबकीय आघूर्ण: प्रबल अनुचुंबकीय
व्याख्या:
प्रत्येक संकुल के लिए केंद्रीय धातु की ऑक्सीकरण अवस्था संतुलन से ज्ञात की जाती है। इलेक्ट्रॉनिक विन्यास केंद्रीय धातु के d इलेक्ट्रॉनों की संख्या दर्शाता है। उपसहसंयोजन संख्या लिगैंड की संख्या और प्रकार पर निर्भर करती है। त्रिविम रसायन और चुंबकीय आघूर्ण लिगैंड के प्रकार और संकुल की ज्यामिति पर आधारित होते हैं।
Q5.5.25 क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत के आधार पर संकुल $\left[\mathrm{Ti}\left(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}\right)_{6}\right]^{3+}$ के बैगनी रंग की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
संकुल $\left[\mathrm{Ti}\left(\mathrm{H}_{2} \mathrm{O}\right)_{6}\right]^{3+}$ में Ti³⁺ का इलेक्ट्रॉन विन्यास d¹ है। जल लिगैंड एक दुर्बल क्षेत्र लिगैंड है, जिससे क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा कम होती है। d-d संक्रमण के कारण यह संकुल बैगनी रंग का होता है।
व्याख्या:
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत के अनुसार, d¹ इलेक्ट्रॉन d कक्षकों में से निम्न ऊर्जा वाले कक्षक में होता है। दृश्य प्रकाश के कुछ तरंगदैर्घ्य अवशोषित होते हैं, जिससे संकुल का रंग बैगनी दिखाई देता है।
Q6.5.26 कोलेट प्रभाव से क्या तात्पर्य है? एक उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
कोलेट प्रभाव वह प्रभाव है जिसमें एक लिगैंड के जुड़ने से केंद्रीय धातु आयन की ध्रुवीयता कम हो जाती है, जिससे दूसरे लिगैंड के जुड़ने की प्रवृत्ति प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए, $\left[\mathrm{Co}(\mathrm{NH}_3)_5 \mathrm{Cl}\right]^{2+}$ में $\mathrm{NH}_3$ लिगैंड के कारण Cl⁻ लिगैंड का जुड़ना प्रभावित होता है।
व्याख्या:
कोलेट प्रभाव से यह समझा जाता है कि पहले से जुड़े लिगैंड केंद्रीय धातु के चारों ओर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाकर नए लिगैंड के जुड़ने की क्षमता को कम या बढ़ा सकते हैं। यह प्रभाव संकुलों के स्थिरता और अभिक्रियाशीलता को प्रभावित करता है।
Q7.5.27 प्रत्येक का एक उदाहरण देते हुए निम्नलिखित में उपसहसंयोजन यौगिकों की भूमिका की संक्षिप्त विवेचना कीजिए— (i) जैव प्रणालियाँ (ii) विश्लेषणात्मक रसायन (iii) औषध रसायन (iv) धातुओं का निष्कर्षण/धातु कर्म।
उत्तर:
(i) जैव प्रणालियाँ: उदाहरण: हीम समूह में Fe का उपसहसंयोजन। यह ऑक्सीजन परिवहन में सहायक होता है। (ii) विश्लेषणात्मक रसायन: उदाहरण: $\left[\mathrm{Ni}( ext{en})_3\right]^{2+}$ का उपयोग विश्लेषण में धातु आयनों के पृथक्करण में होता है। (iii) औषध रसायन: उदाहरण: कार्बोप्लैटिन, जो कैंसर उपचार में उपयोगी है। (iv) धातुओं का निष्कर्षण/धातु कर्म: उदाहरण: $\left[\mathrm{Fe}( ext{CN})_6\right]^{4-}$ का उपयोग लोहे के निष्कर्षण में।
व्याख्या:
उपसहसंयोजन यौगिक विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जैव प्रणालियों में वे जीवन प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक होते हैं, विश्लेषणात्मक रसायन में धातु आयनों की पहचान और पृथक्करण करते हैं, औषध रसायन में दवाओं के रूप में कार्य करते हैं तथा धातु निष्कर्षण में धातुओं को अलग करने में सहायक होते हैं।
Q8.5.28 संकुल $\left[\mathrm{Co}\left(\mathrm{NH}_{3}\right)_{6}\right]\mathrm{Cl}_{2}$ से विलयन में कितने आयन उत्पन्न होंगे— (i) 6 (ii) 4 (iii) 3 (iv) 2
उत्तर:
संकुल $\left[\mathrm{Co}\left(\mathrm{NH}_{3}\right)_{6}\right]\mathrm{Cl}_{2}$ में केंद्रीय आयन $\left[\mathrm{Co}(\mathrm{NH}_3)_6\right]^{3+}$ है और दो Cl⁻ आयन बाह्य हैं। विलयन में यह संकुल 3 आयनों में विघटित होगा: एक $\left[\mathrm{Co}(\mathrm{NH}_3)_6\right]^{3+}$ और दो Cl⁻। अतः कुल 3 आयन उत्पन्न होंगे।
व्याख्या:
संकुल में $\mathrm{Cl}_2$ बाह्य आयन हैं जो विलयन में स्वतंत्र Cl⁻ के रूप में उपस्थित होंगे। केंद्रीय आयन एक है। इसलिए कुल आयनों की संख्या 3 होगी।
Rasayan vigyan bhag I के सभी 5 अध्याय
Chemistry · Class 12