परोपकाराय संतां विभूतयः | Class 11 Sanskrit Notes
द्वारा ConceptScroll Team · प्रकाशित 17 जुलाई 2026 · 3 मिनट का पठन

परोपकाराय संतां विभूतयः – this guide gives you a concise, exam-ready overview of परोपकाराय संतां विभूतयः from Class 11 Sanskrit, written by ConceptScroll editors and reviewed against the latest NCERT textbook.
योग्यताविस्तार
इस खंड में अध्याय से संबंधित सूक्तियों और श्लोकों का अध्ययन प्रस्तुत है, जो अध्याय के भावसाम्य को स्पष्ट करते हैं। जैसे 'पिबन्ति नद्य: स्वयमेव नाम्भ:' का अर्थ है कि नदियाँ स्वयं ही जल पीती हैं, वे स्वयं के लिए नहीं बल्कि सभी के लिए फलती-फूलती हैं। 'परोपकाराय सतां विभूतय:' सूक्ति से यह सिद्ध होता है कि संतों की महानता उनके परोपकार में निहित है। व्यास के अष्टादश पुराणों में वर्णित वचन भी इसी भाव को पुष्ट करते हैं कि परोपकार पुण्य का कारण है और परपीड़न पाप का। वृक्ष भी फल दूसरों के लिए देते हैं और स्वयं छाया में रहते हैं। इस प्रकार, यह खंड अध्याय के नैतिक और दार्शनिक पक्ष को गहराई से समझाता है।
🧪 Activity: विद्यार्थी इन सूक्तियों का अध्ययन कर उनके अर्थ और सामाजिक महत्व पर चर्चा करें।
🔗 Connection: यह खंड अध्याय के नैतिक संदेश को और मजबूत करता है और विद्यार्थियों को जीवन में लागू करने की प्रेरणा देता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अभ्यास:** 1. संस्कृतभाषया उत्तरत । (क) जातकमालाया: लेखक: क:? (ख) कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्व: क: बभूव? (ग) महासत्त्व: मीनानां कै: परमनुग्रहम् अकरोत्? (घ) सर: लघुपल्वलमिव कथमभवत्? (ङ) बोधिसत्त्व: किमर्थ चिन्तामकरोत्? (च) तोयं प्रतिदिनं केन स्पर्धमानं क्षीयते स्म? (छ) आकाशे अकाला अपि के प्रादुरभवन्? (ज) कया आशाङ्क्या बोधिसत्त्व: पुन: पुन: पर्जन्यं प्रार्थितवान्? (झ) शक्र: केषां राजा आसीत्? (ञ) अस्माभि: कुत्र प्रयतित्व्यम्?
1. (क) जातकमालाया: लेखक: गौतम बुद्धः। (ख) कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्व: एकः महान् पुरुषः आसीत्। (ग) महासत्त्व: मीनानां परमनुग्रहम् अकरोत् तेषां जीवनरक्षणार्थम्। (घ) सर: लघुपल्वलमिव सः शान्तः, सौम्यः च अभवत्। (ङ) बोधिसत्त्व: चिन्तामकरोत् कारणं जनसामान्यस्य दुःखदशां दृष्ट्वा। (च) तोयं प्रतिदिनं मीनाः स्पर्धमानं क्षीयते स्म। (छ) आकाशे अकाला अपि मेघाः प्रादुरभवन्। (ज) आशाङ्क्या बोधिसत्त्व: पुनः पुनः पर्जन्यं प्रार्थितवान् कारणं मीनानां कल्याणाय। (झ) शक्र: मीनराज्ञः राजा आसीत्। (ञ) अस्माभिः कुत्र
2. रिक्तस्थानानि पूर्यत । (क) बोधिसत्त्व: परहितसुखसाधने …………………… अभवत्। (ख) तत्रस्थिता: मीना: जलाभावात् …………………… इव सञ्जाता:। (ग) विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेश्य बोधिसत्त्व: …………………… आपेदे। (घ) स महात्मा स्वकीयसत्यतपोबलमेव तेषां …………………… अमन्यत। (ङ) तत् …………………… तोयसमृद्धिमवाप।
(क) बोधिसत्त्व: परहितसुखसाधने समर्पितः अभवत्। (ख) तत्रस्थिता: मीना: जलाभावात् मृतप्रायाः इव सञ्जाता:। (ग) विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेश्य बोधिसत्त्व: दुःखं आपेदे। (घ) स महात्मा स्वकीयसत्यतपोबलमेव तेषां दुःखं अमन्यत। (ङ) तत् प्रयत्नेन तोयसमृद्धिमवाप।
3. सप्रसङ्गं व्याख्या कार्या । (क) बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकार-
3. (क) बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकारस्य महत्त्वं स्पष्टं करोति। यह कथन दर्शाता है कि अनेक जन्मों में भी परोपकार की भावना बनी रहती है और वह व्यक्ति सदैव दूसरों के कल्याण के लिए कार्य करता है। इस प्रकार, परोपकाराय सतां विभूतयः का भाव इस कथन में निहित है।
4. अधोलिखितशब्दान् ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्तेषु शानच्प्रत्ययान्तेषु च विभन्य लिखत । आपीयमानम्, अवेश्य, स्पर्धमानम्, समापीड्यमानम्, निःश्वस्य, रत्नायमानानि, अभिगम्य, संराधयन्, विमृशन्, समुल्लोकयन्।
उत्तर: शब्दान् ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्तेषु (अर्थात् -मान/-माना/-मानि आदि) तथा शानच्प्रत्ययान्तेषु (अर्थात् -न्/-न्/-न् आदि) विभक्त्य लिखितम्।
1. आपीयमानम् - ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते 2. अवेश्य - शानच्प्रत्ययान्ते 3. स्पर्धमानम् - ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते 4. समापीड्यमानम् - ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते 5. निःश्वस्य - शानच्प्रत्ययान्ते 6. रत्नायमानानि - ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते 7. अभिगम्य - शानच्प्रत्ययान्ते 8. संराधयन् - शानच्प्रत्ययान्ते 9. विमृशन् - शानच्प्रत्ययान्ते 10. समुल्लोकयन् - शानच
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