Chapter 9
Chapter 9 — अध्ययन नोट्स
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ईश: कुत्रास्ति - परिचय
व्याख्याईश: कुत्रास्ति - परिचय
इस अध्याय में संस्कृत के प्रसिद्ध श्लोक 'ईशः कुत्रास्ति' का विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह श्लोक नोबेल पुरस्कार विजेता कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वविख्यात कृति गीताञ्जलि के संस्कृत अनुवाद से लिया गया है, जिसका अनुवाद को. ल. व्यासराय शास्त्री ने किया है। इस श्लोक में कवि ने ईश्वर की वास्तविक सत्ता को किसानों, मजदूरों और गरीबों के जीवन में दर्शाया है। अध्याय की शुरुआत में श्लोक प्रस्तुत किया गया है, जो जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझाने का प्रयास करता है। यह श्लोक हमें यह समझाता है कि ईश्वर केवल मंदिरों या पूजा स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह कठिन परिश्रम करने वाले लोगों के बीच, उनकी मेहनत और संघर्ष में विद्यमान है। इस प्रकार यह अध्याय ईश्वर की सर्वव्यापकता और उसकी साक्षात अनुभूति को सरल भाषा में प्रस्तुत करता है।
- श्लोक 'ईशः कुत्रास्ति' गीताञ्जलि से लिया गया है।
- रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा रचित, को. ल. व्यासराय शास्त्री ने संस्कृत में अनुवाद किया।
- ईश्वर की सत्ता को किसानों, मजदूरों और गरीबों के जीवन में दर्शाया गया है।
- ईश्वर को केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि हर जगह माना गया है।
- अध्याय का उद्देश्य ईश्वर की सर्वव्यापकता को समझाना है।
- 📌 गीताञ्जलि: रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध काव्य कृति।
- 📌 ईश: - ईश्वर, परमात्मा।
- 📌 संस्कृत अनुवाद - मूल काव्य का संस्कृत में रूपांतरण।
श्लोक का शब्दार्थ
व्याख्याश्लोक का शब्दार्थ
इस खंड में 'ईशः कुत्रास्ति' श्लोक के प्रत्येक शब्द का विस्तारपूर्वक अर्थ समझाया गया है। जैसे 'देवागारे' का अर्थ है देवालय या मंदिर, 'पिहितद्वारे' का अर्थ है बंद दरवाजा, 'तमोवृत्ते' का अर्थ है अंधकार से घिरा हुआ। श्लोक में कहा गया है कि जब हम मंदिर के बंद दरवाजे के भीतर अंधकार में रहते हैं, तब हम किसे पूजते हैं? जपमाला और गान छोड़ दो क्योंकि वहाँ ईश्वर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होता। इसके विपरीत, श्लोक में यह बताया गया है कि ईश्वर कठिन भूमि में है जहाँ किसान हल चलाता है, जहाँ मजदूर पत्थर तोड़ता है। शब्दार्थ में प्रत्येक शब्द को संस्कृत से हिंदी में सरल भाषा में समझाया गया है ताकि विद्यार्थी श्लोक का मूल भाव समझ सकें। इस प्रकार शब्दार्थ श्लोक की गहनता को समझने का आधार प्रदान करता है।
- 'देवागारे' का अर्थ है देवालय।
- 'पिहितद्वारे' का अर्थ है बंद दरवाजा।
- 'तमोवृत्ते' का अर्थ है अंधकार से घिरा हुआ।
- 'जपमाला' का अर्थ है मंत्र जपने की माला।
- 'नास्त्यत्रेश:' का अर्थ है वहाँ ईश्वर नहीं है।
- 'तत्रास्तीश:' का अर्थ है वहाँ ईश्वर है।
- 📌 देवागारे - मंदिर या देवालय।
- 📌 पिहितद्वारे - बंद दरवाजा।
- 📌 तमोवृत्ते - अंधकार से घिरा हुआ।
श्लोक की व्याख्या
व्याख्याश्लोक की व्याख्या
इस भाग में श्लोक 'ईशः कुत्रास्ति' की विस्तृत व्याख्या दी गई है। श्लोक में पूछा गया है कि ईश्वर कहाँ है? इसका उत्तर देते हुए बताया गया है कि ईश्वर इस संसार के प्रत्येक भाग में विद्यमान है। वह केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि कठिन परिश्रम करने वाले किसानों
अभ्यास प्रश्न — Chapter 9
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. संस्कृतभाषया उत्तरं दीयताम्। (क) ईश: कुत्रास्ति? इति पाठ: कस्माद् ग्रन्थाल्सङ्कलित:? (ख) लाङ्गलिक: किं करोति? (ग) प्रस्तरखण्डान् क: दारयते? (घ) ईश्वर: काव्यां सार्द्धं तिष्ठति? (ङ) कवि: जनान् कुत्र गन्तुं प्रेरयति? (च) कवि: किं चिन्तयितुं कथयति?
उत्तर:
1.(क) ईशः तत्रास्ति, यत्र कठिनां भूमिं दारयते। पाठः "ईशः कुत्रास्ति?" इति प्रश्नः ग्रन्थाल्सङ्कलितः 'ईशः कुत्रास्ति' इति काव्ये संकलितः। (ख) लाङ्गलिकः लाङ्गुलं वहति, यत् कृषिकर्मे उपयोगी अस्ति। (ग) प्रस्तरखण्डान् कृषकः दारयते, यः भूमिं कठिनां दारयति। (घ) ईश्वरः काव्यं सार्धं तिष्ठति, यतः सः काव्ये ईशः रूपेण दर्शितः। (ङ) कविः जनान् कठिनां भूमिं दारयितुं प्रेरयति, यतः तेन कृषिकर्मणि उत्साहः जायते। (च) कविः चिन्तयितुं कथयति कृषिकर्मस्य महत्त्वं, ईशः भूमिं दारयति इति।
व्याख्या:
प्रत्येक प्रश्नस्य संस्कृतपाठानुसारं उत्तरं संस्कृतभाषया दत्तम्। पाठस्य भावानुसारं प्रत्येकस्य प्रश्नस्य उत्तरं स्पष्टीकृतम्।
Q2.2. “तत्रास्तीश: कठिनां भूमिं ………… दारयते”। इत्यस्य काव्यांशस्य व्याख्या हिन्दीभाषया कर्तव्या।
उत्तर:
इस श्लोक का अर्थ है कि वहाँ ईश (भगवान) कठिन भूमि को जो कठोर और उपजाऊ नहीं है, उसे जोतता है। इसका भाव यह है कि ईश अपने कर्म से कठिनाइयों को भी सरल और उपयोगी बना देता है। यह काव्यांश यह दर्शाता है कि ईश की शक्ति से कठिन से कठिन कार्य भी संभव हो जाते हैं।
व्याख्या:
श्लोक में 'तत्रास्तीशः कठिनां भूमिं दारयते' का अर्थ है कि ईश उस कठिन भूमि को जोतता है। कठिन भूमि का अर्थ है वह भूमि जो कठोर और उपजाऊ नहीं है। व्याख्या में यह बताया गया है कि ईश की कृपा से कठिन कार्य भी सफल होते हैं।
Q3.3. रिक्तस्थानानि पूर्यत। (क) अस्मिन् …………………… कं भजसे। (ख) स्वेदजलाई: …………………… तिष्ठ। (ग) ध्यानं हित्वा …………………… एहि। (घ) यदि तव …………………… धूसरितं स्यात्।
उत्तर:
(क) अस्मिन् काले कं भजसे। (ख) स्वेदजलाई: समीपे तिष्ठ। (ग) ध्यानं हित्वा गच्छ एहि। (घ) यदि तव मुखं धूसरितं स्यात्।
व्याख्या:
प्रत्येक रिक्तस्थान में उचित शब्दों का चयन पाठ के अनुसार किया गया है। उदाहरणतः (क) में 'काले' उपयुक्त है क्योंकि समय दर्शाना आवश्यक है। (ख) में 'समीपे' स्थान सूचित करता है। (ग) में क्रिया के अनुसार 'गच्छ' उपयुक्त है। (घ) में 'मुखं' शरीर के अंग के रूप में उपयुक्त है।
Q4.4. अधोलिखितपदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत। सार्द्धम्, सविधे, हित्वा, एहि, धूसरितम्, भवेत्।
उत्तर:
1) सः मित्रेण सार्धं गच्छति। 2) त्वं सविधे कार्यं कुरु। 3) ध्यानं हित्वा गच्छ। 4) गृहं एहि शीघ्रं। 5) यदि मुखं धूसरितं भवेत्, तर्हि विश्रान्तिं गृह्णीहि। 6) भवेत् सर्वे सुखिनः।
व्याख्या:
प्रत्येक शब्द का वाक्य में उचित प्रयोग किया गया है। 'सार्धम्' का अर्थ 'साथ में', 'सविधे' का अर्थ 'समय पर', 'हित्वा' का अर्थ 'छोड़कर', 'एहि' का अर्थ 'आओ', 'धूसरितम्' का अर्थ 'धूसर रंग का', तथा 'भवेत्' का अर्थ 'हो सकता है' या 'हो' है।
Q5.5. अधोलिखितेषु सन्धिं कुरुत। तमोवृते + अस्मिन् = ……………… ईश: + तिष्ठति = ……………… बहि: + एहि = ………………
उत्तर:
1) तमोवृते + अस्मिन् = तमोवृतेऽस्मिन् 2) ईश: + तिष्ठति = ईशः तिष्ठति (असंधि) 3) बहिः + एहि = बहिर्एहि
व्याख्या:
सन्धि नियमों के अनुसार: - 'तमोवृते' अन्तःस्थ 'अ' से 'अस्मिन्' में 'अ' से सन्धि होकर 'ऽ' लग जाता है, अतः 'तमोवृतेऽस्मिन्'। - 'ईश:' और 'तिष्ठति' के बीच सन्धि नहीं होती क्योंकि ये दो स्वतंत्र शब्द हैं, अतः 'ईशः तिष्ठति'। - 'बहि:' और 'एहि' के बीच विसर्ग सन्धि होकर 'र्' ध्वनि उत्पन्न होती है, अतः 'बहिर्एहि'।
Q6.6. अधोऽङ्कितेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत। नास्त्यत्रेश: = ………… + ………… पश्यस्तिष्ठ = ………… + ………… तत्रिकटे = ………… + …………
उत्तर:
1) नास्त्यत्रेशः = नास्ति + अत्रेशः 2) पश्यस्तिष्ठ = पश्य + तिष्ठ 3) तत्रिकटे = तत्र + इकटे
व्याख्या:
सन्धि विच्छेद में शब्दों को उनके मूल रूपों में विभाजित किया गया है। - 'नास्त्यत्रेश:' में 'नास्ति' और 'अत्रेशः' हैं। - 'पश्यस्तिष्ठ' में 'पश्य' और 'तिष्ठ' हैं। - 'तत्रिकटे' में 'तत्र' और 'इकटे' हैं।
Q7.7. ईशस्तिष्ठति ………… पांसुरभूमिम्, इत्यस्य श्लोकस्य अन्वयं लिखत।
उत्तर:
श्लोक का अन्वय इस प्रकार है: ईशः कठिनं पाँसुरभूमिम् तिष्ठति अर्थात् ईशः कठिन और दलदली भूमि पर स्थित है। इसका अर्थ है कि ईश उस कठिन भूमि पर स्थित है जहाँ खेती करना कठिन है। यह श्लोक ईश की शक्ति और धैर्य को दर्शाता है जो कठिन परिस्थितियों में भी कार्य करता है।
व्याख्या:
श्लोक में 'ईशस्तिष्ठति पांसुरभूमिम्' का अर्थ है कि ईश दलदली (पाँसुर) भूमि पर स्थित है। अन्वय में यह स्पष्ट किया गया कि ईश कठिन परिस्थितियों में भी स्थित रहता है और कार्य करता है।
Q8.निम्नलिखित में से कौन सा ग्रन्थ 'ईशः कुत्रास्ति' पाठ का स्रोत है?
उत्तर:
गीताञ्जलि
व्याख्या:
'ईशः कुत्रास्ति' पाठ नोबेल पुरस्कार विजेता कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वविख्यात कृति गीताञ्जलि के संस्कृत अनुवाद से संकलित है।