Sanskritकक्षा 11ईशः कुत्रास्तिहिंदी

ईशः कुत्रास्ति | Class 11 Sanskrit Notes

द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 2 मिनट का पठन

ईशः कुत्रास्ति | Class 11 Sanskrit Notes

ईशः कुत्रास्ति – this guide gives you a concise, exam-ready overview of ईशः कुत्रास्ति from Class 11 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.

श्लोक का शब्दार्थ

इस खंड में 'ईशः कुत्रास्ति' श्लोक के प्रत्येक शब्द का विस्तारपूर्वक अर्थ समझाया गया है। जैसे 'देवागारे' का अर्थ है देवालय या मंदिर, 'पिहितद्वारे' का अर्थ है बंद दरवाजा, 'तमोवृत्ते' का अर्थ है अंधकार से घिरा हुआ। श्लोक में कहा गया है कि जब हम मंदिर के बंद दरवाजे के भीतर अंधकार में रहते हैं, तब हम किसे पूजते हैं? जपमाला और गान छोड़ दो क्योंकि वहाँ ईश्वर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होता। इसके विपरीत, श्लोक में यह बताया गया है कि ईश्वर कठिन भूमि में है जहाँ किसान हल चलाता है, जहाँ मजदूर पत्थर तोड़ता है। शब्दार्थ में प्रत्येक शब्द को संस्कृत से हिंदी में सरल भाषा में समझाया गया है ताकि विद्यार्थी श्लोक का मूल भाव समझ सकें। इस प्रकार शब्दार्थ श्लोक की गहनता को समझने का आधार प्रदान करता है।

📊 Diagram: Figure on page 1; Figure on page 1; तत्रास्तीश:, कठिनां भूमिं

🧪 Activity: श्लोक के शब्दों का अर्थ लिखना और उनका उच्चारण अभ्यास।

🔗 Connection: शब्दार्थ के बाद श्लोक की विस्तृत व्याख्या की जाएगी।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. संस्कृतभाषया उत्तरं दीयताम्। (क) ईश: कुत्रास्ति? इति पाठ: कस्माद् ग्रन्थाल्सङ्कलित:? (ख) लाङ्गलिक: किं करोति? (ग) प्रस्तरखण्डान् क: दारयते? (घ) ईश्वर: काव्यां सार्द्धं तिष्ठति? (ङ) कवि: जनान् कुत्र गन्तुं प्रेरयति? (च) कवि: किं चिन्तयितुं कथयति?

1.(क) ईशः तत्रास्ति, यत्र कठिनां भूमिं दारयते। पाठः "ईशः कुत्रास्ति?" इति प्रश्नः ग्रन्थाल्सङ्कलितः 'ईशः कुत्रास्ति' इति काव्ये संकलितः। (ख) लाङ्गलिकः लाङ्गुलं वहति, यत् कृषिकर्मे उपयोगी अस्ति। (ग) प्रस्तरखण्डान् कृषकः दारयते, यः भूमिं कठिनां दारयति। (घ) ईश्वरः काव्यं सार्धं तिष्ठति, यतः सः काव्ये ईशः रूपेण दर्शितः। (ङ) कविः जनान् कठिनां भूमिं दारयितुं प्रेरयति, यतः तेन कृषिकर्मणि उत्साहः जायते। (च) कविः चिन्तयितुं कथयति कृषिकर्मस्य महत्त्वं, ईशः भूमिं दारयति इति।

2. “तत्रास्तीश: कठिनां भूमिं ………… दारयते”। इत्यस्य काव्यांशस्य व्याख्या हिन्दीभाषया कर्तव्या।

इस श्लोक का अर्थ है कि वहाँ ईश (भगवान) कठिन भूमि को जो कठोर और उपजाऊ नहीं है, उसे जोतता है। इसका भाव यह है कि ईश अपने कर्म से कठिनाइयों को भी सरल और उपयोगी बना देता है। यह काव्यांश यह दर्शाता है कि ईश की शक्ति से कठिन से कठिन कार्य भी संभव हो जाते हैं।

3. रिक्तस्थानानि पूर्यत। (क) अस्मिन् …………………… कं भजसे। (ख) स्वेदजलाई: …………………… तिष्ठ। (ग) ध्यानं हित्वा …………………… एहि। (घ) यदि तव …………………… धूसरितं स्यात्।

(क) अस्मिन् काले कं भजसे। (ख) स्वेदजलाई: समीपे तिष्ठ। (ग) ध्यानं हित्वा गच्छ एहि। (घ) यदि तव मुखं धूसरितं स्यात्।

4. अधोलिखितपदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत। सार्द्धम्, सविधे, हित्वा, एहि, धूसरितम्, भवेत्।

1) सः मित्रेण सार्धं गच्छति। 2) त्वं सविधे कार्यं कुरु। 3) ध्यानं हित्वा गच्छ। 4) गृहं एहि शीघ्रं। 5) यदि मुखं धूसरितं भवेत्, तर्हि विश्रान्तिं गृह्णीहि। 6) भवेत् सर्वे सुखिनः।

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