NCERTCh 2निःशुल्क

Chapter 2

🎓 Class 11📖 Shashwati📖 8 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~12 मिनट
Chapter 1अध्याय 2 / 11Chapter 3

Chapter 2अध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 8 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

परिचयः

व्याख्या

परिचयः

इस अध्याय का शीर्षक 'परोपकाराय सतां विभूतयः' है, जिसका अर्थ है कि संतों की महानता परोपकार में निहित है। संस्कृत साहित्य में जातक कथाओं का विशेष महत्व है, जो पालि भाषा में लिखी गईं हैं और जिनकी संख्या 547 है। ये कथाएँ बोधिसत्त्व के दिव्य और अद्भुत कर्मों का वर्णन करती हैं। बोधिसत्त्व का जीवन अलौकिक और आदर्श माना जाता है, जो परोपकार, सत्य, तप और करुणा के आधार पर चलता है। आर्यशूर ने इसी प्रेरणा से जातकमाला ग्रन्थ की रचना की, जो गद्य-पद्य मिश्रित संस्कृत में है। प्रस्तुत पाठ इसी ग्रन्थ के पन्द्रहवें जातक 'मत्स्यजातकम्' का संक्षेप है। इस जातक में बताया गया है कि किस प्रकार सत्य और तपोबल के आधार पर बोधिसत्त्व मत्स्याधिपति के रूप में अपने साथी मत्स्यों की प्राण रक्षा करते हैं। यह कथा हमें सिखाती है कि सत्त्वगुण से परिपूर्ण आचरण देवताओं को भी वश में कर सकता है। इस प्रकार, अध्याय का मूल भाव परोपकार, करुणा और सत्य के महत्व को उजागर करना है।

  • जातक कथाएँ पालि भाषा में हैं, जिनकी संख्या 547 है।
  • बोधिसत्त्व का जीवन आदर्श और अलौकिक होता है।
  • आर्यशूर ने जातकमाला ग्रन्थ की रचना की।
  • मत्स्यजातक में बोधिसत्त्व की मत्स्याधिपति के रूप में भूमिका है।
  • सत्त्वगुण से देवताओं को भी वश में किया जा सकता है।
  • अध्याय का मुख्य विषय परोपकार और करुणा है।
  • 📌 जातक कथाएँ: बौद्ध साहित्य की कहानियाँ जो बोधिसत्त्व के जीवन की घटनाएँ बताती हैं।
  • 📌 बोधिसत्त्व: वह जीव जो मोक्ष के लिए स्वयं प्रयास करता है और सभी प्राणियों के कल्याण के लिए कार्य करता है।
  • 📌 सत्त्वगुण: सद्गुण जो व्यक्ति को श्रेष्ठ बनाते हैं।

कथा का प्रारंभः मीनकुलस्य विषादः

व्याख्या

कथा का प्रारंभः मीनकुलस्य विषादः

इस खंड में मीनकुल अर्थात मछलियों के समूह की विषादपूर्ण और दीन दशा का वर्णन है। मीनकुल अपने शत्रुओं से भयभीत होकर अत्यंत दुखी और निराश हो गया था। वे अपने जीवन की रक्षा के लिए चिंतित थे क्योंकि उन्हें शिकारियों द्वारा खाया जाता था। जल का स्तर भी घट रहा था, जिससे उनका जीवन और भी संकट में पड़ गया था। वे जल की कमी के कारण लगभग मृतप्राय हो गए थे। इस परिस्थिति में वे अपने भाग्य और जीवन के प्रति अत्यंत चिंतित थे। उनकी दशा को देखकर पाठक को जीवों के प्रति करुणा और परोपकार की आवश्यकता का बोध होता है। इस खंड में जल के घटने और मीनकुल की विषादपूर्ण स्थिति का विस्तार से वर्णन है, जो आगे की कथा का आधार बनती है।

  • मीनकुल अपने शत्रुओं से भयभीत और दुखी थे।
  • जल का स्तर घटने से मीनकुल की स्थिति दयनीय हो गई।
  • मीनकुल लगभग मृतप्राय हो गए थे।
  • उनकी दशा में विषाद और दैन्य स्पष्ट था।
  • मीनकुल की स्थिति पर पाठक को करुणा का भाव जागृत होता है।
  • 📌 मीनकुल: मछलियों का समूह।
  • 📌 विषाद: गहरा दुःख या निराशा।
  • 📌 दैन्य: दुर्बलता, कमजोरी।

बोधिसत्त्व का करुणाभाव और सहायता

व्याख्या

बोधिसत्त्व का करुणाभाव और सहायता

इस भाग में बोधिसत्त्व की करुणा और उनकी सहायता की प्रक्रिया का विस्तृत वर्णन है। मीनकुल की विषादपूर्ण दशा देखकर बोधिसत्त्व का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने अपने पुण्योपचय और सत्याधिष्ठानबल से कार्य आरंभ किया। बोधिसत्त्व ने समस्त दिशाओं से जल को गहरा,

अभ्यास प्रश्नChapter 2

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.अभ्यास:** 1. संस्कृतभाषया उत्तरत । (क) जातकमालाया: लेखक: क:? (ख) कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्व: क: बभूव? (ग) महासत्त्व: मीनानां कै: परमनुग्रहम् अकरोत्? (घ) सर: लघुपल्वलमिव कथमभवत्? (ङ) बोधिसत्त्व: किमर्थ चिन्तामकरोत्? (च) तोयं प्रतिदिनं केन स्पर्धमानं क्षीयते स्म? (छ) आकाशे अकाला अपि के प्रादुरभवन्? (ज) कया आशाङ्क्या बोधिसत्त्व: पुन: पुन: पर्जन्यं प्रार्थितवान्? (झ) शक्र: केषां राजा आसीत्? (ञ) अस्माभि: कुत्र प्रयतित्व्यम्?

उत्तर:

1. (क) जातकमालाया: लेखक: गौतम बुद्धः। (ख) कथायां वर्णिते जन्मनि बोधिसत्त्व: एकः महान् पुरुषः आसीत्। (ग) महासत्त्व: मीनानां परमनुग्रहम् अकरोत् तेषां जीवनरक्षणार्थम्। (घ) सर: लघुपल्वलमिव सः शान्तः, सौम्यः च अभवत्। (ङ) बोधिसत्त्व: चिन्तामकरोत् कारणं जनसामान्यस्य दुःखदशां दृष्ट्वा। (च) तोयं प्रतिदिनं मीनाः स्पर्धमानं क्षीयते स्म। (छ) आकाशे अकाला अपि मेघाः प्रादुरभवन्। (ज) आशाङ्क्या बोधिसत्त्व: पुनः पुनः पर्जन्यं प्रार्थितवान् कारणं मीनानां कल्याणाय। (झ) शक्र: मीनराज्ञः राजा आसीत्। (ञ) अस्माभिः कुत्र प्रयतित्व्यम्? जलाशयेषु मीनानां रक्षणार्थम्।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर पाठ्यपुस्तक के अनुसार दिया गया है। लेखक गौतम बुद्ध हैं, बोधिसत्त्व एक महान पुरुष है जो मीनों की रक्षा करता है। सर का स्वरूप शान्त और सौम्य है। बोधिसत्त्व को जनसामान्य की दुःखद दशा चिन्तित करती है। मीन प्रतिदिन स्पर्धा करते हैं। अकाल मेघ आकाश में प्रादुरभवते हैं। आशाङ्क्या पुनः पर्जन्य प्रार्थना करता है मीनों के कल्याण के लिए। शक्र मीनराज का राजा है। हमें जलाशयों में मीनों की रक्षा के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

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Q2.2. रिक्तस्थानानि पूर्यत । (क) बोधिसत्त्व: परहितसुखसाधने …………………… अभवत्। (ख) तत्रस्थिता: मीना: जलाभावात् …………………… इव सञ्जाता:। (ग) विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेश्य बोधिसत्त्व: …………………… आपेदे। (घ) स महात्मा स्वकीयसत्यतपोबलमेव तेषां …………………… अमन्यत। (ङ) तत् …………………… तोयसमृद्धिमवाप।

उत्तर:

(क) बोधिसत्त्व: परहितसुखसाधने समर्पितः अभवत्। (ख) तत्रस्थिता: मीना: जलाभावात् मृतप्रायाः इव सञ्जाता:। (ग) विषाददैन्यवशगं मीनकुलमवेश्य बोधिसत्त्व: दुःखं आपेदे। (घ) स महात्मा स्वकीयसत्यतपोबलमेव तेषां दुःखं अमन्यत। (ङ) तत् प्रयत्नेन तोयसमृद्धिमवाप।

व्याख्या:

रिक्तस्थानों में पाठ्यपुस्तक के अनुसार उपयुक्त शब्द भरे गए हैं। बोधिसत्त्व परहितसुखसाधन में लगा हुआ था। मीन जलाभाव से मृतप्राय थे। बोधिसत्त्व ने मीनकुल के दुःख को देखा। वह अपने सत्य और तप से उनका दुःख सहन करता था। तत्पश्चात प्रयत्न से जल की समृद्धि प्राप्त की।

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Q3.3. सप्रसङ्गं व्याख्या कार्या । (क) बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकार-

उत्तर:

3. (क) बहुषु जन्मान्तरेषु परोपकारस्य महत्त्वं स्पष्टं करोति। यह कथन दर्शाता है कि अनेक जन्मों में भी परोपकार की भावना बनी रहती है और वह व्यक्ति सदैव दूसरों के कल्याण के लिए कार्य करता है। इस प्रकार, परोपकाराय सतां विभूतयः का भाव इस कथन में निहित है।

व्याख्या:

यह प्रश्न पाठ के उस अंश पर आधारित है जहाँ परोपकार की निरंतरता और महत्ता पर चर्चा की गई है। व्याख्या में यह बताया गया है कि परोपकार केवल एक जन्म का कार्य नहीं, अपितु अनेक जन्मों में भी चलता रहता है। इस प्रकार, यह भावना महान और सतत होती है।

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Q4.4. अधोलिखितशब्दान् ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्तेषु शानच्प्रत्ययान्तेषु च विभन्य लिखत । आपीयमानम्, अवेश्य, स्पर्धमानम्, समापीड्यमानम्, निःश्वस्य, रत्नायमानानि, अभिगम्य, संराधयन्, विमृशन्, समुल्लोकयन्।

उत्तर:

उत्तर: शब्दान् ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्तेषु (अर्थात् -मान/-माना/-मानि आदि) तथा शानच्प्रत्ययान्तेषु (अर्थात् -न्/-न्/-न् आदि) विभक्त्य लिखितम्। 1. आपीयमानम् - ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते 2. अवेश्य - शानच्प्रत्ययान्ते 3. स्पर्धमानम् - ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते 4. समापीड्यमानम् - ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते 5. निःश्वस्य - शानच्प्रत्ययान्ते 6. रत्नायमानानि - ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते 7. अभिगम्य - शानच्प्रत्ययान्ते 8. संराधयन् - शानच्प्रत्ययान्ते 9. विमृशन् - शानच्प्रत्ययान्ते 10. समुल्लोकयन् - शानच्प्रत्ययान्ते अर्थात्, ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्ते शब्दाः - आपीयमानम्, स्पर्धमानम्, समापीड्यमानम्, रत्नायमानानि शानच्प्रत्ययान्ते शब्दाः - अवेश्य, निःश्वस्य, अभिगम्य, संराधयन्, विमृशन्, समुल्लोकयन्।

व्याख्या:

ल्यबन्तेषु शत्प्रत्ययान्तेषु शब्दाः -मान/-माना/-मानि आदि प्रत्ययेन समाप्ताः सन्ति। शानच्प्रत्ययान्तेषु शब्दाः -न् प्रत्ययेन समाप्ताः सन्ति। अतः उक्तानां शब्दानां प्रत्ययानुसारं वर्गीकरणं कृतम्।

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Q5.5. विशेषणानि विशेष्यै: सह योजयत । (क) सरसि इष्टानाम् (ख) धरण्या कदम्बकुसुमगौरेण (ग) अपत्यानाम् हंसचक्रवाकादिशोभिते (घ) नवसलिलेन अभितप्तया (ङ) पश्चिण: ज्वालानुगतेन (च) बोधिसत्त्व: तत्रस्था: (छ) मीना: सलिलतीरवासिन: (ज) मारुतेन करुणायमान:

उत्तर:

उत्तर: (क) सरसि इष्टानाम् - इष्टानाम् सरसि (विशेषण: इष्टानाम्, विशेष्य: सरसि) (ख) धरण्या कदम्बकुसुमगौरेण - कदम्बकुसुमगौरेण धरण्या (विशेषण: कदम्बकुसुमगौरेण, विशेष्य: धरण्या) (ग) अपत्यानाम् हंसचक्रवाकादिशोभिते - हंसचक्रवाकादिशोभिते अपत्यानाम् (घ) नवसलिलेन अभितप्तया - अभितप्तया नवसलिलेन (ङ) पश्चिण: ज्वालानुगतेन - ज्वालानुगतेन पश्चिण: (च) बोधिसत्त्व: तत्रस्था: - तत्रस्था: बोधिसत्त्व: (छ) मीना: सलिलतीरवासिन: - सलिलतीरवासिन: मीना: (ज) मारुतेन करुणायमान: - करुणायमान: मारुतेन विशेषणानि विशेष्यै: सह योजितानि।

व्याख्या:

विशेषणानि विशेष्यपदानां समीपे योज्यन्ते। प्रत्येकं विशेषणं तदनुरूपं विशेष्यं सह योजितम्।

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Q6.6. अधोलिखितपदानि संस्कृतवाक्येषु प्रयुङ्ध्वम् । कस्मिंशिचत्, भाग्यवैकल्यात्, आपीयमानम्, लक्ष्यते, विमृशन्, अभिगम्य, प्रयतित्व्यम्।

उत्तर:

उत्तर: संस्कृतवाक्येषु उक्तपदानि यथोचितं प्रयुक्तानि सन्ति। उदाहरणार्थ: 1. कस्मिंशिचत् - कस्मिंश्चित् ग्रामे मम मित्रः वसति। 2. भाग्यवैकल्यात् - भाग्यवैकल्यात् सः दुःखितः अभवत्। 3. आपीयमानम् - नदी आपीयमानम् अस्ति। 4. लक्ष्यते - लक्ष्यते यत् सः परिश्रमेण कार्यं करोति। 5. विमृशन् - विमृशन् सः समाधानम् अन्वेष्टुम् आरब्धवान्। 6. अभिगम्य - अभिगम्य तं स्थानं, सः विश्रामं कृतवान्। 7. प्रयतित्व्यम् - प्रयतित्व्यम् यत्नेन कार्यं सम्पादयेत्।

व्याख्या:

प्रत्येकं पदं संस्कृतवाक्येषु यथासम्भवम् उचितरूपेण प्रयुक्तम्।

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Q7.7. पर्यायवाचकं लिखत । मीन:, पक्षी, प्रत्यहम्, आपद्, पर्जन्य:।

उत्तर:

उत्तर: 1. मीन: - मत्स्यः 2. पक्षी - विहगः 3. प्रत्यहम् - प्रतिदिनम् 4. आपद् - विपत्ति 5. पर्जन्य: - वर्षा

व्याख्या:

प्रत्येकशब्दस्य समानार्थकशब्दः (पर्यायवाचकः) लिखितः।

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Q8.8. अधोलिखितवाक्येषु उपमानानि योजयत । (क) ... इव मीनानां परमानुग्रहं चकार। (ख) ... इव तोयं प्रत्यहं क्षीयते। (ग) ... इव इमे पर्यादा: क्षरन्ति। (घ) ... इव नवसलिलेन सर: परिपूर्णं न जातम्। (ङ) सर: ग्रीष्मकाले ... इव सञ्जातम्।

उत्तर:

उत्तर: (क) मीनानां परमानुग्रहं चकार ... इव मीनानां परमानुग्रहं चकार। (ख) तोयं प्रत्यहं क्षीयते ... इव तोयं प्रत्यहं क्षीयते। (ग) इमे पर्यादा: क्षरन्ति ... इव इमे पर्यादा: क्षरन्ति। (घ) नवसलिलेन सर: परिपूर्णं न जातम् ... इव नवसलिलेन सर: परिपूर्णं न जातम्। (ङ) सर: ग्रीष्मकाले ... इव सञ्जातम्। प्रत्येकं वाक्यं उपमानेन (इव) योजितम्।

व्याख्या:

उपमानानि योजयित्वा वाक्यानि पूर्णानि कृतानि। उपमानं दर्शयति यथा 'इव' शब्देन।

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