ईशः कुत्रास्ति | Class 11 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 2 मिनट का पठन

ईशः कुत्रास्ति – this guide gives you a concise, exam-ready overview of ईशः कुत्रास्ति from Class 11 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
ईश: कुत्रास्ति - परिचय
इस अध्याय में संस्कृत के प्रसिद्ध श्लोक 'ईशः कुत्रास्ति' का विशद विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। यह श्लोक नोबेल पुरस्कार विजेता कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की विश्वविख्यात कृति गीताञ्जलि के संस्कृत अनुवाद से लिया गया है, जिसका अनुवाद को. ल. व्यासराय शास्त्री ने किया है। इस श्लोक में कवि ने ईश्वर की वास्तविक सत्ता को किसानों, मजदूरों और गरीबों के जीवन में दर्शाया है। अध्याय की शुरुआत में श्लोक प्रस्तुत किया गया है, जो जीवन के गूढ़ रहस्यों को समझाने का प्रयास करता है। यह श्लोक हमें यह समझाता है कि ईश्वर केवल मंदिरों या पूजा स्थलों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह कठिन परिश्रम करने वाले लोगों के बीच, उनकी मेहनत और संघर्ष में विद्यमान है। इस प्रकार यह अध्याय ईश्वर की सर्वव्यापकता और उसकी साक्षात अनुभूति को सरल भाषा में प्रस्तुत करता है।
📊 Diagram: Figure on page 1; Figure on page 1; तत्रास्तीश:, कठिनां भूमिं
🧪 Activity: अध्याय के प्रारंभ में प्रस्तुत श्लोक का पाठ और उसका उच्चारण।
🔗 Connection: इस परिचय के बाद श्लोक के प्रत्येक शब्द का अर्थ विस्तार से समझाया जाएगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. संस्कृतभाषया उत्तरं दीयताम्। (क) ईश: कुत्रास्ति? इति पाठ: कस्माद् ग्रन्थाल्सङ्कलित:? (ख) लाङ्गलिक: किं करोति? (ग) प्रस्तरखण्डान् क: दारयते? (घ) ईश्वर: काव्यां सार्द्धं तिष्ठति? (ङ) कवि: जनान् कुत्र गन्तुं प्रेरयति? (च) कवि: किं चिन्तयितुं कथयति?
1.(क) ईशः तत्रास्ति, यत्र कठिनां भूमिं दारयते। पाठः "ईशः कुत्रास्ति?" इति प्रश्नः ग्रन्थाल्सङ्कलितः 'ईशः कुत्रास्ति' इति काव्ये संकलितः। (ख) लाङ्गलिकः लाङ्गुलं वहति, यत् कृषिकर्मे उपयोगी अस्ति। (ग) प्रस्तरखण्डान् कृषकः दारयते, यः भूमिं कठिनां दारयति। (घ) ईश्वरः काव्यं सार्धं तिष्ठति, यतः सः काव्ये ईशः रूपेण दर्शितः। (ङ) कविः जनान् कठिनां भूमिं दारयितुं प्रेरयति, यतः तेन कृषिकर्मणि उत्साहः जायते। (च) कविः चिन्तयितुं कथयति कृषिकर्मस्य महत्त्वं, ईशः भूमिं दारयति इति।
2. “तत्रास्तीश: कठिनां भूमिं ………… दारयते”। इत्यस्य काव्यांशस्य व्याख्या हिन्दीभाषया कर्तव्या।
इस श्लोक का अर्थ है कि वहाँ ईश (भगवान) कठिन भूमि को जो कठोर और उपजाऊ नहीं है, उसे जोतता है। इसका भाव यह है कि ईश अपने कर्म से कठिनाइयों को भी सरल और उपयोगी बना देता है। यह काव्यांश यह दर्शाता है कि ईश की शक्ति से कठिन से कठिन कार्य भी संभव हो जाते हैं।
3. रिक्तस्थानानि पूर्यत। (क) अस्मिन् …………………… कं भजसे। (ख) स्वेदजलाई: …………………… तिष्ठ। (ग) ध्यानं हित्वा …………………… एहि। (घ) यदि तव …………………… धूसरितं स्यात्।
(क) अस्मिन् काले कं भजसे। (ख) स्वेदजलाई: समीपे तिष्ठ। (ग) ध्यानं हित्वा गच्छ एहि। (घ) यदि तव मुखं धूसरितं स्यात्।
4. अधोलिखितपदानां वाक्येषु प्रयोगं कुरुत। सार्द्धम्, सविधे, हित्वा, एहि, धूसरितम्, भवेत्।
1) सः मित्रेण सार्धं गच्छति। 2) त्वं सविधे कार्यं कुरु। 3) ध्यानं हित्वा गच्छ। 4) गृहं एहि शीघ्रं। 5) यदि मुखं धूसरितं भवेत्, तर्हि विश्रान्तिं गृह्णीहि। 6) भवेत् सर्वे सुखिनः।
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